महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) भारत की कल्याणकारी व्यवस्था में एक दुर्लभ पहल के रूप में आई थी. यह कोई अनुदान या विवेकाधीन कार्यक्रम नहीं था, बल्कि काम का एक कानूनी अधिकार था. सैद्धांतिक तौर पर, इसने राज्य-नागरिक संबंधों की बुनियाद को पुनर्परिभाषित कर दिया था. इसके अनुसार, अगर लोग काम की मांग करते थे, तो राज्य उन्हें काम उपलब्ध कराने के लिए बाध्य था. अगर ग्राम पंचायतें योजना बनाती थी, तो प्रशासन उसे संभव बनाता था. इसमें मजदूरी की गारंटी थी, देरी पर दंड का प्रावधान था और जवाबदेही निहित थी.
पर लगभग दो दशक बाद एक कड़वी सच्चाई यह है कि हालिया कानूनी बदलावों से कहीं पहले ग्रामीण भारत के बड़े हिस्सों में मनरेगा एक अधिकार के रूप में काम करना बंद कर चुका था. इसमें जो शेष था, वह एक बजट-सीमित, प्रशासनिक रूप से नियंत्रित और राजनीतिक रूप से अनियमित योजना थी. यह अंतर निर्णायक है. अधिकार सत्ता संबंधों को बदलते हैं, जबकि योजनाएं केवल लाभ वितरित करती हैं.
कैसे एक अधिकार चुपचाप एक योजना में बदल गया
मनरेगा का कमजोर पड़ना किसी एक बड़े नाटकीय नीतिगत बदलाव से नहीं हुआ. यह एक निरंतर प्रक्रिया थी. उदाहरण के तौर पर, काम की मांग दर्ज करने की प्रक्रिया कागजी औपचारिकता बनकर रह गई, न कि लोगों की वास्तविक जरूरतों की अभिव्यक्ति. ऑडिट निष्कर्षों में यह सामने आया कि काम की मांग अक्सर औपचारिक रूप से दर्ज ही नहीं की जाती थी. कई मामलों में आवेदन बाद की तारीख में भरे जाते थे, रसीदें गायब होती थी और रिकॉर्ड अधूरे रहते थे.
इसके चलते ‘अपूर्ण मांग’- यानी काम चाहने वाले परिवारों और वास्तव में प्रदान किए गए रोजगार के बीच के अंतर को प्रमाणित करना लगभग असंभव हो गया. यहां तक कि राजस्थान जैसे सूखा-प्रभावित राज्यों में ग्रामीण संकट के भीषण दौर में भी यह देखने को मिला है. सत्यापन योग्य आंकड़ों के अभाव ने यह कहने की गुंजाइश बनाए रखी कि मनरेगा के तहत काम की मांग कम है.
इसी तरह के बदलाव अन्य क्षेत्रों में भी देखे गए. तयशुदा योजना प्रारूपों ने स्थानीय जरूरतों को पीछे धकेल दिया. मजदूरी में देरी ने लोगों का भरोसा कमजोर किया, और ग्राम पंचायतें ऐसे काम लागू करने लगीं जिन्हें उन्होंने सार्थक रूप से स्वयं नहीं गढ़ा था. धीरे-धीरे रोज़गार का रिश्ता घरों की मांग से हटकर सरकारी घोषणाओं से जुड़ने लगा. यह अधिकार से ‘अपेक्षा’ की ओर एक धीमा, लेकिन गहरा बदलाव था.
इसका परिणाम यह हुआ कि अधिकार संवैधानिक रूप से बना रहा, लेकिन संस्थागत स्तर पर कमजोर होता गया. इसकी मूल भावना केवल वहीं कायम रह पायी, जहां जिला और स्थानीय प्रशासन सक्रिय थे, नागरिक समाज संगठन तकनीकी रूप से सशक्त थे, या नागरिक राजनीतिक रूप से संगठित थे.
इस संदर्भ में अक्सर दिया जाने वाला एक उदाहरण केरल का है, जहां राज्य और स्थानीय सरकारों ने कुडुम्बश्री संस्थाओं के साथ मिलकर मनरेगा कार्यों की योजना बनायी और उनका क्रियान्वयन किया.
संबंधित अध्ययनों में कुछ अन्य जगहों का जिक्र भी आता है. उदाहरण के लिए, हरियाणा का महेंद्रगढ़ जिला, जहां सक्रिय जिला नेतृत्व ने पंचायतों को ग्राम सभा के माध्यम से प्रावधानों का उपयोग कर मनरेगा श्रमिक बजट और वार्षिक कार्य योजना की तैयारी व स्वीकृति के लिए सक्षम बनाया; और मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के कुछ हिस्से, जहां जागृत आदिवासी दलित संगठन की सतत लामबंदी ने मजदूरों को काम की मांग दर्ज करने और रोजगार प्राप्त करने में मदद की.
लेकिन सवाल यह है कि मनरेगा के क्रियान्वयन में क्षेत्रीय स्तर पर इतनी बड़ी असमानताएं क्यों दिखाई देती हैं?
विभिन्न वास्तविकताएं: केरल, ओडिशा और अधिकार-आधारित कार्यक्रम की सीमाएं
मनरेगा के राज्य-स्तरीय तथ्य एक राजनीतिक रूप से असहज स्वरूप दिखाते हैं. यह कार्यक्रम उन इलाकों में सबसे सफल नहीं रहा जहां जरूरत सबसे ज्यादा थी, बल्कि वहां बेहतर रहा जहां प्रशासनिक ढांचा मजबूत और राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट थी. केरल और ओडिशा के बीच का अंतर इसे स्पष्ट करता है. आधिकारिक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एनएफएचएस-5) के अनुसार, केरल की 1 प्रतिशत से भी कम आबादी बहुआयामी गरीबी में है, जबकि ओडिशा में लगभग 15 प्रतिशत आबादी इस श्रेणी में आती है. इसके बावजूद, केरल ने रोजगार गारंटी योजना से लगातार कहीं अधिक लाभ हासिल किया.
वित्तीय वर्ष 2021–22 और 2024–25 के बीच, केरल ने प्रति भागीदारी करने वाले परिवार को औसतन 62–68 दिनों का काम दिया, और हाल के वर्षों में 20–26 प्रतिशत* परिवारों ने पूरे 100 दिन के अधिकार को पूरा किया. वित्तीय वर्ष 2024–2025 में यह संख्या लगभग 5.19 लाख परिवारों के बराबर थी. कुल ‘व्यक्ति-दिन’ में महिलाओं की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही.
ओडिशा की दिशा इससे बिल्कुल अलग रही. बहुआयामी गरीबी का स्तर कहीं ज्यादा होने के बावजूद, वित्तीय वर्ष 2021–22 और 2024–25* के बीच प्रति परिवार औसत रोजगार आमतौर पर 50–57 दिनों तक सीमित रहा. हाल के वर्षों में भी केवल 4–10 प्रतिशत* भागीदारी करने वाले परिवार ही पूरे 100 दिनों का काम पूरा कर पाए. महिलाओं की भागीदारी लगभग 50 प्रतिशत के आसपास रही, जो लागू किए जा सकने वाले अधिकार से ज्यादा अनियमित कार्य उपलब्धता से प्रभावित थी.
एक और महत्वपूर्ण अंतर भुगतान की प्रक्रिया में दिखाई देता है. यद्यपि भुगतान में देरी राष्ट्रीय स्तर पर बनी हुई है, पर केरल में प्रमुख प्रशासनिक चरण अपेक्षाकृत समय पर पूरे हो जाते हैं, जबकि ओडिशा में भुगतान में देरी अधिक संरचनात्मक और बहु-स्तरीय है, जिससे समय पर भुगतान का अधिकार स्वयं कमजोर पड़ जाता है.
यह मामूली नहीं है. फरवरी 2025 तक राष्ट्रीय स्तर पर मनरेगा के तहत बकाया मजदूरी 12,000 करोड़ रुपये से अधिक थी, जो यह दर्शाता है कि भुगतान में देरी अपवाद नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक पहलू बन चुकी है.
इसका निहितार्थ स्पष्ट है: मनरेगा ऐसे परिवेश में नहीं चला जहां जरूरत अधिक थी; बल्कि इसने उन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन किया जहां संस्थानों ने कानूनी अधिकार को वास्तविक अनुभव में बदल दिया.
इस संदर्भ में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)- वीबी-जी राम जी की ओर हो रहे बदलाव का मूल्यांकन महत्वपूर्ण हो जाता है. यह सही है कि अधिकार-आधारित ढांचे का कमजोर पड़ना असहज करता है और आदर्श रूप से ऐसा नहीं होना चाहिए था. यदि एक बार अधिकार कमजोर पड़ जाएं, तो उन्हें वापस हासिल करना कठिन होता है.
लेकिन ओडिशा के कई ग्रामीण परिवारों के लिए यह बदलाव किसी सशक्त अधिकार के खोने जैसा महसूस नहीं होता. वह क्षति तो वर्षों पहले ही हो चुकी था. जब काम अनियमित हो, भुगतान में देरी हो और योजना अधूरी हों, तब संवैधानिक भाषा रोजमर्रा के जीवन में बहुत कम सुरक्षा दे पाती है.
ग्रामीण भारत में रोजगार गारंटी को वास्तविक बनाना: जरूरी कदम
यदि ओडिशा और भारत के अन्य हिस्सों में मनरेगा की मूल भावना पहले ही एक अधिकार के रूप में काम करना बंद कर चुकी थी, तो अब प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या नए ढांचे को अलग तरीके से गढ़ा जा सकता है?
वीबी-जी राम जी केवल इसलिए सफल नहीं हो सकता क्योंकि वह नया है. उसकी प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह स्थानीय संस्थाओं और योजना प्रक्रियाओं में कितनी गहराई से समाहित होता है. इस संबंध में कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं:
1. योजना-निर्माण स्थानीय संस्थाओं पर आधारित होना चाहिए
मनरेगा के तहत योजना की कल्पना इस तरह की गई थी कि प्रक्रिया नीचे से ऊपर की ओर चले, और ग्राम पंचायतें उसकी धुरी हों. लेकिन खर्च के रुझान पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ और ही दिखती है. अलग-अलग राज्यों में – यहां तक कि केरल* और ओडिशा* जैसे विविध भौगोलिक और आजीविका परिस्थितियों वाले राज्यों में भी- जमीन पर कामों का दायरा अक्सर सीमित और बार-बार दोहराया जाने वाला ही रहा है. यह तब है जब इन दोनों राज्यों में स्थानीय पर्यावरण और आजीविका की परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं.
अगर रोजगार योजना सच में गांव की जरूरतों को दिखाना चाहती है, तो उसे प्रशासनिक सुविधा से नहीं, गांव के फैसलों से चलना चाहिए. ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) सिर्फ कागजी वार्षिक दस्तावेज न बना रहे, बल्कि ग्राम सभा में तय प्राथमिकताओं और ग्राम समृद्धि व लचीलापन योजनाओं (वीपीआरपी) पर आधारित हो.
कामों की योजना मौसम के हिसाब से बने और उन्हें पानी, खेती, जंगल और स्थानीय रोजगार से जोड़ा जाए, ताकि हर गांव में वही काम हों जिनकी वहां सच में जरूरत है.
वीबी-जी राम जी की असली ताकत इस बात में है कि वह वीपीआरपी के आधार पर होने वाली योजना प्रक्रिया को और मजबूत बनाए, और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से पर्यावरण और रोजगार से जुड़े कामों को सही क्रम में आगे बढ़ाए.
2. पारिस्थितिक और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए
वी बी-जी राम जी पारिस्थितिक कार्यों को वैध रोजगार गतिविधियों के रूप में मान्यता देता है. लेकिन जब तक ग्राम पंचायतों को ग्राम-स्तरीय प्रक्रियाओं से ऐसे कामों की पहचान, प्राथमिकता निर्धारण और संग्रह करने में सक्षम नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह केवल कागजी मान्यता बनी रहेगी.
केरल और ओडिशा- दोनों ही राज्यों में खर्च का बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने, तयशुदा और मुख्यतः मिट्टी से जुड़े कामों पर केंद्रित है. केरल* में ऐसे छह प्रकार के काम कुल व्यय का लगभग 63 प्रतिशत हिस्सा लेते हैं, जबकि ओडिशा* में भी छह ही गतिविधियां 64 प्रतिशत से अधिक खर्च को अपने भीतर समेटे हुए हैं. इनमें विशेष रूप से जल अवशोषण गड्ढे और राज्य योजना के तहत बनने वाले आवास प्रमुख हैं. राष्ट्रीय स्तर पर भी यही रुझान नजर आता है, जहां कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा कुछ सीमित श्रेणियों में ही सिमट जाता है.
यह केंद्रीकरण उन कामों को बढ़ावा देता है, जिन्हें आसानी से मापा जा सके, जो तयशुदा लागत मानकों पर खरे उतरते हों, जिन्हें जल्दी मंजूरी मिल जाए, और जिन पर ऑडिट के दौरान सवाल उठने की संभावना कम हो.
इसके विपरीत, जटिल और क्षेत्र-विशेष की पारिस्थितिकी या आजीविका से जुड़े हस्तक्षेप अक्सर पीछे छूट जाते हैं. नतीजतन, ग्राम-स्तरीय प्रक्रियाओं के माध्यम से जो पारिस्थितिकी और आजीविका से जुड़ी जरूरतें सामने आती हैं, वे अंतिम ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (जीपीडीपी) में पूरी तरह दिखाई नहीं देती. ऐसे में योजनाएंड आखिरकार उन्हीं गिने-चुने और आसानी से लागू किए जा सकने वाले कामों के इर्द-गिर्द सिमट जाती हैं.
वीबी-जी राम जी इस दिशा में बदलाव ला सकता है, यदि वह गांव और ग्राम पंचायत स्तर पर विज्ञान-आधारित प्राकृतिक संसाधन योजनाओं को बढ़ावा दे- जैसे भूजल, स्थानीय मौसम, मिट्टी और भूमि की क्षमता के आकलन पर आधारित योजनाएं. इससे ऐसे काम चुने जा सकेंगे, जो हर जगह की खास पारिस्थितिक चुनौतियों का समाधान करें, न कि एक जैसे ढांचे दोहराएं
. इसके लिए स्थानीय स्तर पर तकनीकी और ज्ञान-संपन्न सेवा प्रदाताओं को विकसित करना होगा और मान्यता देनी होगी, ताकि वे पंचायतों को योजना बनाने और लागू करने में सहयोग कर सकें. साथ ही, ग्राम पंचायतों के पास इन सेवाओं के लिए औपचारिक रूप से भुगतान करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि यह सहयोग टिकाऊ बन सके.
3. कार्य आवंटन और भुगतान प्रक्रियाओं में डिजिटल पहुंच और समानता पर ध्यान देना आवश्यक है
डिजिटल प्लेटफॉर्म निष्पक्ष नहीं होते. जहां डिजिटल सुविधा सबके पास बराबर नहीं है, वहां उनका नियंत्रण उन्हीं लोगों तक सीमित रह जाता है जिनके पास मोबाइल, इंटरनेट और तंत्र की जानकारी है. मनरेगा का अनुभव दर्शाता है कि यह लोगों को अलग-थलग कर सकता है. मसलन, हर कोई यह नहीं देख सकता कि भुगतान हुआ या नहीं, गलती कैसे सुधारी जाए, या देरी पर शिकायत कैसे दर्ज की जाए.
उदाहरण के लिए, आधार-लिंक्ड प्रणालियां- पहले आधार आधारित भुगतान प्रणाली (एबीपीएस) और अब आधार आधारित ई-केवाईसी के साथ फेशियल वेरिफिकेशन– ने रोजमर्रा के काम और मजदूरी की पात्रता को तकनीकी अनुपालन से जोड़ दिया है.
नवंबर 2025 तक लगभग 69 प्रतिशत पंजीकृत श्रमिकों और 47 प्रतिशत सक्रिय श्रमिकों ने ई-केवाईसी पूरा नहीं किया था, जिससे वे अनुपस्थित चिह्नित होने या मजदूरी से वंचित होने के जोखिम में थे. सभी श्रमिकों द्वारा ई-केवाईसी या अन्य डिजिटल प्रक्रियाओं को पूर्ण दिखाने का प्रशासनिक दबाव बड़े पैमाने पर नाम काटने का कारण भी बना.
वर्ष 2025 की ई-केवाईसी मुहिम के दौरान एक ही महीने में 27 लाख से अधिक श्रमिकों के नाम हटाए गए. यह एबीपीएस लागू होने के दौरान नाम निकालने में 247 प्रतिशत की वृद्धि की पुनरावृत्ति जैसा है, जिससे कार्यक्रम की पहुंच घटती गई और आपत्ति तथा शिकायत निवारण की प्रक्रियाएं धुंधली हो गई.
इसलिए तकनीक का उद्देश्य पारदर्शिता और समय पर भुगतान को सशक्त करना होना चाहिए, न कि ग्राम सभा प्रक्रियाओं को दरकिनार करना या संसाधनों को स्थानीय रूप से व्यक्त प्राथमिकताओं से हटाना. वीबी-जी राम जी यह सुनिश्चित कर सकता है कि ग्राम सभा द्वारा स्वीकृत कार्य योजनाओं को डैशबोर्ड-आधारित अनुपालन मेट्रिक्स से ज्यादा अधिकार प्राप्त हो. इसके लिए ऑफलाइन पहुंच, समय-सीमित सुधार की व्यवस्था और पंचायत-स्तर पर भुगतान स्थिति के अपडेशन को सक्षम बनाया जा सकता है.
ऐसे सुरक्षा उपायों के बिना, डिजिटल प्रणालियां जवाबदेही का साधन बनने के बजाय सूचना-आधारित अपवर्जन और मजदूरी से वंचित करने का माध्यम बन सकती हैं.
मनरेगा इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने केवल काम का वादा नहीं किया, बल्कि नागरिक और राज्य के बीच के संबंध को क्षणिक रूप से बदल दिया था. यह वादा कानून में बदलाव से बहुत पहले ही क्षीण पड़ चुका था. अब चुनौती यह नहीं है कि उस अधिकार का भावनात्मक बचाव किया जाए, जो व्यवहार में प्रभावी नहीं रहा. बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि नया ढांचा उन्हीं संस्थागत विफलताओं को दोहराए नहीं. वीबी-जी राम जी का मूल्यांकन उसके कानूनी स्वरूप से नहीं, बल्कि इस आधार पर होगा कि क्या वह ग्रामीण रोजगार में पूर्वानुमेयता, स्थानीय योजना अधिकार और प्रशासनिक विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित कर पाता है.
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह एक और नेक-इरादे वाली योजना बनकर रह जाएगा- बड़ा पैमाना, छोटा प्रभाव और जीवन के उन पहलुओं से दूर, जिन्हें वह सुरक्षित करना चाहता है.
*यह आंकड़े 27 जनवरी 2026 को केरल (a, b, c) और ओडिशा (a, b, c) में मनरेगा से संबंधित सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर संकलित और गणना किए गए हैं.
(यह लेख पूर्व में आईडीआर की वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुका है.)
