विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना, इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली
इन काव्य-पंक्तियों की कवयित्री महादेवी वर्मा (26 मार्च 1907 — 11 सितम्बर 1987) छायावादी कविता की एक शालीन उपस्थिति थीं. वे कहा करती थीं कि एक अच्छी कविता के सामने शासक हमेशा नहीं रहता, मनुष्य रहता है.’ कवि निराला उन्हें ‘हिंदी के विशाल मन्दिर की सरस्वती’ कहा करते थे.
उन्हें अच्छी कविता और उस मनुष्य तक पहुंचाने का सारा श्रेय उनकी मां का है जो अपने मातृघर से हिंदी लेकर आई थीं. उन्होंने जब महादेवी में तुक मिलाने की प्रवृत्ति को देखा तो कहा, किसी पंडित जी को बुलाओ; यह तुक मिलाती है, इसको सिखा दे कुछ. तो पंडित जी आए. पंडित जी ने आ कर उन को अलंकार और समस्यापूर्ति करना सिखाया, जहां से चलकर वे छायावाद के शिखर तक पहुंचीं.
सन् ’17 में फ़रूर्खाबाद से इलाहाबाद आने पर वे सुभद्रा कुमारी चौहान से बेहद प्रभावित रहीं. जिस तरह सुभद्रा जी सीधी-सीधी बात खड़ी बोली में लिख लेती थीं, उससे प्रभावित हो महादेवी अपना ब्रज का ढंग बदल खड़ी बोली में लिखने लगीं. उन्होंने खड़ी बोली हिंदी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल ब्रजभाषा में ही संभव मानी जाती थी. इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिंदी का जामा पहनाया.
संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है. उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरुआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं.
आज़ादी से पहले महादेवी की अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ और श्रृंखला की कड़ियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं. इन तीनों किताबों ने तत्कालीन साहित्य की दुनिया में संस्मरण विधा को केंद्र में ला खड़ा किया था. उनके संस्मरणों का सानी आज भी समानांतर हिंदी साहित्य में कोई दूसरा नहीं है.
अतीत के चलचित्र की भूमिका में वे स्वयं कहती हैं, ‘इन स्मृति-चित्रों में मेरा जीवन भी आ गया है. यह स्वाभाविक भी था. अँधेरे की वस्तुओं को हम अपने प्रकाश की धुँधली या उजली परिधि में लाकर ही देख पाते हैं: उसके बाहर तो वे अनन्त अन्धकार के अंश हैं. मेरे जीवन की परिधि के भीतर खड़े होकर ये चरित्र जैसा परिचय दे पाते हैं वह बाहर रूपान्तरित हो जाएगा.’
महादेवी की स्मृति के जीवित चित्र उनकी भाषा के रंगों में सृजित होकर साहित्य के पाठकों के मानस पर छा ही नहीं जाते बल्कि उन्हें जीवनपर्यंत याद रहते हैं.
उनका बाल-विवाह हुआ था पर उन्होंने जीवन अविवाहित की भांति जिया. महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनशील अनुवादक भी थीं. उन्हें हिंदी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है. भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुवतारे की तरह प्रकाशमान है. गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं. उनके जीवनकाल में नीहार से लेकर दीप-शिखा तक उनके कुल सात कविता संग्रह हैं.
उनका समस्त काव्य वेदनामय है. यह वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत की आभा है, जो उसी के लिए सहज संवेद्य हो सकती है, जिसने उस अनुभूति-क्षेत्र में प्रवेश किया है. सच है उनका सारा साहित्य दुख और करुणा की आराधना है… एक चीत्कार है, कभी हंसकर कभी रुदन में. यही उनका परम अंत:करण है.
दूधनाथ सिंह इसी अंत:करण को भारतीय स्त्री का परम अंत:करण मानते हैं. गांधी जी से गहरे प्रभावित महादेवी वर्मा उनकी तरह स्त्री को घर में सीमित नहीं रखना चाहती थीं. वे गांधी के आह्वान पर सन् 1920 में अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने के लिए घर से निकल आई थीं.
महादेवी वर्मा छायावादी कवियों में बाक़ी तीनों से भिन्न अपना एक अलग और विशिष्ट स्थान रखती हैं. इस विशिष्टता के दो कारण रहे हैं: एक तो उनका विशिष्ट स्त्रीवादी स्वर और दूसरा, अंग्रेज़ी और बांग्ला के रोमांटिक और रहस्यवादी कविता का उन पर प्रभाव. इस प्रकार एक तरफ़ तो उन्हें अपने आध्यात्मिक प्रियतम को पुरुष मानकर स्वाभाविक रूप में अपनी स्त्री-जनोचित प्रणयानुभूतियों को निवेदित करने की सुविधा मिली, तो दूसरी ओर प्राचीन भारतीय साहित्य-दर्शन तथा संत युग के रहस्यवादी काव्य से अतरंग परिचय होने के फलस्वरूप उनकी काव्याभिव्यंजना और बौद्धिक चेतना भारतीय परम्परा के अनुरूप विकसित हो सकी.
इसलिए उनके काव्य में कृष्ण भक्ति काव्य की विरह-भावना गोपियों के माध्यम से नहीं, सीधे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकाशित हुई हैं, वहीं सूफ़ी पुरुष कवियों की भांति उन्हें ईश्वर को नारी के प्रतीक रूप में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी. सुमित्रानंदन पंत के बाद छायावादी कवियों में महादेवी वर्मा को ही ज्ञानपीठ सम्मान हासिल है.
28 नवंबर 1983 को नई दिल्ली में खेलगांव स्थित एशियाड सेंटर में अठारहवें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहण के अवसर पर वे बोली थीं कि ‘यदि मनुष्य में संवेदनशीलता की रागात्मकता नहीं रहेगी तो ध्वंस के कगार पर बैठी मानवजाति किसी भी क्षण समाप्त हो सकती है.’ और यह भी कि ‘साहित्य जीवन के विकास का ऐसा साथी रहा है कि उसका अभाव बर्बरता या असभ्यता का पर्याय माना जाएगा’.
(लेखक सीएसडीएस की शोधपरक पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति’ के सहायक संपादक हैं.)
