ईरान पर अमेरिका-इज़रायल हमलों का 35वां दिन: नवरोज़ जश्न के दौरान अमेरिकी हमले में 8 लोगों की मौत

अमेरिका-इज़रायल के हमलों के 35वें दिन ईरान में तनाव बना हुआ है. नवरोज़ समापन के जश्न के दौरान अमेरिकी हमले में 8 लोगों की मौत और कई घायल हुए. दूसरी तरफ लेबनान में इज़रायल के हमले जारी हैं.

इज़रायल के पेटाह टिक्वा शहर में ईरानी मिसाइल हमले के बाद मौके का निरीक्षण करते सुरक्षा बल और राहत टीमें, 2 अप्रैल 2026. (फोटो: एपी/पीटीआई)

नई दिल्ली: अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के 35वें दिन भी पश्चिम एशिया में हालात सामान्य होते नहीं दिख रहे हैं. शुक्रवार तक संघर्ष लगातार फैलता नजर आया. ईरान की राजधानी तेहरान समेत कई इलाकों में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं.

अमेरिकी हमले में एक प्रमुख पुल को निशाना बनाए जाने की घटना में कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई, जबकि 95 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं. यह हमला उस समय हुआ जब लोग पारसी नववर्ष ‘नवरोज़’ के समापन पर ‘नेचर डे’ मना रहे थे. इस हमले की ईरान ने कड़ी निंदा की है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान से खतरा लगभग खत्म हो चुका है और अमेरिका अपने रणनीतिक लक्ष्यों के करीब पहुंच चुका है. हालांकि, जमीनी स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है. ईरान ने साफ किया है कि उसके पास अब भी हथियारों और मिसाइलों का पर्याप्त भंडार मौजूद है और जिन ठिकानों को निशाना बनाया गया, वे ‘महत्वहीन’ थे.

संघर्ष का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. कुवैत और बहरीन ने भी अपने ऊपर हमलों की जानकारी दी है. लेबनान में इज़रायल की जमीनी कार्रवाई जारी है, जहां एक ही दिन में 27 लोगों की मौत हो गई. यहां इज़रायल, ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए है.

अब तक इस युद्ध में ईरान में 1,900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इज़रायल में 19 लोगों की जान गई है. खाड़ी देशों और वेस्ट बैंक में भी दो दर्जन से अधिक लोगों की मौत की खबर है. लेबनान में 1,300 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं. इस संघर्ष में 13 अमेरिकी सैनिकों की भी मौत हुई है.

इस बीच, अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने युद्ध के बीच अमेरिकी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल रैंडी जॉर्ज से पद छोड़ने को कहा है. इस फैसले के पीछे के कारण स्पष्ट नहीं किए गए हैं, लेकिन इसे सैन्य नेतृत्व में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है.

जंग का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिख रहा है. कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो फरवरी के अंत से करीब 50 प्रतिशत अधिक है. इसके चलते पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ आम वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होने की आशंका है.

इस बीच, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर वैश्विक चिंता भी बढ़ गई है, जो दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है. ब्रिटेन की पहल पर हुई एक अंतरराष्ट्रीय बैठक में भारत समेत 40 से अधिक देशों ने हिस्सा लिया, जहां इस मार्ग को फिर से खोलने और सुरक्षित आवाजाही बहाल करने पर चर्चा हुई.

भारत की ओर से विदेश सचिव ने बैठक में हिस्सा लेते हुए अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में निर्बाध आवाजाही के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि मौजूदा संकट का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा है और खाड़ी क्षेत्र में हालिया हमलों में भारतीय नाविकों की जान जाने की घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय हैं.

बैठक में कई देशों ने ईरान पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ाने, यहां तक कि प्रतिबंध लगाने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया. हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया कि इस संकट का समाधान तनाव कम करने और संवाद के रास्ते से ही संभव है.

ब्रिटेन के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है. जहां आम तौर पर रोज़ करीब 150 जहाज गुजरते थे, वहीं हाल के दिनों में यह संख्या घटकर बेहद कम रह गई है. इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर असर पड़ रहा है.

कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान ने इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों के लिए एक तरह की ‘टोल व्यवस्था’ लागू कर दी है, जिसके तहत जहाजों को अनुमति लेकर और शुल्क चुकाकर ही गुजरना पड़ रहा है. हालांकि, भारत ने साफ किया है कि इस तरह के किसी भुगतान को लेकर उसकी ईरान से कोई बातचीत नहीं हुई है.

भारत सरकार अब तक इस पूरे विवाद में संतुलित रुख अपनाते हुए ईरान के साथ सीधे संवाद के जरिए अपने ऊर्जा हितों और समुद्री सुरक्षा को सुनिश्चित करने पर जोर देती रही है.

कुल मिलाकर, 35 दिन बाद भी यह संघर्ष थमता नजर नहीं आ रहा है. दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर बना हुआ है, जबकि आम नागरिकों पर इसका असर लगातार गहराता जा रहा है.