नई दिल्ली: असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने शुक्रवार को कहा कि अगर अगले महीने होने वाले चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन फिर से सत्ता में आता है, तो उनकी सरकार राज्य में ‘बांग्लादेशी मियाओं’ की कमर तोड़ देगी.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सरकार एक ‘मज़बूत असमिया समाज’ बनाने के लिए काम करेगी और अवैध प्रवासी अब मूल निवासियों को चुनौती देने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, लखीमपुर ज़िले के धाकुआखाना में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए शर्मा ने कहा, ‘हमने राज्य के मूल निवासियों के लिए बहुत मेहनत की है, और जो लोग बांग्लादेश से आए और असम की ज़मीन और घरों पर कब्ज़ा कर लिया, हमने राजनीतिक रूप से उनके हाथ-पैर तोड़ दिए.’
उन्होंने आगे कहा, ‘इस बार, हम बांग्लादेशी मियाओं की कमर ही तोड़ देंगे, ताकि वे असमिया लोगों को चुनौती देने की हिम्मत न कर सकें.’
उल्लेखनीय है कि ‘मिया’ बांग्ला भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक अपमानजनक शब्द है. असम की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अक्सर इस समुदाय को ‘घुसपैठिए’ कहती रही है. इन पर आरोप लगाया जाता रहा है कि वे मूल निवासियों के संसाधनों, नौकरियों और ज़मीन पर कब्ज़ा कर रहे हैं.
शर्मा ने कहा, ‘सरकार ने पिछले पांच सालों में कथित तौर पर बांग्लादेशी मियाओं से कब्ज़ाई गई 1.5 लाख बीघा ज़मीन खाली करवाई है, और अगले कार्यकाल में 5 लाख बीघा ज़मीन खाली करवाने का लक्ष्य है.’
मुख्यमंत्री ने आगे कहा, ‘यह हमारी ज़मीन है, हमारा अधिकार है; हमारी ‘जाति’ (समुदाय), हमारा ‘स्वाभिमान’ (गरिमा) है. हम एक मज़बूत असमिया समाज बनाने के लिए काम करेंगे.’
बता दें कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा लगातार बांग्ला भाषी मुसलमानों पर निशाना साधते रहे हैं. मुख्यमंत्री ने पहले दावा किया था कि राज्य के मूल निवासी समुदाय ‘एक धर्म’ के लोगों के ‘आक्रमण’ का सामना कर रहे हैं, जो कथित तौर पर अलग-अलग इलाकों की ज़मीनों पर अतिक्रमण कर उन इलाकों की जनसांख्यिकी बदलने की कोशिश कर रहे हैं.
जुलाई 2025 में धुबरी ज़िला प्रशासन ने धुबरी ज़िले के बिलाशीपारा में असम सरकार द्वारा प्रस्तावित 3,400 मेगावाट के थर्मल पवार प्लांट स्थल पर 2,000 से ज़्यादा मिया मुसलमानों के घरों को गिरा दिया. शर्मा ने अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ‘लड़ाई’ को उचित ठहराया था, भले ही वे ‘विदेशी’ न हों, जब उन्होंने एक एक्स पोस्ट में लिखा था, ‘हमें अपने हक़ के लिए लड़ने से मत रोको. हमारे लिए यह हमारे अस्तित्व की आखिरी लड़ाई है.’
मुख्यमंत्री ने रंगा नदी में एक रैली के दौरान विपक्षी कांग्रेस पर भी निशाना साधा, और दावा किया कि यह पार्टी राज्य में फिर कभी सत्ता में नहीं लौटेगी.
उन्होंने राज्य के कुछ हिस्सों में पिछड़ेपन और कम विकास के लिए इस पुरानी पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराया, खासकर उन हिस्सों के लिए जिनका प्रतिनिधित्व पिछली विधानसभा में कांग्रेस विधायकों ने किया था.
शर्मा ने ज़ोर देकर कहा, ‘अगर इस बार कांग्रेस को 20 से ज़्यादा सीटें मिल जाती हैं, तो यह बहुत बड़ी बात होगी. कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने के लिए फिर कभी सत्ता में नहीं लौटेगी.’
असम चुनाव: खोवांग के लोगों ने सड़क और पानी के संकट को लेकर चुनाव बहिष्कार की धमकी दी
इसी बीच, खोवांग विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत हल्दीबाड़ी पंचायत के जुंगांव के निवासियों ने पक्की सड़क और पीने के पानी की सुविधाओं की मांग करते हुए, आगामी असम विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करने की धमकी दी है.
नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, नाराज़ स्थानीय लोगों ने बुधवार (25 मार्च) को खराब सड़कों के विरोध में प्रदर्शन किया और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दी.
गांव वालों ने कहा कि खोवांग के विधायक चक्रधर गोगोई को कई आवेदन और अनुरोध सौंपने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई.

उन्होंने आरोप लगाया कि विधायक ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वे इस मुद्दे पर उनसे संपर्क करते रहे, तो उन्हें गिरफ्तार करवा दिया जाएगा.
एक गांव वाले ने कहा, ‘जब हमने उनसे अनुरोध किया, तो विधायक चक्रधर गोगोई ने पूछा कि क्या उन्हें अपने गोदाम में रखा धान बेचकर सड़क बनानी चाहिए?’
विरोध कर रहे गांव वालों ने पीने के पानी की कमी की भी शिकायत की और कहा, ‘हमें पता चला कि जल जीवन मिशन के तहत हमारे गांव के लिए पैसे मंजूर किए गए थे, लेकिन इस प्रोजेक्ट पर कोई काम नहीं हुआ है.’
जुंगांव के निवासियों ने असम विधानसभा चुनाव 2026 का बहिष्कार करने और गांव में चुनाव उम्मीदवारों के प्रवेश पर रोक लगाने की धमकी दी, जब तक कि पक्की सड़क बनाने का लिखित आश्वासन नहीं मिल जाता.
एक स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया, ‘चक्रधर गोगोई लोगों की समस्याओं को हल करने में नाकाम रहे हैं. पिछले 10 सालों में दूसरे भाजपा विधायकों के मुकाबले, उन्होंने सड़कों का निर्माण नहीं करवाया है. हम चाहते हैं कि हमारी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाए.’
त्रिपुरा: कमज़ोर अभियोजन और सबूतों की कमी के कारण 78% बलात्कार के आरोपी बरी हो जाते हैं
त्रिपुरा विधानसभा में बलात्कार के मामलों पर पेश किए गए आंकड़ों से एक परेशान करने वाली तस्वीर सामने आई है. इन आंकड़ों से पता चलता है कि 78% आरोपी सबूतों की कमी और कमज़ोर अभियोजन के कारण बरी हो जाते हैं.
ये आंकड़े पुलिस जांच और सरकारी वकीलों के काम में गंभीर कमियों को उजागर करते हैं, जिससे पीड़ितों को न्याय मिलने पर सवाल खड़े होते हैं.
आकड़ों के अनुसार, पिछले तीन सालों में बलात्कार के सिर्फ़ 22% मामलों में ही सज़ा हो पाई है. जिन 758 मामलों में फ़ैसला आया, उनमें से सिर्फ़ 167 में ही सज़ा हुई, जिससे ज़्यादातर आरोपी बिना किसी सज़ा के आज़ाद घूम रहे हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस अक्सर अदालत में ठोस सबूत इकट्ठा करने या पेश करने में नाकाम रहती है. फ़ॉरेंसिक सहायता की कमी, दस्तावेज़ों का ठीक से न होना, चार्जशीट में देरी और गवाहों को ठीक से न संभाल पाना – अक्सर इन कारणों से सुनवाई के दौरान मामले कमज़ोर पड़ जाते हैं.
रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि कई मामलों में अभियोजन पक्ष उतनी गंभीरता नहीं दिखाता, जितनी ऐसे गंभीर अपराधों के लिए ज़रूरी होती है.
कांग्रेस विधायक सुदीप रॉय बर्मन के मुताबिक, कुछ सरकारी वकील कथित तौर पर अपनी दलीलें असरदार तरीके से पेश नहीं कर पाते, बचाव पक्ष के दावों को चुनौती नहीं दे पाते, या अदालत में बिना पूरी तैयारी के पहुंचते हैं.
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कुछ जांच अधिकारी और सरकारी वकील – चाहे लापरवाही, तालमेल की कमी, या जानबूझकर की गई मिलीभगत के कारण ही क्यों न हो – अनजाने में बचाव पक्ष को मज़बूत कर देते हैं, जिससे आरोपी बरी हो जाते हैं.
रॉय बर्मन ने ज़ोर देकर कहा कि लंबित मामलों के भारी बोझ से स्थिति और भी बिगड़ जाती है; इससे सुनवाई लंबी खिंचती है और पीड़ितों को न्याय पाने की राह में और भी ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
सज़ा की यह कम दर न सिर्फ़ व्यवस्था की कमियों को उजागर करती है, बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के भरोसे को भी कमज़ोर करने का खतरा पैदा करती है.
रॉय बर्मन ने तत्काल सुधारों की मांग की है, जिनमें पुलिसकर्मियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण, फ़ॉरेंसिक संसाधनों में सुधार, जांच अधिकारियों के लिए कड़ी जवाबदेही और सरकारी वकीलों पर मज़बूत निगरानी शामिल है.
2025 में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के 667 मामले दर्ज: सरकारी डेटा
राज्य विधानसभा में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल त्रिपुरा में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 667 मामले दर्ज किए गए और पुलिस ने इन घटनाओं के सिलसिले में 426 आरोपियों को गिरफ्तार किया.
पिछले साल ऐसे मामलों की संख्या 2023 और 2024 की तुलना में कम रही; इन वर्षों में अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में क्रमशः कुल 791 और 724 मामले दर्ज किए गए थे.
रिपोर्ट के अनुसार, इन मामलों में 1,439 लोगों की संलिप्तता पाई गई, जिनमें से पुलिस ने पिछले साल 1,072 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की. हालांकि, इन मामलों में केवल आठ लोगों को दोषी ठहराया गया.
पिछले साल महिलाओं के खिलाफ दर्ज कुल अपराधों में से 168 मामले बलात्कार के, 116 मामले छेड़छाड़ के, 19 मामले दहेज हत्या के और 206 मामले महिलाओं के प्रति क्रूरता से संबंधित थे. पुलिस जांच में बलात्कार से संबंधित मामलों में 298 लोगों की संलिप्तता पाई गई और उनमें से 182 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन मामलों में 204 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई.
पिछले साल छेड़छाड़ के कुल 116 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 186 लोगों की संलिप्तता पाई गई. पुलिस ने इन मामलों के सिलसिले में 58 लोगों को गिरफ्तार किया और बाद में 154 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की.
दहेज हत्या के 19 मामलों में पुलिस ने 31 लोगों को गिरफ्तार किया और 29 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की.
पुलिस ने महिलाओं के प्रति क्रूरता से संबंधित कुल 206 मामले दर्ज किए, जिनमें 35 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन मामलों में 477 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई.
2024 में महिलाओं के खिलाफ कुल 724 अपराध दर्ज किए गए, जिनमें बलात्कार के 180 मामले, छेड़छाड़ के 108 मामले, दहेज हत्या के 20 मामले और महिलाओं के प्रति क्रूरता के 257 मामले शामिल थे. इसकी तुलना में 2023 में ऐसे मामलों की कुल संख्या 791 दर्ज की गई, जिसमें 139 बलात्कार के मामले, 151 छेड़छाड़ के मामले, 21 दहेज हत्याएं और महिलाओं के खिलाफ क्रूरता के 319 मामले शामिल थे.
मेघालय: गैर-आदिवासी अब गारो हिल्स काउंसिल के चुनाव नहीं लड़ सकेंगे
मेघालय में गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (जीएचएडीसी) ने सोमवार (23 मार्च) को परिषद की सदस्यता के लिए आवश्यक योग्यता से संबंधित मौजूदा नियमों में संशोधन पारित किया, जिसके तहत अब उम्मीदवारों के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्र होना अनिवार्य कर दिया गया है, यह घोषणा मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने की.
इस महीने की शुरुआत में गारो हिल्स क्षेत्र में गैर-आदिवासी स्थायी निवासियों की पात्रता का मुद्दा हिंसा और तनाव का केंद्र बना हुआ था. जीएचएडीसी द्वारा पारित यह संशोधन कई घटनाओं के बाद आया है, जिनमें 10 अप्रैल को होने वाले जीएचएडीसी चुनावों का स्थगन, वर्तमान परिषद के कार्यकाल को छह महीने तक बढ़ाना और परिषद के मुख्य कार्यकारी सदस्य (सीईएम) का इस्तीफा व उसके बाद नए सीईएम की नियुक्ति शामिल हैं.
गारो हिल्स जिलों में मिश्रित आबादी है, खासकर उस मैदानी क्षेत्र में जो बांग्लादेश की सीमा से सटा हुआ है, और जीएचएडीसी के वर्तमान सदस्यों में से दो बंगाली मूल के मुस्लिम हैं.

मुख्यमंत्री संगमा ने इसे ‘ऐतिहासिक संशोधन’ बताया.
उन्होंने कहा, ‘यह वास्तव में एक ऐतिहासिक क्षण और महत्वपूर्ण निर्णय है, क्योंकि हम जानते हैं कि जिला परिषदें परंपरागत रूप से क्षेत्र के आदिवासियों के लिए ही बनाई गई थीं. इसलिए, यह जरूरी है कि गारो हिल्स जिले में इस तरह की शर्तें लागू की जाएं. यह लोगों की लंबे समय से लंबित मांग थी, लेकिन पिछले 74 वर्षों में कोई भी सरकार या जिला परिषद इसे लागू नहीं कर पाई. लेकिन मुझे खुशी है कि आज हम इस निर्णय तक पहुंचे हैं.’
17 फरवरी को जीएचएडीसी के तत्कालीन सीईएम ने एक अधिसूचना जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि परिषद की कार्यकारी समिति ने यह निर्णय लिया है कि इस निकाय के चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार मेघालय राज्य की मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजातियों के सदस्य होने चाहिए. यह विवादास्पद था, क्योंकि इसे लागू करने की आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, जिससे यह प्रभावी नहीं हो पाया. चुनावों से पहले गारो समूहों ने इसके कार्यान्वयन की मांग की, जबकि गैर-आदिवासियों ने इसका विरोध किया, और स्थिति तब और बिगड़ गई जब एक पूर्व गैर-आदिवासी विधायक ने नामांकन दाखिल करने की कोशिश की.
17 फरवरी की इस अधिसूचना को बाद में मेघालय हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि यह ‘कानूनी जांच में खरा नहीं उतरता’ और इस विषय पर कार्यकारी समिति का निर्णय पहले जिला परिषद के समक्ष रखा जाना चाहिए, फिर राज्य सरकार के जिला परिषद मामलों के विभाग को भेजा जाना चाहिए और अंततः राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त करनी चाहिए.
इसके बाद राज्य सरकार ने चुनाव स्थगित कर दिए और तत्कालीन सीईएम – जो अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे थे – ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. एक नए सीईएम का चुनाव हुआ. उपमुख्यमंत्री प्रेस्टोन टिनसॉन्ग ने कहा कि बिना सहयोगियों से परामर्श किए और बिना इसे परिषद के सदन में प्रस्तुत किए अधिसूचना जारी करना ही इसका मुख्य कारण था. संबंधित संशोधन को सोमवार को आयोजित सत्र में नए सीईएम के नेतृत्व वाली जीएचएडीसी ने पारित किया.
संगमा ने सोमवार (23 मार्च) को कहा, ‘मुझे विश्वास है कि हमारे गैर-आदिवासी मित्र समझेंगे कि यह परिषद हमेशा से इस क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले आदिवासियों के लिए ही बनाई गई थी.’
सिक्किम: एसडीएफ, सीएपी ने कथित अनुचित आरक्षण के विरोध में नगर निकाय चुनाव 2026 का बहिष्कार किया
सिक्किम के दो प्रमुख विपक्षी दल – सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) और सिटिजन एक्शन पार्टी (सीएपी) – ने 24 अप्रैल को होने वाले नगर निकाय चुनावों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है. उनका आरोप है कि सत्तारूढ़ सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (एसकेएम) ने एक अलोकतांत्रिक माहौल बनाया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, एसडीएफ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और प्रवक्ता कृष्णा खरेल ने शुक्रवार (27 मार्च) को पत्रकारों से कहा कि प्रस्तावित नगर निकाय चुनाव ‘असंवैधानिक’ है.
उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में सीटों के असमान आरक्षण पर चिंता जताई और कहा कि इसी कारण पार्टी शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में भाग नहीं ले रही है.

खरेल ने कहा कि चुनाव की औपचारिक घोषणा के साथ ही कई ‘गंभीर त्रुटियां’ सामने आई हैं, विशेष रूप से सीट आरक्षण के मामले में – जिसकी एसडीएफ कड़ी निंदा करती है.
उन्होंने कहा कि समग्र आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा से पता चलता है कि सीटों का आवंटन जनसंख्या के अनुपात में नहीं किया गया है, जिससे निष्पक्षता और संवैधानिक अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
उन्होंने कहा, ‘संविधान के अनुसार आरक्षण जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए. इसके विपरीत, कई श्रेणियों में विसंगतियां स्पष्ट हैं. उदाहरण के लिए ओबीसी (केंद्रीय सूची), जो पिछली जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या का 25.64 प्रतिशत है, को अनुपात के अनुसार 17–18 सीटें मिलनी चाहिए थीं; लेकिन केवल आठ सीटें आरक्षित की गई हैं. इसी तरह, ओबीसी (राज्य सूची), जिसकी जनसंख्या हिस्सेदारी 21.89 प्रतिशत है, को लगभग 14 सीटें मिलनी चाहिए थीं, लेकिन उन्हें केवल 11 सीटें दी गई हैं.’
खरेल ने दावा किया कि ये विसंगतियां स्पष्ट रूप से संकेत देती हैं कि आगामी नगर निगम चुनावों के लिए आरक्षण का ढांचा जनसंख्या के अनुपात के अनुसार तैयार नहीं किया गया है, जिससे समान प्रतिनिधित्व के संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर किया जा रहा है.
एसडीएफ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने यह भी कहा कि आरक्षण तय करते समय विशेष क्षेत्रों की जनसांख्यिकीय संरचना का ध्यान नहीं रखा गया. उदाहरण के लिए, जिन क्षेत्रों में ओबीसी (केंद्रीय सूची) समुदायों की उल्लेखनीय उपस्थिति है, वहां अन्य श्रेणियों के लिए आरक्षण निर्धारित कर दिया गया है, जिससे ऐसे निर्णयों के आधार को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं.
सीएपी ने गुरुवार को घोषणा की कि वह सिक्किम में शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) चुनावों का बहिष्कार करेगी, साथ ही सभी 63 वार्डों में ‘योग्य और सक्षम’ निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन करेगी.
गंगटोक में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सीएपी के प्रवक्ता अल्बर्ट गुरंग ने कहा कि यह निर्णय एसकेएम द्वारा नगर निकाय चुनावों को पक्षपातपूर्ण तरीके से कराने के विरोध में लिया गया है, जिसे उन्होंने एसकेएम के 2019 के घोषणापत्र के वादे के साथ ‘विश्वासघात’ बताया.
मुख्यमंत्री पी.एस. तमांग (गोले) ने मंगलवार को एसकेएम के नागरिक चुनाव उम्मीदवारों से मुलाकात की और उन्हें विनम्रता और ईमानदारी के साथ सामूहिक रूप से काम करने का आग्रह किया.
एसकेएम प्रमुख ने कहा कि पार्टी उम्मीदवारों को उनके पूरे चुनावी सफर में पूर्ण समर्थन देगी और उन्हें जल्द से जल्द नामांकन प्रक्रिया पूरी करने की सलाह दी.
राज्यसभा में पूर्वोत्तर के छात्रों के ख़िलाफ़ नस्लीय भेदभाव का मुद्दा उठाया गया
राज्यसभा के सदस्यों ने भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के नेतृत्व में पूर्वोत्तर के छात्रों के खिलाफ बढ़ते नस्लीय भेदभाव के मामलों पर चिंता जताई.
यह मुद्दा सोमवार, 24 मार्च को शून्यकाल के दौरान भाजपा सांसद नबम रेबिया द्वारा उठाया गया. उन्होंने पिछले महीने दिल्ली के मालवीय नगर में हुई एक घटना का उल्लेख किया, जहां तीन छात्राओं को नस्लीय टिप्पणियों का सामना करना पड़ा था.
राधाकृष्णन ने कहा कि सदन ऐसे घटनाओं को लेकर चिंतित है और इस मुद्दे पर अपना समर्थन व्यक्त करता है.
रेबिया ने पहले के मामलों का भी ज़िक्र किया, जिनमें 2014 में दिल्ली में हमले के बाद निडो तानिया की मौत और देहरादून में एंजेल चकमा की हत्या शामिल है.
हाल के मामले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश की तीन छात्राएं संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तैयारी कर रही थीं और उन्हें नस्लीय टिप्पणियों का निशाना बनाया गया. उन पर ब्यूटी पार्लर में काम करने का आरोप भी लगाया गया, जिस पर उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि इस पेशे में कुछ भी गलत नहीं है.
रेबिया ने नस्लीय भेदभाव से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने की मांग की और कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा एक निश्चित समयसीमा के भीतर होना चाहिए.
उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि एनसीईआरटी और सीबीएसई के तहत स्कूल पाठ्यक्रम में पूर्वोत्तर क्षेत्र से संबंधित अध्याय जोड़े जाएं, साथ ही युवाओं के लिए अधिक रोजगार अवसर पैदा करने के लिए विशेष भर्ती पहल शुरू की जाए.
मणिपुर: पहाड़ियों में बढ़ते तनाव के बीच उखरुल में फिर से गोलीबारी से दहशत
शुक्रवार (27 मार्च) की देर रात मणिपुर के उखरुल ज़िले में फिर से गोलीबारी की खबर आई. आरोप है कि लिटान-सारेखोंग इलाके में कुकी आबादी वाले इलाकों को निशाना बनाकर गोलीबारी की गई. कुकी सीएसओ वर्किंग कमेटी के दावों के मुताबिक, यह घटना रात करीब 10:10 बजे हुई, जिसमें ऑटोमैटिक हथियारों से करीब 15 राउंड गोलियां चलाई गईं.
कमेटी ने आरोप लगाया कि कुछ संदिग्ध हथियारबंद लोगों ने ‘न्यू हेवन’ की तरफ से ‘चेपु याओलेन’ की ओर गोलीबारी की.
अपने बयान में कमेटी ने कहा कि उकसावे के बावजूद कुकी पक्ष के निवासियों ने संयम बरता और जवाबी गोलीबारी से खुद को दूर रखा, जिससे एक बड़े हथियारबंद टकराव में बदलने की आशंका टल गई.

इस घटना को एक लगातार चल रहे पैटर्न का हिस्सा बताते हुए कमेटी ने दावा किया कि उखरुल और उससे सटे कामजोंग ज़िले में कई कुकी बस्तियों को हाल के महीनों में इसी तरह की धमकियों का सामना करना पड़ा है. जिन इलाकों का ज़िक्र किया गया है, उनमें मोंगकोट चेपु, शांगकाई, थवाई कुकी, चस्साद, और साथ ही लेपलेन और टिंगपिबुंग जैसे आसपास के गांव शामिल हैं.
कमेटी ने आरोप लगाया कि ऐसी घटनाओं का मकसद आम नागरिकों में डर पैदा करना और पहाड़ी ज़िलों में पहले से ही नाज़ुक सुरक्षा माहौल को अस्थिर करना है.
अधिकारियों की प्रतिक्रिया पर चिंता जताते हुए कमेटी ने तांगखुल की शीर्ष संस्थाओं की चुप्पी पर सवाल उठाया और मणिपुर सरकार और केंद्र सरकार, दोनों की कथित निष्क्रियता की आलोचना की. उसने पूछा कि हथियारबंद तत्व बिना किसी हस्तक्षेप के कब तक इस तरह काम करते रहेंगे.
तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए कमेटी ने चेतावनी दी कि अगर इन बार-बार होने वाले उकसावों पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो इससे स्थिरता खत्म हो सकती है और तनाव बढ़ सकता है. उसने यह भी कहा कि समुदाय के भीतर लोगों का सब्र ‘तेज़ी से खत्म हो रहा है’ और अधिकारियों से आगे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निर्णायक कदम उठाने का आग्रह किया.
नगा समूहों के बीच गोलीबारी के बाद तमेंगलोंग ज़िले में नगा महिलाओं की रैली, शांति की अपील
मणिपुर के तमेंगलोंग जिले में शुक्रवार को तौसेम पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले तौसेम उप-मंडल के न्यू काइफुंडाई गांव और उसके आसपास राष्ट्रीय राजमार्ग-37 पर सैकड़ों नगा महिलाओं ने एक रैली निकाली. इस रैली के ज़रिए उन्होंने इलाके में लंबे समय से जारी तनाव को खत्म कर जल्द से जल्द से शांति बहाल करने की मांग की.
खबरों के अनुसार, इस रैली का आयोजन कई नगा महिला संगठनों ने मिलकर किया, जिनमें रोंगमेई नगा लुह फुआम मणिपुर – गोइनांगलोंग लुआंगरियन, रोंगमेई नागा काउंसिल – मणिपुर – गोइनांगलोंग लुआंगरियन और रोंगमेई नागा यूथ ऑर्गनाइजेशन मणिपुर – गोइनांगलोंग लुआंगरियन शामिल थे.
प्रदर्शनकारियों ने ‘हमें शांति चाहिए’, ‘गांव खाली करो’, ‘शांति, युद्ध नहीं’, ‘गोलीबारी शांति का समाधान नहीं है’, ‘हमें बदलाव चाहिए’ जैसे संदेशों वाले बैनर और तख्तियां थाम रखी थीं.
यह रैली 20 मार्च 2026 को न्यू कैफुंडाई गांव में नगा उग्रवादी समूहों – ज़ेलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट (जेडयूएफ) और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम – इसाक-मुइवाह (एनएससीएन-आईएम) – के बीच हुई गोलीबारी के विरोध में की गई.
आयोजन समिति की एक महिला नेता ने रैली के दौरान कहा कि इन दोनों नगा समूहों के बीच उनकी मांगों और समाधानों को लेकर बार-बार होने वाली गोलीबारी से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है और वे इससे बेहद व्यथित हैं.
उन्होंने आगे कहा कि जब लोग डर और दुख के साए में जिएंगे, तो युवाओं का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा. उन्होंने कहा, ‘बच्चों को शांति से पढ़ने-लिखने दो. किसानों और दिहाड़ी मज़दूरों को बिना किसी रुकावट के अपनी रोजी-रोटी कमाने दो.’
दोनों समूहों के बीच हिंसा के बाद ऑल ज़ेलियांगरोंग स्टूडेंट्स यूनियन – असम, मणिपुर और नगालैंड ने जेडयूएफ और एनएससीएन-आईएम से हिंसा छोड़कर बातचीत के जरिए मतभेद सुलझाने और इस संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में जल्द शांति बहाल करने की अपील की.
