क्या मैं भी मिट्टी की दीवार पर आदिवासी लोक-चित्रकार के हाथों बना हुआ एक चित्र हूं. एक ऐसा चित्र जिसमें प्रारंभिक- परंपरागत, हस्तनिर्मित विविध रंग भरे हों. हां मैं भी ऐसा ही एक चित्र हूं. जिसे आदिवासी लोक-चित्रकारों ने अपने किसी चित्र की तरह बनाया है. समय जिसे फीका कर देता है तो चित्रकार आकर उसमें फिर से रंग भर देते हैं. समय जिसे मिटा देता है लोक-चित्रकार आकर उसे फिर से बना देते हैं.
सुप्रसिद्ध लोक-कलाविद, लेखक मुश्ताक ख़ान की किताब ‘भारत की आदिवासी-लोक चित्रकला‘ किताब पढ़ते हुए मुझे ऐसा ही लगता रहा. जिस भी चित्र को सामने खड़े होकर देखा तो उसमें अपना ही चेहरा झांकता दिखाई देने लगा. कितना अनूठा है कि मनुष्य स्वयं को एक आदिवासी लोक-कलाकार के बनाए लोक-कलाचित्र की तरह चिह्नित करे.
आदिवासी लोक चित्रकला की संपन्नता यह है कि भारत के किसी एक राज्य से होकर चलना प्रारंभ कीजिए और किसी दूसरे फिर तीसरे राज्य में होते चले जाइए, आपको आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी-लोक चित्र कला का भरपूर वैविध्य देखने को मिलेगा. और मिलेंगी उनके निर्माण के पीछे की लोककथाएं. मिलेंगे उन्हें बनाए जाने के लिए स्थानीय उपलब्धताओं पर केंद्रित रंगों की निर्मिति और परंपरागत रूप से इस कला का पीढ़ीगत हस्तांतरण और वर्तमान में आ चुके और क्रमश:आते जा रहे बदलाव.

मुश्ताक ख़ान अपनी इस किताब की महत्वपूर्ण तथा उल्लेखनीय प्रस्तावना में लिखते हैं ये लोक-कलाचित्र मात्र प्रदर्शन की वस्तु नहीं आदिवासी लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं. ये अपने आस-पास सहज उपलब्ध प्राकृतिक रंगों से दीवार और भूमि दोनों पर बनाए जाते हैं. परंपरा का सबसे प्रमुख कार्य यही है. वह लोककला को केवल प्रदर्शनीय वस्तु न रहने देकर उसे जीवन का अंग बना देती है. इस प्रकार कलाकृति उस समाज की मान्यताओं और विश्वदर्शन का दर्पण बन जाती है.
कलाकार का विश्वदर्शन उसकी कलादृष्टि के निर्धारण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. आदिवासी कलाकार, वास्तविक सृष्टि तथा कलासृष्टि के भेद और उनके बुनियादी तत्वों की तार्किक भिन्नता को पूरी तरह समझता है.
वे लिखते हैं कि आदिवासी लोक कलाकारों की यह यात्रा इतनी आसान नहीं रही. बदलते परिवेश में उनके कलाकर्म का उद्देश्य ही बदल रहा था. अब उन्हें अपने पारंपरिक चित्रों में धार्मिक सामाजिक विश्वासों के अनुरूप परिशुद्धता ही नहीं बनाए रखनी थी बल्कि उन्हें अपनी पारंपरिक शैलीगत पहचान बनाए रखते हुए निजी मौलिक कला प्रतिभा और शिल्प कौशल को व्यक्त करना था.
उनके अनुसार पुस्तक में दिए विवरण पारंपरिक कलाकारों द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं. वे कलाकार जिनकी अनेक पीढ़ियां इस कार्य में गुजर गईं. जिन्होंने इन पारंपरिक कलारूपों को जीवित बनाए रखा और उन्हें समकालीन औचित्य भी प्रदान किया.
तक्षशिला एजुकेशन सोसाइटी से प्रकाशित इस किताब की शुरुआत आंध्र प्रदेश की कलमकारी, असम के चाय बागान के चित्रों और बिहार के मधुबनी लोकचित्र, टिकुली चित्र, मंजूषा चित्र, गोदना चित्र और भोजपुरी लोकचित्र के परिचय से होती है. इसमें इस चित्रकला के सृजनकर्ताओं से मुश्ताक खान का उनसे आमने-सामने बैठकर बात करना सबसे रोचक पक्ष है कि किस तरह ये आदिवासी लोक-चित्रकार एक अपने जीवन के साथ-साथ एक लंबा कला जीवन जीकर यहां तक पहुंचे. उनकी चित्र कला के विकास के बारे में सीधे उनके मुंह से सुनना-जानना इस शानदार किताब का मीठा और रोमांचक पहलू है.
एक अत्यंत संघर्ष और अभाव भरी, मूलभूत जरूरतों के लिए तरसती जिंदगी को उन्होंने किस तरह पेट भरने और तन ढकने के प्राथमिक स्तर पर पहुंचाया है. एक समय जब कलमकारी लगभग मृत हो चुकी हो और उसके मात्र दो कलाकार ही बचे हों तब उसका फिर से जीवित हो उठना सुखद आश्चर्य से भरता है.

फिर मधुबनी चित्र कला के तहत ‘कोहबर घर’ का चित्रित किया जाना अनूठेपन का चरम रूप है. ये स्थानीय रस्म पढ़े जाने के दौरान मन को निरंतर गुदगुदाती रही. पद्मश्री बऊआ देवी, जो मधुबनी चित्रकला की राष्ट्रीय ख्याति की चित्रकार हैं, स्वयं उनके द्वारा इस चित्रकला के विषय में बताया जाना, इस विषय के प्रति पाठक के विश्वास को बल प्रदान करता है.
कला यात्राएं खासकर आदिवासी कला यात्राएं आसान नहीं होतीं इनके रास्ते में आने वाली बाधाओं से हम अच्छी तरह परिचित हैं. यहां सीधे हमें इन आदिवासी लोक-चित्रकारों से सुनने को मिलता है.
छत्तीसगढ़ भारत का सघन और विस्तृत आदिवासी राज्य रहा है. कभी यह मध्य प्रदेश का हिस्सा था तब मध्य प्रदेश कितना कला संपन्न राज्य था अब रिक्त मध्य प्रदेश की शुभकामनाएं छत्तीसगढ़ की आदिवासी-लोक चित्र कला के साथ हैं. क्या बिहार के मन में भी झारखंड की आदिवासी लोक-चित्रकला को लेकर ऐसे भाव होंगे?
छत्तीसगढ़ की आदिवासी लोक-चित्रकला और उनके चित्रकारों के विषय में इस पुस्तक में मुश्ताक खान ने शानदार और संवेदनशील ढंग से लिखा है. रजवार भित्तिअलंकरण एवं भित्तिचित्र, छत्तीसगढ़ के पारंपरिक भित्तिअलंकरण, केवट भित्तिचित्र, सोनाली भित्तिचित्र, गोदना चित्र, उरांव चित्र, माड़िया मृतक स्तंभ चित्र, मुरिया चित्र, जगार भित्तिचित्र आदि की संपन्नता छत्तीसगढ़ राज्य में बिखरी है.
जनगढ़ श्याम, भूरी बाई एवं अन्य छत्तीसगढ़ राज्य से ही आए. इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध कलाकार जगदीश स्वामीनाथन के योगदान को कैसे भूला जा सकता है, जिनका जिक्र मुश्ताक खान ने आदर से किताब की प्रस्तावना में किया है.
छत्तीसगढ़ के साथ गुजरात की आदिवासी चित्रकला के विविध कलारूप राठवा पिठौरा चित्र, माता नी पछेड़ी, जोगी चित्र, कच्छ के भित्तिचित्र, रोगन चित्रकारी, झारखंड, पैटकार चित्र, सोहराई भित्तिचित्र, कर्नाटक एवं चित्तारा भित्तिचित्र को साधते, समृद्ध करते आ रहे आदिवासी लोक-चित्रकारों से लेखक की बातचीत इस किताब का आधार है.

मगर इस सच से आंख नहीं चुराई जा सकती कि आदिवासी लोक-चित्रकारों का जीवन अब भी कठिनाइयों से भरा है और यह बस उनकी जिद है जो तमाम बदलावों के बावजूद इस कला को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए सामने आती आ रही है.
आदिवासी-लोक चित्रकला के कुछ अन्य पहलू भी हैं जो हमसे संरक्षणवादी संवेदनशीलता की चाह रखते हैं. वे चाहते हैं कि इस पूंजीवादी चमक-दमक भरे दौर में उनकी कला के साथ-साथ उनकी जीवन-समृद्धि की मानसिकता भी बनी रही. उनके द्वारा किया जाने वाला कला का मूल्य-निर्धारण बस कला-मूल्य निर्धारण तक ही सीमित न रहकर उन्हें कला से हासिल होने वाली पहचान और यश से वंचित न कर दे.
कला इस हद तक न पहुंचे कि उसका क्रय मूल्य है इसलिए वह इक कला है बल्कि वह इस रूप में रहे कि वह एक परंपरागत समृद्ध कला है. और समाज में उसका विशेष स्थान है.
शासकीय स्तर पर, सम्मान के स्तर पर, अवसर मिलने के अवसर पर होने वाली राजनीति और भ्रष्टाचार से हम सब परिचित हैं. इस पुस्तक में कई आदिवासी लोक कलाकार ऐसे भी होंगे जो इस वजह से अपनी बात नहीं कह पाए होंगे कि कहीं उन्हें मिलने वाले अवसर जो उनके जीवनयापन-व्यय से जुड़े हैं, से वंचित न कर दिया जाए. हम अप्रत्यक्ष उनका कहा इस किताब में पढ़ सकते हैं. एक शानदार किताब के लक्षण भी यही होते हैं कि वह जितनी प्रत्यक्ष होती है उससे कहीं अधिक अप्रत्यक्ष होती है.
महाराष्ट्र के मांडना भित्तिचित्र, वर्ली भित्तिचित्र, चित्रकला चित्र, मिजोरम के मिज़ो आदिवासी चित्र, नगालैंड के नगा आदिवासी चित्र, तेलंगाना के नक्काश पट्टम, त्रिपुरा के त्रिपुरा लोक चित्र, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के अनुष्ठानिक भित्तिचित्र, भूमिचित्र, भारत के हस्तचित्रित गंजीफ़ा के साथ-साथ ओडिशा के ठिया बढ़िया पटचित्र, ताक़तवर चित्र, झोटी-चिटा चित्र, कौंध भित्तिचित्र, सौराष्ट्र इडियट भित्तिचित्र तथा राजस्थान के फड़चित्र, मीणा मांडणा भित्तिचित्र, कांवड़ चित्र तथा पिछवई चित्रों पर इस किताब में विस्तार और व्यवहारिकता से आदिवासी-लोक चित्रकारों से बात की है यही वजह है कि यह आदिवासी लोक-चित्रकला पर दस्तावेजी किताब बन गई है.
इस किताब में आदिवासी लोक चित्रकलाओं के रचियता ये कलाकार इतनी सरलता से कलाओं को लेकर अपनी बात करते हैं कि उन्हें हैरत होती है; दंग इस बात पर रह जाना पड़ता है इन्हें सुनते हुए कि इनके लिए कला और जीवन दो अलग सक्रियताएं नहीं हैं. भले ही आज बाजारीकरण ने उन्हें दोहराव और पुनरावृत्ति की ओर धकेल दिया हो, और इन कलाकारों में कलादोष और जीवन दोष पैदा हुआ हो मगर पहचान और संरक्षण के स्तर पर आदिवासी लोक-चित्रकला का प्राथमिक और प्रारंभिक चरण कितना महत्वपूर्ण रहा है.
ये इस किताब का उल्लेखनीय पक्ष है जिसके प्रकाश में भारत के राज्यों के भीतर आदिवासी-लोक चित्रकला की उजली यात्रा की जा सकती है.
इस पुस्तक की एक अन्य समृद्ध खासियत जिसके बिना इसका संपूर्ण उल्लेख अपूर्ण रह सकता वह है इसमें आदिवासी लोक-कलाकारों द्वारा बनाए गए वे चित्र जो कलाकारों के कथन और इस पुस्तक के लेखक को वैधता प्रदान करते हैं. इनमें प्राथमिक चरण में बने चित्रों के साथ-साथ कुछ बाद में बने चित्रों की छायाएं देखी जा सकती हैं.
मगर इन चित्रों को देखने परखने वालों से यह उम्मीद बांधी की जा सकती है कि वह इन चित्रों के बारीक विन्यास को देखने के लिए पर्याप्त समय देंगे. कहा जा सकता है इस पुस्तक को पढ़ने में आपके समय का जितना सही व्यय नहीं होगा. उतना सार्थक व्यय आपका इस पुस्तक में श्रमसाध्य विवेकपूर्ण चयन से शामिल किये गए चित्रों को देखने होगा.

इन चित्रों के आत्म तक पहुंचने के लिए लंबी चौखटों के बीच के टिकुली सरीखे रंग-बिरंगे बिंदुओं, उन तिर्यक टेढ़ी-सीधी आकृतिनुमा लघु रेखाओं को पार करना आवश्यक है. इन चित्रों के उत्कृष्ट चयन के लिए मुश्ताक खान के कला विवेक की अलग से प्रशंसा की जा सकती है कि जितना श्रम उन्होंने कलाकारों से मिलने, उनसे बात करने, उनसे की हुई बात को दर्ज करने को दिया उससे कहीं अधिक समय उन्होंने इन आदिवासी लोकचित्रों को हासिल करने और उनका चयन करने में दिया,जिससे यह किताब पाठक की अध्ययनशीलता और संग्रहणीयता की प्राथमिकता तक पहुंच सकने की क्षमता के एकदम नज़दीक पहुंच सकी.
एक ऐसी किताब हो सकी जो भारत की आदिवासी लोक-चित्रकला को उसकी पूर्णता में पाठक समाज के सामने लेकर उपस्थित हुई है. मेरे साथ-साथ इस कला-आत्मीय, कला-मोहक किताब को पढ़कर आप भी कह सकते हैं- हां मैं भी आदिवासी-लोक चित्रकार के हाथों बनाया गया एक चित्र हूं.
(लेखक कवि, सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं.)
