नई दिल्ली: ‘ऑनलाइन गैस बुक हो नहीं रहा. एजेंसी वाले ऑफलाइन बुकिंग ले नहीं रहे. मेरे घर में दो दिनों से गैस खत्म है. आप ही बताइए मैं बच्चों को क्या खिलाऊं?’
दक्षिणी दिल्ली के दक्षिणपुरी (डॉ. आम्बेडकर नगर) की रहने वाली सीमा पिछले दो दिनों से नौकरी से छुट्टी लेकर गैस के लिए एजेंसी के चक्कर लगा रही हैं.
सीमा के पास मदनगीर स्थित इंडेन महेश्वरी गैस एजेंसी का कार्ड है. वह बताती हैं, ‘मैं हमेशा गैस बुकिंग वाले नंबर पर कॉल कर सिलेंडर बुक करवा लेती थी. कभी कोई दिक्कत नहीं होती थी. अब उस नंबर पर कॉल ही नहीं लग रहा.’
सीमा ने एजेंसी के सामने खड़े होकर कई बार कॉल लगाया. हर बार सुनाई देता, ‘प्लीज ट्राई अगेन आफ्टर समटाइम’ (कृपया थोड़ी देर बाद प्रयास करें).
अपनी आर्थिक असमर्थता बताते हुए वह कहती हैं, ‘मैं इतनी समर्थ नहीं हूं कि बाहर से 200 रुपये प्रति किलो गैस खरीदूं. मेरी खुद की नौकरी ही दस-बारह हजार रुपये की है.’

यह केवल सीमा की कहानी नहीं है. ईरान पर अमेरिका-इज़रायल के हमलों के बाद प्रभावित हुए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (समुद्री मार्ग) के कारण देश के कई हिस्सों की तरह दिल्ली के विभिन्न इलाकों में भी घरेलू गैस सिलेंडर के लिए लोग परेशान भटक रहे हैं.
मदनगीर की तरह ही द वायर की टीम ने दक्षिणी दिल्ली के साकेत, हौज रानी और कालकाजी समेत कई इलाकों का जायजा लिया. ज्यादातर गैस एजेंसियों पर परेशान उपभोक्ता एजेंसी संचालकों से बहस करते दिखे. कई जगहों पर यह बहस हंगामे का रूप भी ले रही थी. एजेंसी संचालक यह समझाने में लगे थे कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है.
दूसरी तरफ भारत सरकार का कहना है कि एलपीजी की कोई किल्लत नहीं है. ऑन रिकॉर्ड एजेंसी संचालक भी सरकारी बयान दोहरा रहे हैं, लेकिन नाम न छापने की शर्त पर वे स्वीकार कर रहे हैं कि ‘किल्लत है.’
क्यों नहीं मिल रहा गैस सिलेंडर?
अब तक गैस सिलेंडर बुक करने के लिए उपभोक्ता एक मोबाइल नंबर डायल करते थे, बताए जा रहे निर्देशों के अनुसार विकल्प चुनते थे और बुकिंग हो जाती थी. लेकिन अब उस नंबर पर कॉल ही नहीं लग रहा.
महेश्वरी गैस एजेंसी में खड़े एक उपभोक्ता ने बताया, ‘पांच साल में पहली बार सिलेंडर बुक करवाने के लिए एजेंसी आना पड़ा है. पहले कभी ऐसी दिक्कत नहीं हुई.’
इस बारे में एजेंसी के कर्मचारी अशोक का कहना है, ‘देखिए, सर्वर की कुछ दिक्कत है, इसलिए बुकिंग नहीं हो पा रही है. हमारी साइट भी बंद है.’

साकेत स्थित सोढ़ी गैस एजेंसी के अमित ने बताया, ‘सुबह पांच बजे सर्वर चल रहा था, लेकिन सुबह नौ बजे के बाद से बंद हो गया.’
हौज रानी स्थित आरके गैस एजेंसी की संचालिका ने बताया कि सर्वर की समस्या को लेकर उनकी टीम हेड ऑफिस से संपर्क में है. उन्होंने कहा, ‘हमें बताया गया है कि इस पर काम चल रहा है.’
दक्षिणी दिल्ली के ही एक गैस एजेंसी संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होने की वजह से लोगों को ज्यादा समस्या हो रही है. उन्होंने कहा, ‘ऑफलाइन बुकिंग का कोई प्रावधान नहीं बचा है, इसलिए गैस होने के बावजूद हम उपभोक्ताओं को दे नहीं सकते. सरकार ने यह रास्ता गैस की खपत पर लगाम लगाने और स्टॉक बचाने के लिए अपनाया है.’
महेश्वरी गैस एजेंसी के कर्मचारी अशोक कहते हैं, ‘अगर हमें ऑफलाइन बुकिंग लेने का आदेश मिल जाए, तो कोई समस्या नहीं है.’
हालांकि कुछ एजेंसी संचालकों का मानना है कि प्रक्रिया ऑफलाइन होने से सिलेंडरों की कालाबाजारी बढ़ सकती है.

बुकिंग के बाद भी क्यों नहीं मिल रहा सिलेंडर?
संजय कैंप निवासी 60 वर्षीय कमला देवी ने पांच मार्च को सिलेंडर की बुकिंग करवाई थी, लेकिन 11 मार्च तक उन्हें सिलेंडर नहीं मिला. कमला के पास बुकिंग कन्फर्मेशन और डीएसी (डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड) का मैसेज भी आ चुका है.
वह बताती हैं, ‘डिलीवरी एजेंट ने कहा कि एजेंसी से पर्ची लेकर आओ, फिर सिलेंडर मिलेगा. यहां आई तो एजेंसी वाले पर्ची नहीं दे रहे हैं.’

एक अन्य उपभोक्ता ने बताया कि उन्होंने भी पांच मार्च को बुकिंग करवाई थी, जब सिलेंडर की कीमत 878 रुपये थी, लेकिन अब यह बढ़कर 913 रुपये हो गई है.
उन्होंने कहा, ‘एजेंसी वाले कह रहे हैं कि नया रेट लगेगा. मैं वह भी देने को तैयार हूं, लेकिन तब भी सिलेंडर नहीं मिल रहा.’
गैस के लिए परेशान होकर एजेंसी में बैठे टेकाराम कहते हैं, ‘मैंने डिलीवरी वाले से पूछा कि देरी क्यों हो रही है, तो उसने कहा – एजेंसी जाओ. यहां आया तो कोई साफ जवाब नहीं मिल रहा.’
साकेत स्थित सोढ़ी गैस एजेंसी में कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने कहा, ‘देखिए, सर्वर नहीं चल रहा, इसलिए हम पर्ची नहीं निकाल पा रहे हैं. पहले तीन-चार दिन में लोगों को डिलीवरी मिल जाती थी, अब पांच-छह दिन लग रहे हैं.’
सिलेंडर की कालाबाजारी जारी
जहां एक तरफ उपभोक्ता एजेंसियों से सिलेंडर लेने के लिए जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सिलेंडरों की कालाबाजारी भी जारी है. द वायर की टीम को दक्षिणी दिल्ली में कई ऐसे दुकानदार मिले, जो दोगुनी कीमत लेकर सिलेंडर की होम डिलीवरी करने को तैयार थे.
दक्षिणपुरी में गैस स्टोव ठीक करने वाला एक दुकानदार 1,800 रुपये में सिलेंडर देने को तैयार था. उसकी शर्त बस इतनी थी कि सिलेंडर रात आठ बजे के बाद मिलेगा.
उसने बताया कि वह उसी दिन 4,500 रुपये में तीन सिलेंडर सीधे गोदाम से लेकर आया है. उसने कहा, ‘आप लोग बुक करते रह जाओगे, नहीं होगा. सर्वर डाउन कर रखा है. हम ब्लैक से ला रहे हैं.’
दक्षिणपुरी की रहने वाली सीमा कहती हैं, ‘ये लोग (एजेंसी) कहते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते. फिर बाहर ब्लैक में 1,800 रुपये में सिलेंडर कैसे मिल रहा है?’
हौज रानी का एक दुकानदार 2,200 रुपये में सिलेंडर की होम डिलीवरी करने को तैयार था.
‘मजदूरों पर सबसे ज्यादा मार’
एजेंसी से और ब्लैक में बड़े सिलेंडर खरीदने वालों से ज्यादा असर उन दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ रहा है, जो छोटे सिलेंडर में एक-दो किलो गैस भरवाते हैं. देश के अलग-अलग राज्यों से आकर दिल्ली में काम कर रहे हैं, इन मजदूरों के पास किसी एजेंसी का कार्ड नहीं होता.
मदनगीर मार्केट में छोटे सिलेंडरों में एक-दो किलो गैस बेचने वाले दुकानदार बताते हैं कि उनके पास दो दिनों से गैस खत्म है. दुकानदार ने कहा, ‘मजदूर बेचारे परेशान हैं. मेरे तो वही ग्राहक हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो वे लोग गांव जाने लगेंगे. जब खाएंगे नहीं तो काम कैसे करेंगे.’
कई इलाकों में छोटे सिलेंडर भरवाने वालों को गैस मिल तो रही है, लेकिन उन्हें 160 से 180 रुपये प्रति किलो तक कीमत चुकानी पड़ रही है, जबकि पहले यही गैस 90 से 100 रुपये प्रति किलो मिल जाती थी. यानी लोगों को गैस की मूल कीमत से करीब ढाई गुना अधिक चुकाना पड़ रहा है.
क्या भारत में गैस की किल्लत है?
जमीनी स्तर पर उपभोक्ताओं को हो रही परेशानियों के बीच केंद्र सरकार का कहना है कि देश में घरेलू गैस की कोई कमी नहीं है.
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मंगलवार (11 मार्च) को मीडिया से अनौपचारिक बातचीत में कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की ऊर्जा आपूर्ति विभिन्न स्रोतों और मार्गों से लगातार जारी है.
उन्होंने कहा, ‘हमने यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं कि घरेलू उपभोक्ताओं को सीएनजी और पीएनजी की 100 प्रतिशत आपूर्ति मिलती रहे. युद्ध की स्थिति के बावजूद अन्य उद्योगों को भी उनकी जरूरत का 70 से 80 प्रतिशत ईंधन मिल रहा है.’
पुरी ने एक्स पर भी कहा कि सरकार देश के घरेलू उपभोक्ताओं को किफायती ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने यह भी कहा कि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गैस की कोई कमी नहीं है और लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है.
हालांकि, जमीनी स्तर पर गैस बुकिंग में आ रही दिक्कतें, सिलेंडर की डिलीवरी में देरी और कई जगहों पर कालाबाजारी की शिकायतें सरकार के इन दावों से अलग तस्वीर पेश कर रही हैं.
अगर किल्लत नहीं, तो संकट क्यों?
अंग्रेज़ी अखबार द हिंदू की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में एलपीजी की मौजूदा किल्लत सिर्फ युद्ध या आपूर्ति बाधित होने का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक संरचनात्मक कारण भी हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत में एलपीजी की खपत तेजी से बढ़ी है, लेकिन इसके साथ रणनीतिक भंडारण बढ़ाने की कोई समानांतर योजना नहीं बनाई गई.
भारत का एलपीजी आयात 2011-12 से 2024-25 के बीच तीन गुना बढ़कर लगभग 2 करोड़ टन तक पहुंच गया है. देश की जरूरतों का करीब 60 प्रतिशत एलपीजी आयात से पूरा होता है.
भारत की आयात निर्भरता भी तेजी से बढ़ी है, 2015 में 47 प्रतिशत से बढ़कर अब लगभग दो-तिहाई तक पहुंच गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 85 प्रतिशत से अधिक एलपीजी आपूर्ति फारस की खाड़ी से आती है, जिसे देश तक पहुंचने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरना पड़ता है. ऐसे में इस समुद्री मार्ग में बाधा आने पर आपूर्ति पर तुरंत असर पड़ता है.
भारत में एलपीजी की मासिक खपत लगभग 30 लाख टन है, जिससे यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बन चुका है. दैनिक स्तर पर देश में लगभग 80 हजार टन एलपीजी की खपत होती है, जिसमें से 85 प्रतिशत से अधिक घरेलू उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल किया जाता है.
दीर्घकालिक भंडारण के लिए भारत में फिलहाल सिर्फ दो भूमिगत भंडारण केंद्र हैं मंगलुरु और विशाखापत्तनम जिनकी कुल क्षमता करीब 1.4 लाख टन है. यह देश की कुल खपत के हिसाब से दो दिनों से भी कम का भंडार है.
देश में फिलहाल लगभग 33 करोड़ एलपीजी कनेक्शन हैं, जिनमें से करीब 10 करोड़ कनेक्शन 2017 के बाद प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत जोड़े गए. इस योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था, लेकिन इसके चलते एलपीजी की खपत और आयात निर्भरता दोनों तेजी से बढ़ी हैं.
उज्जवला योजना और एलपीजी की मौजूदा स्थिति पर वरिष्ठ पत्रकार औनिंद्यो चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा है कि योजना बनाते समय इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया कि इतनी अतिरिक्त एलपीजी कहां से आएगी, ‘यही कारण है कि ईरान पर हमलों का पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति या कीमतों पर खास असर नहीं पड़ा, लेकिन इससे एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो गई है.’
