राही मासूम रज़ा के नाम मनोज कुमार झा का ख़त: ‘आपकी याद हमें यह सिखाती है कि प्रतिरोध हमेशा नारा नहीं होता’

राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने लेखक राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यह भावपूर्ण पत्र लिखा है. इसमें रज़ा की साहित्यिक विरासत, उनकी मानवीय दृष्टि और आज के समय में उनके शब्दों की प्रासंगिकता पर आत्मीयता से विचार किया गया है.

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(तस्वीर साभार: राजकमल प्रकाशन)

राही मासूम रज़ा के नाम

राही जी,

यह ख़त किसी बहस के लिए नहीं,
बस आपको याद करने के लिए है.

जानता हूं,
जहां आप हैं
वहाँ तक
शब्द भी थककर लौट आते होंगे.
फिर भी लिख रहा हूं
क्योंकि कुछ यादें
लिखे बिना
सांस नहीं ले पातीं.

कभी-कभी लगता है
कि आपकी किताबों के गांव
अभी भी कहीं सांस ले रहे हैं
किसी पगडंडी के किनारे,
किसी पुराने बरगद की छांव में,
जहां लोग
नाम से पहले
चेहरे पहचानते थे.

आपके समय का दुख
शायद उतना ही गहरा था,
पर उसमें
इंसान होने की
थोड़ी-सी जगह बची रहती थी.

अब दुख
शोर में बदल गया है,
और करुणा
धीरे-धीरे
हाशिये पर सरकती जा रही है.

आपने जिन गलियों को
कहानियों में बसाया था,
वहां अब
नाम बदल दिए गए हैं.
पर चेहरे वही हैं
डरे हुए,
चुप,
और अपने ही साये से
संकोच करते हुए.

राही जी,
आपके शब्द
किसी पत्थर की तरह भारी नहीं थे.
वे तो
मिट्टी जैसे थे—
उसी मिट्टी की तरह
जिसमें गंगा का पानी भी था
और गांव की धूल भी.

उन्हें हथेली में रखो
तो अपनापन मिलता था,
और पढ़ो
तो लगता था
कि इंसानियत अभी पूरी तरह मरी नहीं है.

आज शब्द
चाकू हो गए हैं,
और वाक्य
घाव बनकर उतरते हैं.

आपकी याद
हमें यह सिखाती है
कि प्रतिरोध
हमेशा नारा नहीं होता.

कभी-कभी
किसी इंसान को
ध्यान से देख लेना,
उसका नाम पूछ लेना,
या उसके डर को
चुपचाप सुन लेना भी
एक बड़ा साहस होता है.

काश आप होते,
तो शायद
इतनी सारी चीख़ों के बीच
धीरे से कहते—

कि मुल्क
नफरत से नहीं,
याद रखने से बचता है.

और यह भी
कि भाषा का असली काम
लोगों को बांटना नहीं,
उनके बीच
एक छोटी-सी पुलिया बना देना है.

यह ख़त
आप तक नहीं पहुंचेगा.

मगर शायद
हम तक पहुंच जाए
हमारी यादों तक,
हमारी शर्म तक,
और हमारी उम्मीद तक.

और यही
मेरी सबसे बड़ी उम्मीद है,
राही जी.

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)