राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर बिल पर अपनी ही आलोचनात्मक टिप्पणियांं हटाईं, कहा- ग़लती से शामिल हुईं

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर बेंच ने ट्रांसजेंडर विधेयक, जो अब क़ानून बन चुका है, पर 30 मार्च को अपने एक फैसले के अंत में शामिल आलोचनात्मक टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि कुछ पैराग्राफ ग़लती से शामिल हो गए थे, जो न तो इरादतन थे और न ही ज़रूरी थे.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: राजस्थान हाईकोर्ट ने गुरुवार (2 अप्रैल) को अपने ही 30 मार्च के एक फैसले से ट्रांसजेंडर अधिकार अधिनियम में हाल ही में किए गए संशोधनों की आलोचना करने वाले तीन अनुच्छेदों को हटाने का आदेश दिया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने माना कि फैसले के अंत में जो उपसंहार (एपिलॉग) लिखा गया था, उसमें भूलवश कुछ ऐसे अनुच्छेद (पैरा 3, 4 और 5) शामिल हो गए थे, जो न तो इरादतन थे और न ही जरूरी थे.

उल्लेखनीय है कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित करने वाले जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने पाया कि पहले के फैसले के उपसंहार में कुछ अंश ‘अनजाने में’ शामिल हो गए थे.

अदालत ने कहा, ‘उपसंहार को दोबारा पढ़ने पर पाया गया कि उसमें गलती से कुछ ऐसे अनुच्छेद शामिल हो गए थे, जो न तो इरादतन थे और न ही जरूरी थे.’ इसके बाद अदालत ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में प्रस्तावित संशोधन के निहितार्थों पर चर्चा करने वाले तीन अनुच्छेदों को हटाने का आदेश दिया.

उल्लेखनीय है कि इन पैराग्राफ में अदालत ने हाल ही में पारित कानून पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति का अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने का अधिकार ‘किसी रियायत का विषय नहीं, बल्कि एक अधिकार’ है. अदालत ने चेतावनी दी थी कि नया ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक इस अधिकार को कमज़ोर कर ‘राज्य-नियंत्रित अधिकार’ में बदल सकता है.

अदालत ने यह टिप्पणी एक ट्रांस महिला गंगा कुमारी की याचिका पर दिए गए अपने फैसले के ‘एपिलॉग’ (समापन भाग) में की थीं, जिसमें राज्य सरकार से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए समान आरक्षण लागू करने की मांग की गई थी.

हाईकोर्ट ने कहा था कि 2014 के नालसा फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर लोगों के इस अधिकार को मान्यता दी थी. लेकिन संशोधन विधेयक में प्रस्ताव है कि ‘लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता प्रमाणपत्र, जांच या अन्य प्रशासनिक स्वीकृति पर निर्भर होगी.’

गुरुवार को ये सभी टिप्पणियां हटा दी गईं.

हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ता गंगा कुमारी की इस अपील को खारिज कर दिया कि उपसंहार को फैसले का हिस्सा न माना जाए या मिसाल के तौर पर विचार न किया जाए.

पीठ ने कहा, ‘वकील की बात सुनने और आवेदन का अध्ययन करने के बाद हम इस दलील को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हैं कि 30.03.2026 के उपसंहार को उसी तारीख के फैसले का हिस्सा न माना जाए या मिसाल के तौर पर उसका हिस्सा न समझा जाए. इसलिए इस संबंध में कोई आदेश देना उचित नहीं है.’

पीठ ने आगे निर्देश दिया कि उपसंहार में एक नया स्पष्टीकरण जोड़ा जाए. आदेश में कहा गया, ‘फिर भी मुख्य निर्णय में दिए गए निर्देश निर्णय की तिथि पर प्रचलित कानूनी स्थिति के अनुसार पारित किए गए हैं और उनका तदनुसार पालन किया जाना चाहिए.’

संशोधन के बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके 30 मार्च के निर्णय के उपसंहार में अब यह दर्ज किया जाएगा कि निर्णय को अंतिम रूप दिए जाने के दौरान, संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर दिया था.

हालांकि, निर्णय की तिथि पर,विधेयक अभी तक कानून नहीं बना था क्योंकि यह अभी भी राष्ट्रपति की सहमति और औपचारिक अधिसूचना की प्रतीक्षा कर रहा था. न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि 30 मार्च के पूर्व निर्णय को उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट से हटा दिया जाए. संशोधित उपसंहार सहित एक संशोधित संस्करण अपलोड किया जाना है.