नई दिल्ली: असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा और उनकी पत्नी रिनिकी भूयां शर्मा की संयुक्त संपत्ति 2021 के 17.27 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026 में 35.16 करोड़ रुपये हो गई है. यह जानकारी भाजपा नेता द्वारा शुक्रवार को दाखिल किए गए हलफनामे से सामने आई है.
हिमंता बिस्वा शर्मा ने आगामी विधानसभा चुनाव में जालुकबाड़ी सीट से उम्मीदवार के रूप में नामांकन पत्र के साथ यह हलफनामा दाखिल किया. चुनाव 9 अप्रैल को एक ही चरण में होने हैं और मतगणना 4 मई को होगी.
2016 में मुख्यमंत्री के परिवार की कुल संपत्ति लगभग 6.4 करोड़ रुपये थी. वर्तमान हलफनामे में भाजपा नेता ने बताया कि उनके पास केवल चल संपत्ति है, जिसका कीमत 2026 में 2.36 करोड़ रुपये है, जबकि 2021 में यह 1.72 करोड़ रुपये थी.
वहीं, रिनिकी भुयां शर्मा के पास चल और अचल दोनों प्रकार की संपत्तियां हैं, जो 2021 के 16.19 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026 में 32.79 करोड़ रुपये हो गई हैं.
वित्तीय वर्ष 2024–25 में मुख्यमंत्री की आय 29,62,920 रुपये थी, जबकि उनकी पत्नी की आय 4,19,25,000 रुपये थी.
हिमंता बिस्वा शर्मा ने कहा है कि उनके पास बॉन्ड, डिबेंचर, शेयर, म्यूचुअल फंड आदि में कोई निवेश नहीं है, जबकि उनकी पत्नी के पास 5.10 करोड़ रुपये के निवेश हैं. इसके अलावा, उनके पास 1.77 करोड़ रुपये का जीवन बीमा भी है.
नकदी और बैंक जमा की बात करें तो मुख्यमंत्री के पास 2.28 लाख रुपये नकद और चार बैंक खातों में कुल 68,01,943 रुपये जमा हैं. उनकी पत्नी के पास 3.16 लाख रुपये नकद और 74,85,248 रुपये बैंक जमा हैं.
देनदारियों के तहत हिमंता बिस्वा शर्मा ने 95 लाख रुपये के बैंक और संस्थागत ऋण घोषित किए हैं, जबकि उनकी पत्नी पर 15.91 करोड़ रुपये का कर्ज है.
हलफनामे के अनुसार, न तो मुख्यमंत्री और न ही उनकी पत्नी के पास कोई कृषि भूमि है. हालांकि, रिनिकी भुयां शर्मा के पास तीन गैर-कृषि संपत्तियां हैं – जिनमें से दो खरीदी गई हैं और एक विरासत में मिली है. इनकी कुल बाजार कीमत 19.25 करोड़ रुपये है.
मणिपुर: तीन साल बाद भी गैंगरेप की शिकार दो कुकी-ज़ो महिलाओं को न्याय नहीं
मणिपुर के थौबल ज़िले में दो कुकी-जो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने और उनके साथ सामूहिक बलात्कार की घटना के लगभग तीन साल बाद भी न्याय नहीं मिल पाया है. इस हमले में एक पीड़िता के भाई और पिता की हत्या कर दी गई थी.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में तीन आरोपी अब भी फरार हैं, दो जमानत पर बाहर हैं, और एक अन्य की जमानत याचिका इस महीने के अंत में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है.
पीड़िताओं में से एक के पति, जो पूर्व सेना के जवान और मामले के प्रमुख गवाह हैं, ने द हिंदू को बताया कि मुख्य आरोपी लोया, जिस पर दोनों पुरुषों की हत्या का आरोप है, अब भी खुलेआम घूम रहा है. उनका आरोप है कि उसे गिरफ्तार करने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं.
इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कर रहा है. मणिपुर पुलिस ने जुलाई 2023 में एक नाबालिग सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया था.
गवाह ने मुकदमे की धीमी गति पर चिंता जताते हुए कहा, ‘हम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल होते हैं (मुकदमा गुवाहाटी में चल रहा है). न्याय अब भी दूर है. दो आरोपी पहले ही जमानत पर हैं. मुख्य आरोपी लोया, जिसने दोनों पुरुषों की हत्या की, उसे हम जानते थे. पीड़िता के बयान के बावजूद उसे गिरफ्तार नहीं किया गया और वह खुलेआम घूम रहा है.’
3 मई 2023 को जब मणिपुर में कुकी-ज़ो और मेईतेई समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़की, तो पीड़ित महिलाएं कांगपोकपी ज़िले में अपने गांव से भाग गई थीं. जांचकर्ताओं के अनुसार, अगले दिन लगभग 1000 लोगों की भीड़ ने उनके गांव पर हमला किया.
सीबीआई द्वारा दायर आरोपपत्र में कहा गया है कि लोया ने एक बड़े लकड़ी के लट्ठे से एक पीड़िता के भाई और पिता की पीट-पीटकर हत्या की और यौन हिंसा में भी शामिल था. अन्य दो आरोपी – चिंगलेन और इनाओतोन – जिन्हें पीड़िताओं ने महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने और हमले में शामिल बताया है, वे अभी भी फरार हैं.
यह घटना 4 मई 2023 को हुई थी, लेकिन 19 जुलाई को इसका वीडियो वायरल होने के बाद ही देशभर में मामला सामने आया, जिससे व्यापक आक्रोश फैल गया और सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा. बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई, जिसने 12 अक्टूबर 2023 को आरोपपत्र दाखिल किया. पीड़िताओं के लिए मणिपुर घाटी क्षेत्र में जाना संभव नहीं होने के कारण मुकदमा गुवाहाटी स्थानांतरित कर दिया गया.
8 सितंबर 2025 को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने दो आरोपियों – नामेराकपम किरण मेईतेई और अरुण खुंदोंगबम – को जमानत दे दी. अदालत ने गंभीर आरोपों को स्वीकार करते हुए कहा कि बिना मुकदमे के लंबी हिरासत को सजा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
सीबीआई के आरोपपत्र के अनुसार, खुंदोंगबम भीड़ का हिस्सा था और यौन उत्पीड़न, सामूहिक बलात्कार, महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने और हत्या में सक्रिय भूमिका निभाई थी. किरण मेईतेई पर अपराध में शामिल होने और हमले का वीडियो फैलाने का आरोप है. दोनों की पहचान पीड़िताओं ने वर्चुअल पहचान परेड (Test Identification Parade) में की थी.
आरोपपत्र में यह भी कहा गया है कि मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने महिलाओं की मदद करने से इनकार कर दिया और कथित तौर पर कहा कि पुलिस वाहन की ‘चाबी नहीं है’, जिसके बाद वे महिलाओं को भीड़ के हवाले छोड़कर चले गए.
जांच के अनुसार, पीड़िताएं अगले 48 घंटों तक जंगलों के रास्ते भागकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचीं. इस मामले में एफआईआर वीडियो सामने आने के बाद दर्ज की गई. सीबीआई ने कहा कि पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच अब भी जारी है और एजेंसी ने दो आरोपियों को मिली जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.
एक अन्य आरोपी युमलेम्बम जीबन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है, जिसमें 16 दिसंबर 2025 के गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी. उस पर हमले का वीडियो रिकॉर्ड करने और साझा करने का आरोप है और उसने पहले से जमानत पर बाहर दो आरोपियों के समान राहत की मांग की है. इस मामले की सुनवाई 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में होनी है.
अन्य तीन आरोपी – हुइरेम हेरोदाश मेईतेई, निंगोम्बम तोम्बा सिंह और पुखरीहोंगबम सुरंजॉय मेईतेई – अब भी जेल में हैं.
त्रिपुरा: मुख्यमंत्री की ‘लोकतंत्र बनाम राजशाही’ टिप्पणी पर राजनीतिक बवाल
त्रिपुरा में हाल ही में मुख्यमंत्री माणिक साहा की टिप्पणियों के बाद एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. उन्होंने चार दिन पहले अगरतला में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान जोर देकर कहा कि ‘यह राजशाही नहीं, लोकतंत्र है.’ उनके इस बयान को व्यापक रूप से टिपरा मोथा की ओर इशारा माना गया.
मुख्यमंत्री ने कहा कि राजशाही का युग समाप्त हो चुका है और राजनीतिक दलों को सावधानी बरतनी चाहिए. साथ ही शासन के मूल सिद्धांत के रूप में लोकतंत्र को मजबूत करने की बात दोहराई. हालांकि, उनकी इस टिप्पणी ने अब पूरे राज्य में तीखी राजनीतिक बहस और अटकलों को जन्म दे दिया है.

इन घटनाक्रमों के बीच सोशल मीडिया टिप्पणीकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने आगामी त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज़ ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (एडीसी) चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी और टिपरा मोथा के बीच संभावित समझौते को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.
इस राजनीतिक विवाद को और हवा देते हुए कांग्रेस विधायक सुदीप रॉय बर्मन ने भाजपा की रणनीति और मुख्यमंत्री के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने टिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मा को ‘राजा’ बताते हुए कहा कि उनके निर्देशों का पालन करना पड़ेगा.
रॉय बर्मन ने सवाल उठाया कि भाजपा, जिसने पहले एडीसी चुनावों की सभी 28 सीटों पर चुनाव लड़ने का संकेत दिया था, अब कथित रूप से केवल 10 सीटों पर ही क्यों लड़ने का निर्णय ले रही है. उन्होंने पूछा कि क्या यह बदलाव राजनीतिक मजबूरी है या टिपरा मोथा नेतृत्व के दबाव का परिणाम.
उन्होंने मुख्यमंत्री के उस पुराने बयान पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि टिपरा मोथा का कोई जनाधार नहीं है. रॉय बर्मन के अनुसार, वर्तमान हालात इसके विपरीत संकेत दे रहे हैं. उनका कहना है कि अब आम धारणा बन रही है कि पहाड़ी क्षेत्रों में भाजपा अपनी पकड़ खो रही है, जिसके चलते सीटों की संख्या घटाई जा रही है.
कांग्रेस नेता ने मुख्यमंत्री के कड़े सार्वजनिक बयान और टिपरा मोथा के साथ संभावित समझ के बीच दिख रहे विरोधाभास पर भी सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि अगर अंततः गठबंधन होना ही था, तो सोशल मीडिया पर ऐसा ‘राजनीतिक नाटक’ क्यों किया गया.
रॉय बर्मन ने यह भी कहा कि अब कई नागरिक सरकार से स्पष्ट जवाब चाहते हैं कि क्या भाजपा टिपरा मोथा के साथ गठबंधन किए बिना त्रिपुरा में अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रख सकती है. उन्होंने मुख्यमंत्री से पार्टी की स्थिति को पारदर्शी रूप से स्पष्ट करने की मांग की.
इन घटनाओं ने राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच व्यापक प्रतिक्रिया पैदा कर दी है. हालांकि सत्तारूढ़ भाजपा ने अभी तक किसी औपचारिक गठबंधन की पुष्टि नहीं की है, लेकिन उभरती स्थिति यह संकेत दे रही है कि स्थानीय निकाय चुनावों से पहले त्रिपुरा की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि इन्हीं में यह तय होगा कि क्या कोई औपचारिक गठबंधन बनता है या मौजूदा घटनाक्रम केवल रणनीतिक माहौल बनाने का हिस्सा हैं.
मिज़ोरम: कांग्रेस ने राज्य सरकार पर चावल आपूर्ति में ‘व्यापक भ्रष्टाचार’ का आरोप लगाया
मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एमपीसीसी) ने 20 मार्च को सत्तारूढ़ ज़ोराम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) सरकार पर तीखा हमला करते हुए राज्य की चावल आपूर्ति प्रणाली में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के आरोप लगाए.
इंडिया डुटे की रिपोर्ट के मुताबिक, एमपीसीसी के अध्यक्ष लाल थानज़ारा ने कहा कि जेडपीएम सरकार से जनता की उम्मीदें दो साल के भीतर ही ‘व्यापक निराशा’ में बदल गई हैं. आइज़ोल में एक पार्टी बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार पारदर्शिता और स्वच्छ शासन के अपने वादों पर खरी नहीं उतरी है.

कांग्रेस नेता ने चावल आपूर्ति श्रृंखला में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार ने चावल की कीमतें बढ़ा दी हैं और एक निजी कंपनी को आपूर्ति का ठेका दिया है, जिसे उन्होंने अविश्वसनीय बताया. उन्होंने दावा किया कि पार्टी की आंतरिक निगरानी में परिवहन प्रक्रिया में गड़बड़ियां सामने आई हैं. उनके अनुसार, जहां एक ट्रक एक बार में लगभग 700 चावल की बोरियां ले जा सकता है, वहीं रिकॉर्ड में इससे काफी कम मात्रा दिखाई गई है.
थनज़ारा ने कहा, ‘ये संभावित भ्रष्टाचार के स्पष्ट संकेत हैं.’ और जोड़ा कि इन निष्कर्षों को औपचारिक रूप से राज्य की भ्रष्टाचार-रोधी निगरानी संस्था, ‘विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो’ को दी जाएगी.
कांग्रेस ने सरकार की खरीद और वितरण प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए आवश्यक वस्तुओं के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी का आरोप लगाया.
यह आरोप ऐसे समय में सामने आए हैं जब मिज़ोरम आगामी आइज़ोल नगर निगम चुनाव की तैयारी कर रहा है, जिससे सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच राजनीतिक मुकाबला और तेज हो गया है.
अरुणाचल प्रदेश: तवांग में पीडब्ल्यूडी की पारदर्शिता को लेकर प्रदर्शन, लोगों ने उठाए सवाल
अरुणाचल प्रदेश के तवांग डिवीजन में सैकड़ों स्थानीय निवासियों ने मंगलवार को शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया. इस दौरान उन्होंने लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) द्वारा किए जा रहे टेंडर प्रक्रियाओं में कथित भ्रष्टाचार, प्रक्रियात्मक खामियों और पारदर्शिता की कमी पर चिंता जताई.
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि ट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (एसआईडीएफ) और रूरल इंजीनियरिंग (आरई) जैसी योजनाओं के तहत करोड़ों रुपये के ठेके बिना उचित दिशानिर्देशों का पालन किए और पारदर्शिता सुनिश्चित किए बिना दिए जा रहे हैं. उनका कहना था कि हाल के कई टेंडर स्थापित नियमों का पालन किए बिना जारी किए गए.
प्रदर्शन के दौरान एक प्रमुख मुद्दा यह भी उठाया गया कि स्थानीय विधायक को कथित तौर पर क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों और प्रस्तावों की जानकारी नहीं दी जा रही है. प्रदर्शनकारियों के अनुसार, इससे जवाबदेही कमजोर होती है और जनता का प्रतिनिधित्व प्रभावित होता है. उन्होंने कहा कि जनहित की रक्षा के लिए विकास कार्य जनप्रतिनिधि की जानकारी और सहभागिता के साथ होने चाहिए.
प्रदर्शनकारियों ने पीडब्ल्यूडी तवांग डिवीजन के कार्यपालक अभियंता तादर न्याकपू और सहायक अभियंता जुम्पे एते के तत्काल तबादले की मांग की. साथ ही, इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की भी मांग की गई.
अन्य मांगों में 11 फरवरी, 5 मार्च और 13 मार्च 2026 को जारी टेंडर नोटिस रद्द करने की मांग शामिल है. प्रदर्शनकारियों ने खासकर 50 लाख रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट्स के लिए पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की बात कही.
इन मांगों को लेकर एक ज्ञापन उपायुक्त को सौंपा गया है, जिसमें एक सप्ताह के भीतर जवाब देने की समयसीमा तय की गई है.
एक प्रदर्शनकारी ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘यदि निर्धारित समय में हमारी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो लोग अनिश्चितकालीन लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू करने को मजबूर होंगे.’
यह घटनाक्रम अरुणाचल प्रदेश में सार्वजनिक कार्यों में पारदर्शिता और विभागीय जवाबदेही को लेकर चल रही व्यापक चर्चाओं के बीच सामने आया है.
सिक्किम: वन विभाग ने कर्मचारियों के ऑफिस के समय में रील्स बनाने पर रोक लगाई
सिक्किम वन और पर्यावरण विभाग ने कर्मचारियों को काम के घंटों के दौरान सोशल मीडिया पर रील्स बनाने या निजी सामग्री पोस्ट करने से रोक दिया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, शुक्रवार (20 मार्च) को पीसीसीएफ-सह-प्रधान सचिव प्रदीप कुमार द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, कर्मचारियों को ड्यूटी पर रहते हुए निजी सोशल मीडिया सामग्री बनाने या शेयर न करने का निर्देश दिया गया है.
आदेश में कहा गया है कि इस कदम का उद्देश्य पेशेवरता बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि आधिकारिक समय पूरी तरह से काम से संबंधित जिम्मेदारियों के लिए समर्पित हो.
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आदेश वानिकी, पर्यावरण और वन्यजीव जागरूकता से संबंधित डिजिटल सामग्री बनाने की अनुमति देता है, बशर्ते वह आधिकारिक उद्देश्यों की पूर्ति करती हो. इसी तरह का एक नियम पहले सिक्किम पुलिस द्वारा लागू किया गया था, जिसमें कर्मियों को वर्दी में रहते हुए रील्स बनाने से प्रतिबंधित किया गया था.
