नई दिल्ली: लोकसभा में पेश किए गए विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधन पर गहराते विवाद के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला करते हुए इस प्रस्तावित कानून के माध्यम से गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को ‘नियंत्रित’ करने का प्रयास करने का आरोप लगाया.
मालूम हो कि एक अप्रैल (बुधवार) को विवादित ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश होना था. विपक्षी दलों और चुनावी राज्य केरल में ईसाई समुदाय के नेताओं के विरोध के बीच केंद्र ने इसे पारित कराने की प्रक्रिया को टाल दिया है.
इस संबंध में सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक लंबे पोस्ट में अखिलेश यादव ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक लाने से पहले विदेशी निधि पर भाजपा के रुख में ‘गंभीर विरोधाभास’ को लेकर स्पष्टता की मांग की है.
उन्होंने कहा, ‘जो पैसा विदेशों से ‘पीएम केयर्स फंड’ में आया था वो लौटाया जाएगा या उसको भी ऑडिट की तरह विशेष छूट देकर गटक लिया जाएगा.’
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर भी सवाल उठाए, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही रद्द किया जा चुका है.
उन्होंने पूछा, ‘जो पैसा इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से आया था उसे भाजपा कब लौटाएगी. जब इलेक्टोरल बॉन्ड ही अवैध घोषित हो गये हैं तो उससे मिला पैसा कैसे वैध है.’
अखिलेश यादव ने सवाल किया कि जो पैसा ‘गैर पंजीकृत एनजीओ’ के खातों में आता है उसका क्या होगा. कहीं ये उसी की विदेशी जड़ें काटने की आपसी लड़ाई तो नहीं है.
NGOs की विदेशी फ़ंडिंग को नियमित करने के नाम पर जो Foreign Contribution (Regulation)
Amendment Bill, 2026 की धांधली होने वाली है, उसको लाने से पहले भाजपा बताए कि :– जो पैसा विदेशों से PM CARE FUND में आया था वो लौटाया जाएगा या उसको भी ऑडिट की तरह विशेष छूट देकर गटक लिया जाएगा।…
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) April 1, 2026
उन्होंने आरोप लगाया, ‘तथाकथित धर्मार्थ उगाहे गए, मंदिर निर्माण के नाम पर बटोरे गए उस चंदे का हिसाब कौन देगा, जो भाजपा से संबद्ध संगी-साथी मुखौटा संगठनों मतलब परिषद, वाहिनी आदि ने हड़प लिए. उसमें भी विदेशों से अथाह पैसा आया था. इनसे जुड़े सभी पदाधिकारियों के खातों और संपत्तियों से वसूली की जाए.’
भाजपा पर ‘तानाशाही दृष्टिकोण’ अपनाने का आरोप लगाते हुए लोकसभा सदस्य ने कहा कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य स्वतंत्र संगठनों को सरकार के नियंत्रण में लाना है.
सपा अध्यक्ष ने कहा, ‘दरअसल ये भाजपाई राजनीति की अलोकतांत्रिक, अति नियंत्रणवादी एकाधिकारी सोच के हैं जो गैर सरकारी संगठनों पर अवांछित नियंत्रण करके, उन्हें अपनी कठपुतली बनाना चाहती है और इसके बहाने धीरे-धीरे उनकी संपत्ति को ही हड़प लेना चाहती है.’
उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार खुद तो कुछ करती नहीं है और जो सच्चे स्वतंत्र गैर सरकारी संगठन अच्छा काम कर रहे हैं उनको भी नहीं करने देना चाहती है क्योंकि कई बार जनता कहती है कि सरकार से ज्यादा अच्छा काम तो गैर सरकारी संस्थाएं कर दिखाती हैं, इससे कई मोर्चों पर सरकार की बेहद किरकिरी होती है और भाजपाइयों की नाकामी उजागर हो जाती है.
लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता यादव ने पूछा, ‘भाजपा ये भी बताए कि जो पैसा विदेश से विधि-विधान से आ रहा है उस पर तो इतने प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं लेकिन उस अकूत धन का क्या जो अवैध रूप से विदेश जा रहा है मतलब जो दौलत उनके मित्र विदेश ले जाकर और वहां बेखौफ रहकर आराम से ऐश कर रहे हैं, उनकी जमीनें-संपत्ति कब जब्त करके वसूली की जाएगी या उन ‘भगोड़े भाजपाई भाइयों’ को वैसे ही विशेष छूट मिलती रहेगी जैसे कि साम्राज्यवादी ताकतों का साथ देनेवाले उनके मुखबिर संगी-साथियों और वैचारिक पूर्वजों को स्वतंत्रता से पहले मिलती रही थी.’
उन्होंने कहा कि जनता इस बार भाजपा के पक्षपात का एटीएम बंद कर देगी.
अखिलेश यादव ने अपनी पोस्ट के अंत में लिखा, ‘भाजपा की बदनीयत और बेईमानी ही उसके हर विधेयक की बुनियाद होती है. भाजपा जाए तो चैन आए!’
गौरतलब है कि इस संबंध में द वायर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि कैसे प्रक्रियात्मक खामियों और कर दाखिल करने की गलतियों से लेकर ‘विकास विरोधी गतिविधियों, जबरन धर्मांतरण और देश विरोधी प्रदर्शन आदि में शामिल होने’ को एफसीआरए लाइसेंस रद्द या रिन्यूअल अस्वीकार होने की वजह बताते हुए, कई बार इन नियमोंं को सख्त करने के बाद केंद्र सरकार ने गोपनीयता का हवाला देते हुए संसद के साथ ऐसी कार्रवाइयों की बुनियादी, एकत्रित जानकारी भी साझा करने से इनकार कर दिया है.
यह जानकारी तब सामने आई जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि 2024 से एफसीआरए लाइसेंस रद्द करने, नवीनीकरण न होने और संबंधित आंकड़ों के बारे में जानकारी मांगने के उनके बार-बार के प्रयासों को राज्यसभा में अस्वीकार कर दिया गया है.
