एक तरेंगन, दो तरेंगन: लोक और परलोक की क़िस्सागोई

पुस्तक समीक्षा: अंजु रंजन का कहानी संग्रह 'एक तरेंगन, दो तरेंगन' के स्त्री किरदार अलग से चमकते हैं, उन किरदारों की आभा एक बेहतर बनती हुई दुनिया, एक बेहतर दुनिया के लिए सपने देखने और एक बेहतर दुनिया के लिए उनकी बाहरी-भीतरी जद्दोजहद का इशारा करती है.

अंजु रंजन की कहानियां परिचित संसार में अपरिचित-सी दुनियाओं के लिए जिज्ञासा जगाती हैं, उनसे मिलवाती हैं. (आवरण साभार: सर्व भाषा ट्रस्ट)

मैं हलफिया बयान करना चाहता हूं कि एक कहानीकार के रूप में जो मेरी समझ बनी है, पाठक के रूप में बनी समझ से थोड़ी अलग है, जब मैं अपने किसी समकालीन कहानीकार की कहानियां पढ़ रहा होता हूं तो मेरे भीतर के कहानीकार और पाठक मिलकर एक अलग ही कॉकटेल समझ के साथ आ खड़े होते हैं.

‘एक तरेंगन, दो तरेंगन‘ नामक अंजु रंजन का नया कहानी संग्रह पढ़ते हुए रौशनख़याली के टिमटिमाते दीए की लौ, जड़ों से जुड़ाव की महक, संवेदना की छुअन, यात्राओं का नमक और ‘वैल रैड’ मानस की गमक महसूस होती रहती है.

उनके कहन में निजता है, एक स्वाभाविकता, एक मौलिकता. इतनी निजता कि कोई पाठक उनकी एक कहानी पढ़ने के बाद उस कहन को अपने साथ ले जाता है कि कहीं अंजु जी को चार पंक्तियां भी बिना नाम के मिल जाएं तो पाठक पहचान लेगा कि यह तो उनका लिखा है. या उनके जैसा लिखा है. इस निजता को अर्जित करने में कई बार लेखक को उम्र लग जाती है.

उनकी जो कहानियां विदेश में घटित होती हैं, उनमें सबसे खास बात है भारतीय मन की उपस्थिति. यह भाव जितना सरल लगता है, उतना है नहीं. लेखक की गहरी भावभूमि का प्रकटीकरण है. और कहानियों में इसका सहजता से आना ही इसकी खूबसूरती है. कई बार तो मेरा पाठक मन इंतजार करता है कि लेखक का भारतीय मन कितनी पंक्तियों या पन्नों से उभर क्यों नहीं रहा. यह मेरी सात्विक कामना का रूप धारण कर लेता है.

जब वे झारखंड के भूगोल या किरदारों की कहानी रचती हैं, पाठक एक आत्मीयता का गहरा धागा अपने गिर्द महसूस किए बिना नहीं रह सकता. अपने लोक को इतने प्रेम से देखना और पाठक तक पहुंचाना हिंदी साहित्य के फैशनमूलक लेखक समाज ने लगभग भुला दिया है. रसूल हमजातोव की बातों को याद करूं तो अपने लोकल के साथ इस रिश्ते के बिना हम क्या ही हैं, क्या ही कहानी कह लेंगे, क्या ही दुनिया जीत लेंगे..

वे परिचित संसार में अपरिचित-सी दुनियाओं के लिए जिज्ञासा जगाती हैं, उनसे मिलवाती हैं, और यही वह पहलू हैं, जहां कोई लेखक मुझे सबसे प्रिय हो जाता है. ज्ञात के अज्ञात कोनों की यात्रा अगर लेखक नहीं करवाता तो मेरी निगाह में क्या खाक लेखक!

देश- विदेश में प्रशासनिक सेवाओं का लोक जितनी बारीकी, संवेदना और विस्तार के साथ उनकी कुछ कहानियों में आता है कि मुझे इसे दुर्लभ सुखद घटना कहना चाहिए. उन किरदारों की मानवीयता के साथ उनकी सहज वलनेरेबलिटी का जो कोलाज वे बनाती हैं, वह बुनियादी समझ और सतत अभ्यास का परिणाम लगता है, आकस्मिक घटना नहीं. बड़ी सहजता से वे भौगोलिक, सांस्कृतिक फलक का विस्तार करती हैं, और यह विस्तार ‘ब्लेसिंग इन डिसगाइज’ (या आउट ऑफ द ब्लू) के रूप में हिंदी साहित्य के फलक को विस्तार ही नहीं, गहराई और ऊंचाई भी दे देता है.

अंजु की इन दस कहानियों के स्त्री किरदार अलग से चमकते हैं, उन किरदारों की आभा एक बेहतर बनती हुई दुनिया, एक बेहतर दुनिया के लिए सपने देखने और एक बेहतर दुनिया के लिए उनकी बाहरी-भीतरी जद्दोजहद का इशारा करती है.

रेखांकित किया जाना चाहिए कि उनकी कहानियों में संवाद अलग किरदार की तरह खिलते हैं. पहले खिलते हैं, फिर महकते हैं, और फिर वह महक देर तक पाठक को महकाए रहती है. उन संवादों में सांस्कृतिक बहुरंगीपन, हाजिरजवाबी और संजीदगी के साथ सहज हास्य का छौंक रहता है. उनकी संवाद शैली में उनकी कहानियों को पठनीय बनाने की रेसिपी छुपी है. कहानियां इसी मसाले से स्वादिष्ट हो जाती हैं. वह खास मसाला तैयार करना लेखक का हुनर है, रहस्य है. एक पाठक के रूप में मैं व्यंजन का स्वाद ही पहचान रहा हूं, आनंदित हो रहा हूं.

सर्व भाषा ट्रस्ट से छपी इस किताब की कहानियां पाठक से कुछ मांग करती हैं- थोड़ा समय, थोड़ा, ध्यान, थोड़ा प्यार और ‘स्क्रीन की ग़ुलामी’ वाले समय में थोड़ा सा धीरज. बदले में बहुत कुछ देती हैं- थोड़ा सहलाती हैं, कुछ सिखाती हैं, कुछ दिखाती हैं, भागती जिंदगी में थोड़ा ठहराव देती हैं- सुकून वाला ठहराव.

कहानियों का कहन ऐसा कि कभी दोस्त की तरह हाथ थामती हैं, कभी दादी- नानी की तरह सिर पर हाथ रखती हैं, कभी गुरु की तरह राह दिखाती हैं, कभी ‘एम्पथी’ यानी समानुभूति के लिए कंधा बन जाती हैं.

‘गोल्डन जुबली तलाक’ कहानी पहले तो अपने शीर्षक से आकर्षित करती है, फिर अंत तक आते-आते प्रत्याशित से अप्रत्याशित की तरफ लुढ़कती हुई पाठक को कथा का सुख ही नहीं देती, साहित्यिक और सामाजिक प्रासंगिकता के मानकों पर कथाकार के सुचिंतित और सार्थक हस्तक्षेप में बदल जाती है.

चाहे औपन्यासिक घटनाक्रम और विस्तार वाली ‘लव इन हजारीबाग’ कहानी हो, जो अल्हड़ उम्र के प्रेम का गीत ही है कि इसे पढ़ते हुए प्रेम करने के खयाल से ही प्रेम जाए या फिर ‘तुम्हें कैसे न करूं’ कहानी हो, तो कुल मिलाकर, उनकी कहानियां अपने मूल में प्रेम कहानी न भी हो, प्रेम, अंतर्जातीय प्रेम, प्रेम की अनुकूल- प्रतिकूल, समाज नियंत्रित परिणतियां आदि प्रेम के ही रंग रहते हैं, जैसे एक अटूट भरोसा है कि दुनिया प्रेम से ही बेहतर और सुंदर होगी.  और कहानियों से बनेगी, और ऐसी कहानियों से बनेगी, जिनमें प्रेम होगा. यह भरोसा इस कहानी संग्रह की प्राण वायु है, यही ‘लार्जर कैथार्सिस’ है.

छीजते भरोसे के कोलाज बनती अंजु रंजन की किस्सागोई भी भरोसे की पुनर्स्थापना की कोशिशें ही लगती है.

(दुष्यंत लेखक हैं, हिंदी फिल्म जगत से जुड़े हैं.)