असम में प्रस्तावित अडानी समूह के सीमेंट प्लांट को लेकर उठे पर्यावरण सुरक्षा संबंधी सवाल

गुवाहाटी स्थित एक ग़ैर-सरकारी संगठन ने असम के दीमा हसाओ ज़िले में अडानी समूह के प्रस्तावित सीमेंट प्लांट के लिए होने वाली जनसुनवाई से एक दिन पहले कई पर्यावरणीय और सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाई हैं और अधिकारियों से आग्रह किया है कि इन्हें आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया जाए.

(फोटो साभार: अडानी समूह, अंबुजा सीमेंट वेबसाइट और mwmines.com/इलस्ट्रेशन: द वायर)

नई दिल्ली: असम के दीमा हसाओ जिले में प्रस्तावित सीमेंट प्लांट के लिए होने वाली महत्वपूर्ण जनसुनवाई से एक दिन पहले, गुरुवार (5 मार्च) गुवाहाटी स्थित एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ने कई पर्यावरणीय और सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाई हैं और अधिकारियों से आग्रह किया है कि इन्हें आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया जाए.

नॉर्थईस्ट नाउ के अनुसार, असम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एपीसीबी) द्वारा 6 मार्च को उमरांगसो में आयोजित यह जनसुनवाई अडानी समूह की कंपनी अंबुजा कंक्रीट नॉर्थ प्राइवेट लिमिटेड द्वारा चोटो लोकहिंदोंग गांव में प्रस्तावित एक एकीकृत सीमेंट प्लांट से संबंधित है.

वेबसाइट के मुताबिक, इस परियोजना में 8.0 एमटीपीए क्लिंकर यूनिट, 3.0 एमटीपीए सीमेंट यूनिट, 42 मेगावाट का वेस्ट हीट रिकवरी सिस्टम और 50 मेगावाट का कैप्टिव पावर प्लांट शामिल है.

ग्लोबल पैंडेमिक रिस्पॉन्स फोरम के निदेशक और सेंटर फॉर एफिशिएंट गवर्नेंस के कार्यकारी निदेशक राकेश हजारिका ने दीमा हसाओ के जिला आयुक्त मुनिंद्र नाथ नगातेय को पत्र लिखकर परियोजना की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट से जुड़े कई पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है.

अपने पत्र में हजारिका ने पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 के प्रावधानों का हवाला देते हुए अनुरोध किया है कि उनके सवालों को औपचारिक रूप से दर्ज किया जाए और जनसुनवाई प्रक्रिया के दौरान उनका जवाब दिया जाए.

उनकी एक प्रमुख चिंता लोकहिंदोंग नाले की प्रस्तावित प्लांट स्थल से निकटता को लेकर है. ईआईए रिपोर्ट के अनुसार यह नाला परियोजना स्थल से लगभग 0.1 किलोमीटर की दूरी पर है. हजारिका ने प्लांट की सीमा और जलस्रोत के बीच वास्तविक मापी गई दूरी तथा यह दूरी ‘रेड कैटेगरी’ उद्योगों के लिए निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप है या नहीं, इस बारे में जानकारी मांगी है.

ईआईए के अनुसार क्षेत्र में सालाना लगभग 2,900 मिमी वर्षा होती है. इस संदर्भ में उन्होंने पूछा है कि क्या बाढ़ जोखिम या वर्षाजल प्रबंधन का कोई मॉडल तैयार किया गया है ताकि मानसून के दौरान सीमेंट की धूल, कोयले के कण और औद्योगिक अपशिष्ट नाले में न पहुंचें.

नॉर्थईस्ट नाउ के अनुसार, उन्होंने यह भी पूछा है कि इस जलस्रोत पर निर्भर निचले इलाकों के गांवों और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए क्या प्रबंध किए गए हैं.

प्रस्तावित संयंत्र को प्रतिदिन लगभग 4,500 घन मीटर पानी की आवश्यकता होगी. हजारिका ने कहा कि ईआईए रिपोर्ट में पानी के अंतिम स्वीकृत स्रोत का स्पष्ट उल्लेख नहीं है. उन्होंने पूछा कि क्या यह पानी नदी, झरने या भूजल से लिया जाएगा और क्या इसके लिए आवश्यक अनुमति प्राप्त की गई है.

केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि दीमा हसाओ की भू-वैज्ञानिक संरचना के कारण यहां भूजल का पुनर्भरण सीमित है, जो वर्षा का लगभग 12 प्रतिशत ही माना जाता है, और पहाड़ी क्षेत्रों में पानी मुख्यतः झरनों के रूप में मिलता है.

अन्य चिंताओं में आधारभूत पर्यावरणीय आंकड़े तैयार करने के लिए उपयोग किए गए वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों की संख्या और स्थान, आसपास के गांवों में कणीय प्रदूषण (पीएम10 और पीएम2.5) में संभावित वृद्धि, तथा उमरांगसो क्षेत्र में पहले से चल रही खनन और बिजली उत्पादन गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए समग्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन किए जाने का सवाल शामिल है.

हजारिका ने यातायात से जुड़े अनुमान के बारे में भी जानकारी मांगी है, जिसमें प्रतिदिन संयंत्र में आने-जाने वाले भारी ट्रकों की संभावित संख्या और इसका स्थानीय सड़कों तथा सुरक्षा पर प्रभाव शामिल है. दीमा हसाओ उच्च भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्र में स्थित है और यहां का भूभाग पहाड़ी है. इस कारण उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या भूकंप सुरक्षा उपाय, भूस्खलन जोखिम आकलन और ढलान स्थिरता का विश्लेषण किया गया है.

परियोजना स्थल की असम-मेघालय अंतरराज्यीय सीमा के नजदीक होने को भी एनजीओ ने मुद्दा बनाया है. संगठन ने पूछा है कि क्या संभावित अंतरराज्यीय पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया गया है और क्या मेघालय सरकार से इस बारे में परामर्श किया गया है.

वेबसाइट के अनुसार, हजारिका ने अपने पत्र में लिखा, ‘मैं अनुरोध करता हूं कि इन प्रश्नों को जनसुनवाई की कार्यवाही में दर्ज किया जाए और परियोजना प्रस्तावक तथा संबंधित अधिकारियों द्वारा उनका जवाब दिया जाए.’  साथ ही उन्होंने निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की अपील की.

उमरांगसो और आसपास के गांवों के निवासी इस जनसुनवाई को अपनी आजीविका, जल सुरक्षा और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सामने रखने का अवसर मान रहे हैं क्योंकि जिले में पहले से खनन और औद्योगिक गतिविधियां हो रही हैं.