कैथोलिक संस्था ने एफसीआरए संशोधनों को ‘ख़तरनाक’ बताया, कहा- अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुचित हस्तक्षेप

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया का कहना है कि लोकसभा में पेश किए गए विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में संशोधन संवैधानिक रूप से प्रदत्त स्वतंत्रताओं में 'कार्यकारी हस्तक्षेप' को सक्षम बना सकते हैं. संस्था ने चेतावनी दी है कि ये संशोधन अल्पसंख्यक संस्थानों और नागरिक समाज संगठनों के कामकाज में 'अनुचित हस्तक्षेप' के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं.

प्रतीकात्ममक तस्वीर. (फोटो साभार: Unsplash)

नई दिल्ली: कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों पर ‘गंभीर चिंता’ व्यक्त की है और विधेयक को इसके निहितार्थों के लिहाज से ‘खतरनाक’ बताया है.

एक बयान में सर्वोच्च कैथोलिक संस्था ने कहा कि लोकसभा में पेश किए गए प्रस्तावित संशोधन लाइसेंस नवीनीकरण के बहाने संवैधानिक रूप से प्रदत्त स्वतंत्रताओं में ‘कार्यकारी हस्तक्षेप’ को सक्षम बना सकते हैं.

संस्था ने चेतावनी दी कि ये संशोधन अल्पसंख्यक संस्थानों और नागरिक समाज संगठनों के कामकाज में ‘अनुचित हस्तक्षेप’ के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं.

उल्लेखनीय है कि यह विधेयक बुधवार (26 मार्च) को लोकसभा में पेश किया गया था, जिसके बाद सीबीसीआई ने उन प्रावधानों पर आपत्ति जताई है जो केंद्र सरकार को ज्यादा शक्तियां प्रदान करेंगे. इसमें नई लाइसेंसिंग अथॉरिटी के कामकाज को लेकर चिंता उठाई गई है, जो गैर-सरकारी संगठनों और अल्पसंख्यक निकायों के संस्थानों, निधियों, संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ लाइसेंसों के नवीनीकरण को अस्वीकार या रद्द करने में सक्षम होगी.

साथ ही प्राधिकरण को संपत्तियों को जब्त करने, प्रबंधित करने और उनका निपटान करने का अधिकार होगा, और इसके लिए अस्थायी और स्थायी दोनों प्रकार के अधिकार प्रस्तावित हैं.

सीबीसीआई ने कहा कि ऐसे उपाय निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के संबंध में चिंताएं पैदा करते हैं.

संस्था ने अपने बयान में विधेयक को पेश करने के पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाया है और इसे एकतरफा बताते हुए कहा है कि विपक्षी सांसदों के विरोध के बावजूद इसे पेश किया गया है. इसके साथ ही सीबीसीआई ने मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर व्यापक परामर्श और विचार-विमर्श की मांग भी की है.

सीबीसीआई का कहना है कि केंद्र सरकार को एफसीआरए पंजीकरण की अवधि समाप्त होने पर संगठनों के विदेशी निधियों और परिसंपत्तियों पर नियंत्रण करने का अधिकार देने वाले प्रावधान ‘अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत’ हैं.

सीबीसीआई ने इन संशोधनों को अल्पसंख्यक संस्थानों को ‘अत्यधिक कठोर नियामक ढांचे’ के अधीन करने का प्रयास बताया.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 में उन गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की संपत्तियों पर अस्थायी या स्थायी नियंत्रण रखने के लिए एक ‘नामित प्राधिकरण’ के गठन का प्रस्ताव है, जिनके एफसीआरए लाइसेंस रद्द, सरेंडर या समाप्त हो गए हैं. इसमें ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान की शक्तियां भी शामिल हैं.

इसमें निधियों के उपयोग के लिए समयसीमा निर्धारित करना, निलंबन के दौरान संपत्तियों का विनियमन करना, दंडों को तर्कसंगत बनाना और जांच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करना भी शामिल है.

सीबीसीआई ने सरकार से प्रस्तावित संशोधनों पर पुनर्विचार करने और विधेयक से सभी विवादास्पद प्रावधानों को हटाने का आग्रह किया, साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा कि संवैधानिक अधिकारों और स्वतंत्रता, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा की जाए.