कुछ दिन पहले राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने सदन में पब्लिक लाइब्रेरी मूवमेंट का मुद्दा उठाया. इससे कुछ ही दिन पहले हिंदी के एक बड़े संपादक के पैतृक गांव में पुस्तकालय स्थापना का कार्यक्रम चर्चा में रहा, जिसमें कई नेता और सेलिब्रिटी उपस्थित रहे. इन सबके बीच मुझे अपने शहर फ़र्रुखाबाद की उस पब्लिक लाइब्रेरी की खबर मिली, जिसकी बदौलत मैंने और मेरे जैसे कई लोगों ने पढ़ना, लिखना और समझना सीखा. फ़र्रुखाबाद शहर की प्रसिद्ध कालेश्वरनाथ लाइब्रेरी बंद हो गई है. उसका हॉल अब सत्संग और धार्मिक चर्चा के लिए इस्तेमाल होता है.
अगर आपको एक दाने से पूरी पतीली के चावलों की स्थिति पता करने वाली कहावत समझनी हो, तो यह उसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है कि देश की अगली पीढ़ी के लिए हम क्या मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं, वह भी उस नाज़ुक मौके पर जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) नौकरियों और रोज़गार को हमेशा के लिए बदलने वाला है.
आंकड़ों की बात करें, तो भारत में पब्लिक लाइब्रेरी का नेटवर्क पिछले डेढ़-दो दशक में सिकुड़ते-सिकुड़ते अब 46,746 लाइब्रेरी पर आकर रुक गया है, जबकि 2000 के दशक के मध्य में इनकी संख्या 54,856 बताई गई थी, यानी कम से कम 8,000 से ज़्यादा सार्वजनिक पुस्तकालय गायब हो चुके हैं.
दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में कोविड से पहले 1.85 लाख सदस्य थे जो घटकर 1.5 लाख रह गए, और यह ट्रेंड हमें बताता है कि आम जनता, ख़ासकर शहरों के निम्न व मध्यम वर्ग के लिए मुफ़्त या सस्ती पढ़ाई की जगहें कम हो रही हैं, जिससे पढ़ने की आदत, फ़ोकस और आलोचनात्मक समझ जैसी बुनियादी क्षमताएं कमजोर पड़ती हैं.
यह तो सब जानते हैं कि नियमित और गहन पढ़ाई बच्चों की भाषा-कौशल, तर्क-शक्ति और आईक्यू जैसे सूचकों में मापने लायक सुधार करती है. इसलिए जब लाइब्रेरी बंद होती हैं या निष्क्रिय हो जाती हैं तो इसका मतलब सिर्फ इमारत बंद होना नहीं है. यह अगली पीढ़ी की बौद्धिक क्षमता पर सामूहिक कटौती है, जो आगे चलकर समाज के कुल आईक्यू और लोकतांत्रिक चेतना को नीचे खींचती है.
भारत की बात करें, तो इस गिरावट की सबसे डरावनी मार ग्रामीण और ग़रीब समाज पर पड़ रही है, जहां निजी किताबें, अच्छी कोचिंग और स्कूल पहले से ही दूर की चीज़ हैं. जब सरकारी या धर्मार्थ उद्देश्यों से चलने वाली लाइब्रेरी बंद होती हैं, तो पहला नुकसान उन बच्चों को होता है जिनके घर में किताबों की अलमारी तो छोड़िए, अख़बार तक नहीं आता.
अब कई लोग तर्क दे सकते हैं कि अब तो फोन पर सारी जानकारी मिल सकती है, कोचिंग के सब्सक्रिप्शन तक आसानी से उपलब्ध हैं, हर विचारधारा वाले यूट्यूब चैनल और ट्विटर अकाउंट लाखों तरह से फ़ैक्ट चेक कर रहे हैं, फिर समस्या क्या है?
इस बात का एक बड़ा सीधा सा जवाब है कि किताबें एल्गोरिदम के हिसाब से बदलती नहीं हैं. चाहे, डिस्कवरी ऑफ इंडिया हो या ओरिजन ऑफ स्पिशीज़, इनमें जो लिखा गया था, वही लिखा हुआ है. जबकि ऑनलाइन कॉन्टेंट ट्रेंड के साथ बदलता है. उदाहरण के लिए, नोटबंदी के फ़ायदे और नुकसान पर तमाम लेख लिखे गए, वीडियो बनाए गए. कई तरह से साबित हुआ कि यह कदम अर्थव्यवस्था के लिए उस तरह फ़ायदेमंद नहीं रहा, जिस तरह सोचा गया था.
मगर बीते दिनों आई ‘धुरंधर’ नाम की एक फिल्म की आशातीत सफलता के बाद इंटरनेट पर करोड़ों हैंडल यह बता चुके हैं कि नोटबंदी एक आर्थिक निर्णय नहीं, जासूसी मिशन का हिस्सा था. चूंकि, एआई इंटरनेट डेटा से फ़ीड लेकर ही जवाब देता है, तो कुछ साल बाद हर विषय के जवाब इसी तरह से दिए जाएंगे और यह हर विषय, हर स्तर पर होगा.
जिस तरह हज़ारों साल से चल रही घोड़ा-गाड़ियों को कुछ ही दशक में ऑटोमोबाइल ने खत्म कर दिया. किताबों की जगह कॉन्टेंट पर निर्भरता हमारी सांस्कृतिक विविधता पहचान को भी देखते ही देखते मिटा देगी. और ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ़ सरकार के द्वारा हो रहा है, दुनिया भर की ताकतवर कंपनियां भी अपने-अपने कारणों से ऐसा कर रही हैं.
अमेरिका ने दुनियाभर में लोकप्रिय चाइनीज़ खाने के खिलाफ़ लंबे समय से रेस्त्रां सिंड्रोम नाम की अफ़वाह फ़ैलाई, जो अब कई लोगों के लिए तथ्य बन चुकी है. फ़िलहाल वे, भारतीय दुपट्टे को स्कैंडिनेवियन स्कार्फ़ या कोल्हापुरी चप्पल को प्राडा सैंडल्स बताकर हथियाने में व्यस्त हैं. और यकीन मानिए, दस बीस साल तक इंटरनेट पर ये कॉन्टेंट पोस्ट होता रहेगा, तो एआई बताने लगेगा कि भारतीय महिलाएं स्कैंडिनेवियन स्कार्फ़ खूब इस्तेमाल करती हैं.
आने वाली पीढ़ी को पिछली पीढ़ी से बेहतर बनाने का एकमात्र तरीका है कि उसे नया सीखने की प्रेरणा के साथ-साथ पिछला अनुभव भी दिया जाए. किताबें इस मामले में बेहद ज़रूरी साधन हैं और जिस तरह टेक्नोलॉजी बदल रही है, कुछ समय बाद किताबें अमीरों का प्रिविलेज बन जाएंगी. वैसे ही, जैसे अब मोटा अनाज खाना, पैदल 10,000 कदम चलना या साइकिल से ऑफिस जाना संभ्रांत तबके का शौक है.
पूंजीवाद ने गरीबों से उनकी तमाम अच्छी चीज़ें एक-एक कर छीनी है, इसमें अगला नंबर किताबों का है. ऐसे बच्चों के लिए लाइब्रेरी ही वह इकलौती संभावना थी जहां वे सिर्फ मोबाइल, शॉर्ट-वीडियो और सतही ऑनलाइन कंटेंट से घिरे रहने की जगह भाषा, विज्ञान, समाज और दुनिया के बारे में पढ़कर अपने दिमाग को विस्तार दे सकते थे.
विडंबना यह है कि सार्वजनिक विमर्श में हम ‘प्रोपगैंडा यूनिवर्सिटी’, ‘ब्रेनवॉश कैंपस’ या ‘एकांगी नैरेटिव’ की आलोचना तो ज़ोर‑शोर से करते हैं, लेकिन जिन संस्थानों से आम नागरिक को सुलभ, विविध और तुलनात्मक ज्ञान मिलता है- पब्लिक लाइब्रेरी, सरकारी स्कूल लाइब्रेरी, रीडिंग रूम – इन्हीं के बजट, स्टाफ़ और इमारतों को सबसे पहले काट दिया जाता है.
नेशनल नॉलेज कमीशन ने 2005-07 में राष्ट्रीय लाइब्रेरी जनगणना, राष्ट्रीय पुस्तकालय आयोग और लाइब्रेरी बजट बढ़ाने जैसी सिफ़ारिशें रखीं, पर दो दशकों में न यूपीए, न ही एनडीए और न ही ज़्यादातर राज्य सरकारों ने इन पर वह राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जो स्वास्थ्य या हाईवे प्रोजेक्ट पर दिखती है. यानी अलग-अलग विचारधारा की सरकारें बदलती रहीं, पर लाइब्रेरी के मामले में सबकी प्राथमिकता लगभग एक ही रही, उपेक्षा.
नतीजा यह है कि जिन जगहों से आम लोग वैकल्पिक दृष्टि, इतिहास, विज्ञान और साहित्य पढ़कर प्रोपगैंडा का मुकाबला कर सकते थे, वही जगहें खत्म हो रही हैं, और हम अनजाने में उस संरचना को ही तोड़ रहे हैं जो किसी भी लोकतंत्र में स्वतंत्र दिमाग और ऊंचे आईक्यू की बुनियाद रखती है.
मैं जिस लाइब्रेरी में पढ़ने जाता था, वहां दस हज़ार से ज़्यादा किताबें थीं. इनमें हिंदी साहित्य के क्लासिक्स से लेकर हैरी पॉटर तक उपलब्ध थे. ऐसी कई आउट ऑफ प्रिंट किताबें मौजूद थीं, जो दोबारा शायद ही कहीं मिलेंगी. इसके अलावा लगभग पच्चीस-तीस पत्रिकाएं नियमित थीं. फीस थी बीस रुपये महीना. उस समय यह हाल था कि वहां आने वाले ज़्यादातर लड़के वो बीस रुपये महीना भी भरने लायक नहीं थे. वे घंटों वहीं बैठकर किताबें पढ़ते थे, ताकि फीस न देनी पड़े.
मेरी खुद की पढ़ाई भी सरकारी अनुदान वाले स्कूल में हुई है और अपने लिए भी कह सकता हूं कि लाइब्रेरी नहीं होती तो इतनी पढ़ाई नहीं हो पाती. उस लाइब्रेरी की सबसे बड़ी बात थी कि वह भले ही वो एक मंदिर के अंदर थी, लेकिन इसमें हर धर्म और हर जाति के लड़के नियमित आते थे. आरक्षण से लेकर धार्मिक कट्टरता पर तमाम बहस हुईं. इन सबका नतीजा ये निकला कि लाइब्रेरी में आने वाले तमाम लोग एक-एक कर नौकरियों में लगने लगे. मोहल्ले के कुछ लोगों ने इसे मंदिर के सिद्ध होने से भी जोड़ लिया, लेकिन हक़ीकत क्या थी आप समझ सकते हैं.
हम में से हर कोई लाइब्रेरी की बदौलत पढ़ने लिखने के साथ-साथ समझदार भी बना. मगर अब वहां धार्मिक चर्चा और सत्संग होगा. वहां मौजूद किताबों का क्या हुआ? कुछ किताबें दीमकों की भेंट चढ़ रही हैं, कुछ बंदरों के हवाले हुईं, कुछ कीमती थीं, तो लोगों ने उन्हें बेचकर अपने शौक पूरे किए, तो कुछ ज़रूरतमंदों के निजी कलेक्शन में चली गईं, जो बच जाएंगी, वे कबाड़ में बेची जाएंगी.
हालांकि, ऐसा नहीं है कि स्थिति पूरी तरह से नकारात्मक है. इस देश और समाज की चिंता करने वाले तमाम लोग पिछले कुछ सालों में लाइब्रेरी और किताबें पढ़ने को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय हुए हैं और निश्चित रूप से ये कोशिशें कुछ तो असर डालेंगी. हां, ‘एंटी-इंटेलक्चुअल’ ट्रेंड वाले समाज में जहां बुद्धिजीवी शब्द गाली की तरह इस्तेमाल होने लगा है, लोगों को किताबों से जोड़ना एक मुश्किल काम होने वाला है. तभी तो, जिस पुस्तकालय के उद्घाटन की खबर सोशल मीडिया पर कई दिन तक छाई रही, उसकी (लोगों द्वारा की गई) तमाम चर्चाओं में एक भी नाम ऐसा नहीं था, जिसे देख-सुनकर अगली पीढ़ी को कहा जा सके कि किताबें पढ़ोगे, तभी इनके जैसे बन पाओगे.
(अनिमेष मुखर्जी लेखक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्येता हैं.)
