अमेरिकी युद्ध, प्रतिबंध और ईरान का उभार: पश्चिम एशिया की बदलती सत्ता-संरचना

पुस्तक अंश: ईरान के नेतृत्व को अच्छी तरह पता था कि ईरान अमेरिका और उसके मित्रों का हमला झेल नहीं पाएगा. अमेरिका की क्रूज मिसाइलें और बम उसके अस्तित्व के लिए ख़तरा थे. इस तरह के युद्ध को टालना ज़रूरी था. उत्तर कोरिया की तरह उसके पास परमाणु हथियार की ढाल भी नहीं थी और न ही उसे बनाने की इच्छा और क्षमता थी.

(फोटो साभार: वाम प्रकाशन)

वाम प्रकाशन से प्रकाशित ‘तख़्तापलट- तीसरी दुनिया में अमेरिकी दादागिरी’ लेखक विजय प्रशाद की महत्वपूर्ण कृति है, जिसका हिंदी अनुवाद संजय कुंदन ने किया है. मूल रूप से ‘वॉशिंगटन बुलेट्स’ शीर्षक से प्रकाशित यह पुस्तक ‘तीसरी दुनिया’ के देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप, युद्धों और राजनीतिक दखल की गहन पड़ताल करती है.

प्रस्तुत अंश पश्चिम एशिया में ईरान, इराक, सीरिया और लेबनान के संदर्भ में अमेरिकी नीतियों, प्रतिबंधों और सैन्य रणनीतियों के प्रभाव को रेखांकित करता है, साथ ही क्षेत्रीय राजनीति और प्रतिरोध की जटिलताओं को समझने का प्रयास करता है.

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वर्ष 2001 से 2003 के बीच अमेरिका ने ईरान के दुश्मनों – अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान और इराक के सद्दाम हुसेन के ख़िलाफ़ दो लड़ाइयां लड़ीं. उनकी हार ने ईरान को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद की. इन युद्धों की रणनीतिक विफलता को भांपकर अमेरिका आनन-फानन ईरान को अपनी सीमाओं तक सीमित रखने की कवायद में लग गया. उसने 2005 में सीरिया जवाबदेही क़ानून (और 2011 में सीरिया के ख़िलाफ़ युद्ध) के ज़रिए ईरान और सीरिया का संपर्क तोड़ने की कोशिश की. इसके अलावा 2006 में लेबनान पर इजरायली हमले से लेबनान के राजनीतिक संगठन हिज्बुल्ला को कमज़ोर करने का भी प्रयास किया गया. दोनों में से कोई भी उपाय कारगर नहीं हुआ.

2006 में अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर शोर मचाना शुरू किया. उसने उस पर ख़ुद प्रतिबंध लगाया और संयुक्त राष्ट्र तथा यूरोपीय संघ से भी प्रतिबंध लगवाया. लेकिन इसका भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ और 2015 में अमेरिका ने उसके साथ परमाणु समझौता कर लिया, जिसे 2018 में ट्रंप ने ख़ारिज कर दिया. बहरहाल अमेरिकी प्रतिबंध का गहरा असर हुआ और ईरान की अर्थव्यवस्था सिकुड़ने लगी. ट्रंप ने अपनी नीति को ‘अधिकतम दबाव’ कहा.

संयुक्त राष्ट्र ने बार-बार दोहराया है कि प्रतिबंध एक मानवीय व्यवस्था नहीं है और इसे ज़्यादा दिन ताक़तवर देशों का हथियार बने रहने देना ठीक नहीं होगा. प्रतिबंध के तहत दवाओं और खाद्य पदार्थों को अपवाद बनाने की बात भी लगातार कही गई. अमेरिका दावा करता है कि वह लोगों को परेशान करने के लिए प्रतिबंध नहीं लगाता, इसलिए वह इसमें अपवाद भी रखता है. अगस्त 2019 में अमेरिका ने एक दिशानिर्देश जारी किया और वेनेजुएला के प्रति कथित नरम रवैये का इजहार किया. इसमें कहा गया था कि वेनेजुएला को मानवीय सहायता दी जा सकती है. हो सकता है यह सिर्फ जुमलेबाजी हो लेकिन ईरान के मामले में तो यह भी नहीं की गई. अमेरिका ने इस तरह का कोई दिशानिर्देश ईरान के लिए जारी नहीं किया. उलटे ईरान के ख़िलाफ़ अपने बहुपक्षीय युद्ध के एक हिस्से के रूप में उसने इन प्रतिबंधों को और कड़ा कर दिया.

1980 में ईरान ने कुद्स बल का गठन किया था. कुद्स यरूशलम का अरबी नाम है. शुरुआती दौर में कुद्स बल ने पश्चिम के हितों और क्षेत्रीय कम्युनिस्ट ताक़तों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. (इसमें अफ़ग़ानिस्तान के नजीबुल्लाह की कम्युनिस्ट सरकार पर हमला भी शामिल है.) लेकिन पिछले दशक में मेजर जनरल कासिम सुलेमानी के नेतृत्व में इस सेना ने अपना एक निश्चित अजेंडा तय कर लिया.

ईरान के नेतृत्व को अच्छी तरह पता था कि ईरान अमेरिका और उसके मित्रों का हमला झेल नहीं पाएगा. अमेरिका की क्रूज मिसाइलें और बम उसके अस्तित्व के लिए ख़तरा थे. इस तरह के युद्ध को टालना ज़रूरी था. उत्तर कोरिया की. पास परमाणु हथियार की ढाल भी नहीं थी और न ही उसे बनाने की इच्छा और क्षमता थी. हालांकि उसके सामने जनसंहार का हथियार त्याग देने वाले इराक और लीबिया का उदाहरण था. इनका उदाहरण बताता था कि परमाणु हथियार न रखने वाले देशों का क्या हश्र हो सकता था. न ही इराक और न ही लीबिया ने पश्चिम को चुनौती दी, फिर भी उन्हें बर्बाद कर दिया गया.

ऐसे में कुद्स बल ही था, जिसने ईरान पर पश्चिमी हमले को रोकने में अहम भूमिका निभाई. सुलेमानी की कुद्स सेना लेबनान से अफ़ग़ानिस्तान गई और उसने ईरान समर्थक समूहों से दोस्ती की और उन्हें लड़ाकू दल बनाने के लिए उत्साहित किया और हरसंभव मदद की. ईरान पर हमले की स्थिति में ये समूह किसी भी तरह से अमेरिकी ठिकानों पर हमले के लिए तैयार किए गए. सीरिया के ख़िलाफ़ युद्ध में इन समूहों की परीक्षा हुई.

जब 2020 की शुरुआत में अमेरिका ने सुलेमानी का हत्या करा दी, तब इरानियों ने कहा कि अगर उन पर और हमला हुआ तो वे दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) और हैफा (इजरायल) को तबाह कर देंगे. ईरान की मध्यम दूरी की मिसाइल दुबई को नुकसान पहुंचा सकती थी लेकिन इजरायल पर हमला हिजबुल्ला करता. इसका मतलब यह था कि अगर ईरान पर बमबारी हुई तो अमेरिका और उसके साथियों को क्षेलीय स्तर पर सुनियोजित गुरिल्ला युद्ध झेलना पड़ता. तो ये लड़ाकू गुट ईरान के लिए एक ढाल की तरह थे. उन्हें लड़ने- भिड़ने से कहीं ज़्यादा साम्राज्यवादी नंगई के ख़िलाफ़ अपनी सुरक्षा की मज़बूत तैयारी को दिखाने के लिए बनाया गया था.

ईरान की राजनीति एक तरफ़ अमेरिका और दूसरी तरफ़ उसके क्षेलीय साथियों (इजरायल और सऊदी अरब) के भारी दबावों के बीच विकसित हुई. 1979 में हुई ईरानी क्रांति ने अपने भीतर ईरानी वामपंथ को भी समेट रखा था, जिसका अब अस्तित्व नहीं है. इराक में थोड़े-थोड़े अंतराल पर कम्युनिस्टों का उभार होता रहा और उन्होंने 2011 के बाद सरकार के खिलाफ आंदोलन किए, जिसकी नीतियां आईएमएफ के अजेंडे से निर्धारित होती थीं.

इराकियों ने हाल के आंदोलनों में नारा बुलंद किया – ‘हमें एक मातृभूमि चाहिए.’ लेबनान से अफ़ग़ानिस्तान तक जनता ने यही नारा लगाया. ईरानी क्रांति के दौरान एक वामपंथी समूह ने न्याय मंत्रालय की दीवार पर लिखा – स्वतंत्रता की सुबह, स्वतंत्रता की जगह खाली है. (दर तुलु-ए आज़ादी, जाये आज़ादी खाली) वहां क्रांति तो हुई पर क्रांति के जितने वादे थे, वे सब नकार दिए गए.

(साभार: वाम प्रकाशन)