नेहरू-पटेल ‘पीएम विवाद’ का सच: कैसे गढ़ी गई एक राजनीतिक मिथक की कहानी

‘नेहरू बनाम पटेल’ का विमर्श दरअसल एक विभाजनकारी औज़ार है, जिसका इस्तेमाल वे लोग करते हैं जो अतीत को अपने हिसाब से लिखना चाहते हैं, क्योंकि वे उन नेताओं की समावेशी सोच का मुकाबला नहीं कर सकते जिन्होंने वास्तव में देश का भविष्य गढ़ा.

सरदार वल्लभभाई पटेल (बाएं) और जवाहरलाल नेहरू. (फोटो: पब्लिक डोमेन, विकिमीडिया कॉमन्स के माध्यम से.)

समकालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में ‘वैकल्पिक इतिहास’ बेचने वाले लोग अपनी पसंद के मुताबिक तथ्यों को संदर्भ से काटकर पेश करने में माहिर हो गए हैं, ताकि एक खास तरह की कहानी को सही ठहराया जा सके. एक शोरगुल भरी प्रचार मशीन के हावी होने के कारण, सबसे बेबुनियाद दावे भी सच जैसे लगने लगते हैं.

इसका एक प्रमुख उदाहरण वह बार-बार दोहराया जाने वाला आरोप है, जो सरकार के उच्च स्तरों से लेकर सोशल मीडिया ट्रोल्स तक फैलाया जाता है कि 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने ‘धोखा देकर’ सरदार वल्लभभाई पटेल से प्रधानमंत्री पद छीन लिया था. यह सिर्फ एक ऐतिहासिक गलती नहीं है, बल्कि एक खतरनाक झूठ है, जिसे सच की तरह पेश किया जाता है ताकि भारत के पहले प्रधानमंत्री की विरासत को कमजोर किया जा सके.

‘नेहरू बनाम पटेल’ का विमर्श दरअसल एक विभाजनकारी औज़ार है, जिसका इस्तेमाल वे लोग करते हैं जो अतीत को अपने हिसाब से गढ़ना चाहते हैं, क्योंकि वे उन नेताओं की समावेशी सोच का मुकाबला नहीं कर सकते जिन्होंने वास्तव में देश का भविष्य बनाया.

सच क्या था?

मई 1945 में यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म होने के कगार पर था, और कांग्रेस के वे नेता जो अगस्त 1942 से जेल में थे उन्हें जून 1945 में रिहा किया जा रहा था. वायसराय लॉर्ड वेवेल ने अंतरिम सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा के लिए शिमला सम्मेलन बुलाया. हालांकि, यह बातचीत विफल हो गई क्योंकि मोहम्मद अली जिन्ना इस बात पर अड़े रहे कि मुस्लिम लीग ही भारत के मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि है. यह दावा कांग्रेस स्वीकार नहीं कर सकती थी, क्योंकि वह सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी.

1945 नज़दीक आ रहा था, तभी ब्रिटिश सरकार, जिसका नेतृत्व क्लेमेंट एटली की लेबर पार्टी कर रही थी, ने भारत में आम चुनावों की घोषणा कर दी. ये चुनाव गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के अंतर्गत हुए. चूंकि ब्रिटिश सरकार ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की मांग को स्वीकार नहीं किया था, इसलिए मतदान का अधिकार केवल नागरिकता के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर तय किया गया था.

केवल 17 प्रतिशत आबादी ही मतदान करने के योग्य थी. हालांकि कुछ महिलाओं को, यदि वे निर्धारित मानदंडों को पूरा करती थीं या किसी मतदाता की पत्नी थीं, वोट देने का अधिकार मिला, लेकिन पाबंदियां इतनी कड़ी थीं कि 1% से भी कम वयस्क महिलाएं मताधिकार पा सकीं.

यह भी दर्ज करना आवश्यक है कि जहां कांग्रेस सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के पक्ष में थी, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इसका पूरी तरह विरोध कर रहा था.

कांग्रेस ने ‘जनरल’ सीटों पर भारी जीत हासिल की (लगभग 90%), जिससे यह साबित हुआ कि वह गैर-मुस्लिम आबादी की निर्विवाद पसंद थी. कांग्रेस पार्टी का पूरा चुनाव अभियान लगभग अकेले ही जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में चला. उनकी असाधारण शारीरिक मेहनत और बड़े पैमाने पर जनजागरण के कारण उनका यह चुनाव अभियान किंवदंती बन गया.

अक्टूबर 1945 से फरवरी 1946 के बीच उन्होंने इस चुनाव को आज़ादी के मुद्दे पर एक तरह के व्यक्तिगत जनमत-संग्रह में बदल दिया. उन्होंने चार महीने से भी कम समय में लगभग 30,000 मील की यात्रा की, हर संभव साधन से: छोटे चार्टर्ड विमान, ट्रेनें (अक्सर दरवाज़े पर खड़े होकर लोगों का अभिवादन करते हुए), खुली छत वाली कारें, और दूर-दराज़ के गांवों में बैलगाड़ियां भी.

इसी दौरे के दौरान प्रेस ने यह रिपोर्ट करना शुरू किया कि सैकड़ों हजार लोग केवल उनकी एक झलक पाने के लिए घंटों तक धूप या बारिश में इंतज़ार करते थे. अनुमान है कि इस अवधि में उन्होंने व्यक्तिगत रूप से एक करोड़ से अधिक लोगों को संबोधित किया. अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मीडिया ने जल्दी ही यह नोटिस किया कि आम लोग नेहरू में स्वतंत्र भारत के भावी नेता को देख रहे थे.

  • न्यूयॉर्क टाइम्स (11 मई 1946): ‘कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत के साथ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री को लेकर अब कोई संशय नहीं है. यही वो व्यक्ति हैं जिसे ब्रिटिश हुकूमत अंतत: सरकार की कमान सौंपेगी.
  • द टाइम्स (लंदन): ‘पंडित नेहरू केवल एक पार्टी नेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक नए एशिया के प्रतीक के रूप में उभरे हैं. उनका उभार यह पुष्टि करता है कि नई दिल्ली की सत्ता के उत्तराधिकारी वही हैं.’
  • टाइम मैगज़ीन: ‘…वह व्यक्ति, जिसके हाथों में किसी भी अन्य से अधिक, मानव जाति के पांचवें हिस्से का भविष्य निहित है.’
  • द न्यूज़ क्रॉनिकल (लंदन): ने उन्हें ‘भारत का बेताज बादशाह’ बताया.
  • द मैनचेस्टर गार्डियन: ने उन्हें ‘एक राष्ट्र की वैध आवाज़’ कहा.
  • हिंदुस्तान टाइम्स: ‘यह भारी जीत जवाहरलाल नेहरू की व्यक्तिगत जीत है. उनके अथक अभियान ने साबित कर दिया है कि वही इस राष्ट्र की धड़कन और उसका नियत नेता हैं.’
  • अमृत बाज़ार पत्रिका: ‘नेतृत्व की ज़िम्मेदारी उन कंधों पर आई है जो इसे उठाने के लिए सबसे अधिक सक्षम हैं. पंडित नेहरू में भारत को अपना आधुनिक निर्माता और भावी प्रधानमंत्री मिलता है.’

यहां तक कि लॉर्ड वेवेल, जो नेहरू के बड़े प्रशंसक नहीं थे, ने भी अपनी डायरी में माना कि नेहरू की लोकप्रियता अब ऐसी ताकत बन चुकी है जिसे रोका नहीं जा सकता. उन्होंने लिखा कि अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने के लिए नेहरू ही ऐसे नेता थे जिनके पास ‘जनसमर्थन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा’ दोनों मौजूद थे. पूरी दुनिया में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं था कि स्वतंत्र भारत का नेतृत्व नेहरू ही करेंगे.

‘अराजकता से भी बढ़कर भ्रम का दौर’

लेकिन आगे चलकर भारत कौन सा आकार लेगा, इस बात का अनुमान लगाना किसी के लिए भी आसान नहीं था. उस वर्ष की घटनाएं बेहद उथल-पुथल भरी थीं. आईएनए के मुकदमे मई 1946 तक चलते रहे और फरवरी में नौसेना के सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया. मार्च और जून के बीच में कैबिनेट मिशन का भारत आना हुआ, उसके समूह बनाने के प्रस्ताव एक कमजोर भारतीय संघ की ओर इशारा करते थे, जिसमें प्रांतों को ज्यादा ताकत मिलती.

इसी के साथ, जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग को लेकर 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया. इसके बाद जो हिंसा भड़की, वह बेहद भयावह थी और आने वाली त्रासदी की आहट दे रही थी.

इन बढ़ती उलझनों के दौर में कांग्रेस ने अपना अध्यक्ष चुनने का फैसला किया. सामान्यतः कांग्रेस हर साल नया अध्यक्ष चुनती थी, इसलिए यह पद काफी हद तक औपचारिक माना जाता था. युद्ध के कारण 1940 से 1946 के बीच कोई वार्षिक अधिवेशन नहीं हुआ था और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सात वर्षों तक अध्यक्ष बने रहे. जब नामांकन किए गए, तब ‘प्रधानमंत्री’ जैसे किसी विशेष पद का सवाल नेताओं के दिमाग में दूर-दूर तक नहीं था.

नेहरू की जीवनी में सर्वपल्ली गोपाल लिखते हैं,

‘इसके तुरंत बाद, जवाहरलाल को आज़ाद के बाद कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया… लेकिन बाद में इस चुनाव को अलग तरीके से परिभाषित किया जाने लगा. इस पूरी प्रक्रिया को प्रधानमंत्री पद के लिए पटेल, जिनकी कांग्रेस पार्टी की मशीनरी पर मजबूत पकड़ के आधार पर इस पद की प्रबल दावेदारी थी, को बेदखल कर जवाहरलाल नेहरू का रास्ता आसान बनाने के लिए एक गांधीवादी तकनीक के तौर पर देखा जाने लगा. लेकिन उस वक्त इस पूरे घटनाक्रम को कोई भी इस तरह से नहीं देख रहा था. 1946 की गर्मियों में कांग्रेस की अध्यक्षता को हड़बड़ी में पद पर कब्ज़े के बजाय एक त्वरित ज़िम्मेदारी के तौर पर देखा जा रहा था.’

वर्किंग कमिटी के तत्कालीन सदस्य जेबी कृपलानी गांधी पर अपनी किताब में लिखते हैं,

‘गांधीजी ने पहले ही यह इच्छा जताई थी कि उस समय जवाहरलाल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए. गांधीजी ने उनके नाम की सिफारिश क्यों की, इसके कारण, जहां तक मुझे याद है, उन्होंने नहीं बताए थे. प्रस्तावों को एआईसीसी कार्यालय में जमा करने की अंतिम तारीख नजदीक आ रही थी. अध्यक्ष के नाम का प्रस्ताव रखने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के केवल पंद्रह सदस्यों की आवश्यकता होती है. कुछ दिन पहले दिल्ली में वर्किंग कमेटी की बैठक हो रही थी. मैंने एक कागज़ घुमाया, जिसमें जवाहरलाल के नाम का प्रस्ताव रखा. वर्किंग कमेटी के सदस्यों ने उस पर हस्ताक्षर किए, और साथ ही एआईसीसी के कुछ स्थानीय सदस्यों ने भी. इस तरह जवाहरलाल का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित हुआ. इसके बाद अन्य लोगों ने अपने नाम वापस ले लिए. यह तय था कि अगर जवाहरलाल का नाम प्रस्तावित नहीं किया जाता, तो सरदार (पटेल) अध्यक्ष चुने जाते. सरदार को मेरे इस हस्तक्षेप से पसंद नहीं आया. बाद में मैंने सोचा कि क्या मुझे, एक महासचिव के तौर पर, गांधीजी की इच्छा के अनुसार जवाहरलाल के नाम का प्रस्ताव रखने में भूमिका निभानी चाहिए थी. लेकिन उस समय मुझे नहीं लगा कि यह कोई बहुत महत्वपूर्ण मामला है. कांग्रेस का अध्यक्ष वर्किंग कमेटी का चेयरमैन होता है. वह ‘बराबरों में पहला’ होता है. कोई भी महत्वपूर्ण फैसला वर्किंग कमेटी के बिना नहीं लिया जा सकता. साथ ही, मुझे यह भी नहीं लगा कि स्वतंत्रता, किसी भी रूप में, इतनी निकट है. मुझे लगा कि अभी हमें कई और संघर्ष करने होंगे. लेकिन भविष्य का अनुमान कौन लगा सकता है? ऐसे दिखने में मामूली घटनाओं पर ही व्यक्तियों और यहां तक कि राष्ट्रों का भाग्य निर्भर करता है.’

राजमोहन गांधी ने पटेल की अपनी जीवनी में डीपी मिश्रा, जो सरदार के प्रबल समर्थक थे, का हवाला देते हुए लिखा है:

‘जब हमने… कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में (पटेल को) नेहरू पर प्राथमिकता दी, तो हमारा कोई इरादा नेहरू को भविष्य के प्रधानमंत्री पद से वंचित करने का नहीं था… जहां तक भारत के प्रधानमंत्री पद का सवाल है, हमारे मन में हमेशा एक धुंधला-सा विचार था कि… आज़ादी की सुबह में उस ऊंचे पद पर नेहरू का ही आसीन होना तय है.’

इससे स्पष्ट है कि 1946 में कांग्रेस के भीतर कोई भी यह नहीं मानता था कि कांग्रेस अध्यक्ष बनना अपने आप भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का रास्ता तय कर देगा.

नेहरू ने गांधी को क्यों चुना?

कारण बहुत ही साधारण और रणनीतिक रूप से ठोस था. गांधी को ये विश्वास था कि अंतराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए नेहरू किसी भी और नेता से अधिक योग्य थे. नेहरू कांग्रेस के समाजवादी और प्रगतिशील धड़े का चेहरा थे, और उन्हें शीर्ष पर बिठाकर गांधी ने ये सुनिश्चित कर लिया कि भारतीय युवाओं की अस्थिर ऊर्जा मुख्यधारा की कांग्रेस में ही निहित रहे.

आगे जैसे-जैसे पाकिस्तान के लिए मांग ज़ोर पकड़ती जा रही थी, गांधी को नेहरू, धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रतीक के रूप में देख रहे थे. नेहरू के समावेशी नज़रिए ने उन्हें उन तमाम अल्पसंख्यक समूहों के बीच स्वीकार्यता दी, जो हिंदू प्रभुत्व प्रशासन को लेकर सशंकित थे. गांधी को लगा की नेहरू की दृढ़ धर्म निरपेक्षता मुस्लिम लीग की ‘टू नेशन थ्योरी’ का एक बेहतरीन वैचारिक जवाब था.

हम ये भूल जाते हैं कि कांग्रेस तब भी मुस्लिम बहुल प्रांतों को रिझाने में लगी हुई थी, और अखंड भारत के निर्माण को लेकर आशावान थी. हमेशा की तरह गांधी ने भारत और इसके लोगों के बारे में सोचा. नेहरू को उनकी एकमात्र पसंद बनना ही था. 1946 की गर्मियों में कांग्रेस की अध्यक्षता कांटों से भरा ताज था, न की कोई पुरस्कार.

वायसराय ने 12 अगस्त 1946 में जब कांग्रेस अध्यक्ष को सरकार के गठन के लिए औपचारिक तौर पर आमंत्रित किया, तब नेहरू अकेले ही नहीं चले गए. कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडबल्यूसी) ने एक सब कमिटी की नियुक्ति की, जिसमें नेहरू, पटेल, आज़ाद और प्रसाद के नाम शामिल थे. इस कमिटी ने बहुत ही विस्तार से विभिन्न हितों का संतुलन बनाने हेतु विचार विमर्श किया, जैसे नियमित कांग्रेसी, अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों (सिख, पारसी, भारतीय ईसाई), और दलित.

महत्वपूर्ण रूप से ऐसा कोई भी नियम नहीं था जो ये कहता था कि केवल पार्टी प्रमुख ही सरकार का नेतृत्व कर सकते हैं. कांग्रेस को किसी भी नाम का सुझाव देने की पूरी स्वतंत्रता थी. ब्रिटिश संसद में जहां विंस्टन चर्चिल प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य कर रहे थे, वहीं नेविल चेम्बरलेन ने कंजरवेटिव पार्टी के मुखिया के रूप में अपना काम जारी रखा. प्रधानमंत्री बनने बाद नेहरू ने भी अध्यक्ष पद त्याग दिया था. इसके बाद कृपलानी ने अध्यक्षता संभाली थी.

आज के पुनरीक्षणवादियों द्वारा जवाहरलाल नेहरू को सत्ता हड़पने वाले व्यक्ति के रूप में पेश करने का प्रयास, भारतीय लोगों की बुद्धिमत्ता और स्वतंत्रता के संघर्ष की प्रामाणिकता का सोच समझ किर सुनियोजित तरीक़े से किया गया अपमान है. यह बताना कि सरदार पटेल के साथ धोखा हुआ, इस बात के दस्तावेज़ी प्रमाण को भी नज़रअंदाज़ करना है कि पटेल के कट्टर समर्थक भी नेहरू को नए राष्ट्र की न्यायसंगत आवाज़ और नियति के नेता के रूप में देख रहे थे.

पटेल एक बहुत ही अनुशासित और संगठनात्मक प्रतिभा के व्यक्ति थे, लेकिन वो यथार्थवादी भी थे, जिन्हें राष्ट्र निर्माण जैसे कठिन कार्य के लिए अनिवार्य नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व का एहसास था. ये दो व्यक्ति सत्ता के किसी खेल के प्रतिद्वंद्वी नहीं थे. वे वक़्त और परिस्थितियों के साझेदार थे.

भाजपा के द्वारा बेची जा रही पटेल के साथ हुए अन्याय की झूठी कहानी सरदार को आदर देने की नहीं बल्कि उनकी स्मृतियों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर उस धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक बुनियाद को बर्बाद करने की है, जिसे नेहरू ने डाली.

इतिहास को जब पूरे तौर पर और संदर्भों के साथ पढ़ा जाता है, तब एक सामूहिक ज़िम्मेदारी की कहानी सामने आती है, न की किसी पद के किसी तुच्छ चोरी की कहानी. अब वो वक़्त आ गया है कि अतीत की दस्तावेज़ी आवाज़ को दबाने के लिए हो रहे प्रोपगैंडा के शोर को हम अनुमति देना बंद करें.

(पीए कृष्णन अंग्रेज़ी और तमिल के लेखक हैं. वे विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.)

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(इस लेख का अनुवाद निशांत ने किया है.)