नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने गुरुवार (26 मार्च) को एक नई पात्रता नीति पर सहमति जताते हुए ट्रांसजेंडर महिला खिलाड़ियों को महिला वर्ग की प्रतियोगिताओं से बाहर रखने का फैसला किया है.
उल्लेखनीय है कि नई नीति के तहत ओलंपिक या किसी भी आईओसी इवेंट में महिला वर्ग की सभी प्रतिस्पर्धाओं (व्यक्तिगत और टीम स्पोर्ट्स दोनों) में केवल बायोलॉजिकल महिलाओं को ही भाग लेने का अधिकार होगा. नई नीति 2028 के लॉस एंजेलिस ओलंपिक से लागू होगी.
हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, आईओसी का यह निर्णय बीते साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जारी उस कार्यकारी आदेश के अनुरूप है, जिसमें ‘महिलाओं के खेलों से पुरुषों को बाहर रखने’ की बात कही गई थी. इस आदेश में कहा गया था कि लॉस एंजेलिस ओलंपिक्स में हिस्सा लेने की कोशिश करने वाले ट्रांसजेडर एथलीट्स को वीज़ा नहीं दिया जाएगा.
ईएसपीएन के अनुसार, इस आदेश में उन संगठनों से ‘सभी फंड वापस लेने’ की भी धमकी दी गई थी, जो ट्रांसजेंडर एथलीट्स को महिलाओं के खेलों में हिस्सा लेने की अनुमति देते थे. उनके राष्ट्रपति बनने के दो महीने बाद ही अमेरिका की सभी खेल फेडरेशंस ने इसे लागू कर दिया था. और अब अमेरिका में होने वाले ओलंपिक्स से पहले आईओसी ने भी इसे मान्यता दे दी है.
एक प्रेस विज्ञप्ति में आईओसी ने पुष्टि की कि ओलंपिक या किसी अन्य आईओसी प्रतियोगिता में किसी भी महिला वर्ग की स्पर्धा के लिए पात्रता अब केवल ‘बायोलॉजिकल महिला’ खिलाड़ियों तक ही सीमित रहेगी, जिसका निर्धारण एक बार की एसआरवाई जीन स्क्रीनिंग के आधार पर किया जाएगा.
ज्ञात हो कि यह नीति सितंबर 2024 से मार्च 2026 के बीच आईओसी द्वारा की गई समीक्षा का परिणाम है, जिसमें महिला वर्ग के लिए आईओसी की नीति पर विचार किया गया था. इस समीक्षा में संबंधित क्षेत्रों के विभिन्न विशेषज्ञों से परामर्श लिया गया था.
आईओसी ने स्पष्ट किया कि यह नीति केवल ओलंपिक और आईओसी इवेंट्स पर लागू होगी. इसे रेट्रोएक्टिव नहीं बनाया गया है, यानी पुरानी प्रतिस्पर्धाओं पर इसका असर नहीं पड़ेगा. साथ ही, यह ग्रासरूट या आम खेल कार्यक्रमों पर लागू नहीं होती.
इस संबंध में आईओसी की अध्यक्ष किर्स्टी कोवेंट्री, जो खुद एक पूर्व एथलीट हैं, ने कहा, ‘मैं एक पूर्व खिलाड़ी के रूप में सभी ओलंपियनों के निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के अधिकार में पूरी तरह विश्वास करती हूं. यह नीति विज्ञान पर आधारित है और चिकित्सा विशेषज्ञों के नेतृत्व में तैयार की गई है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘ओलंपिक खेलों में बहुत छोटे अंतर से जीत और हार तय होती है. इसलिए बायोलॉजिकल पुरुषों का महिला वर्ग में प्रतिस्पर्धा करना निष्पक्ष नहीं होगा. कुछ खेलों में तो यह सुरक्षित भी नहीं होगा.’
कोवेंट्री ने यह भी जोड़ा कि हर खिलाड़ी के साथ गरिमा और सम्मान के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए और खिलाड़ियों की जांच जीवन में केवल एक बार ही की जानी चाहिए. इस प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी और परामर्श उपलब्ध होना चाहिए, साथ ही विशेषज्ञ चिकित्सा सलाह भी उपलब्ध होनी चाहिए.
गौरतलब है कि एक्जिक्यूटिव बोर्ड मीटिंग के बाद आईओसी ने 10 पन्नों का नीति दस्तावेज़ भी जारी किया, जिसके मुताबिक जिन खिलाड़ियों में सेक्स डेवेलपमेंट को लेकर कुछ मेडिकल शर्तें हैं उन्हें भी अब हिस्सा लेने का मौका नहीं मिलेगा.
इसमें दो बार की ओलंपिक चैंपियन सेमेन्या कास्टर भी शामिल हैं. कास्टर जन्म के समय महिला थीं लेकिन उनका टेस्टोस्टेरोन लेवल (पुरुषों में अधिक मात्रा पाया जाने वाले हार्मोन) काफी ज्यादा था.कास्टर ने कोर्ट में काफी लंबी लड़ाई भी लड़ी लेकिन नई नीति के बाद वह हिस्सा नहीं ले पाएंगी.
दस्तावेज़ में यह भी कहा गया कि टेस्टोस्टेरोन लेवल ज्यादा होने पर महिलाओं के मुकाबले शारीरिक ताकत ज्यादा हो जाती है. साथ ही अगर कोई जन्म के समय पुरुष है तो उन्हें महिलाओं के मुकाबले उसे फिजिकल बढ़त मिलती है.
हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी या कोई भी ट्रांसजेंडर महिला ओलंपिक स्तर पर इवेंट्स में हिस्सा ले रही है या नहीं. पुरुष के रूप में जन्म लेने के बाद महिला बनी किसी भी खिलाड़ी ने पेरिस ओलंपिक (2024) में भाग नहीं लिया था. 2021 में हुए टोक्यो ओलंपिक में न्यूजीलैंड की ट्रांसजेंडर लॉरेल हबर्ड ने वेटलिफ्टिंग में हिस्सा लिया था, लेकिन मेडल नहीं जीत पाई थीं.
