बीते हफ़्तों में इंस्टाग्राम या फेसबुक पर स्क्रॉल करते वक्त लगभग हम सभी को एक गुलाबी हाथी बार-बार दिखाई दिया, जिस पर उसी गुलाबी रंग में रंगी एक लड़की बैठी थी. यह गुलाबी हाथी क्या था?
यह एक आर्ट इंस्टॉलेशन था जो कि बर्सिलोना (स्पेन) की रहने वाली ट्रैवलिंग आर्ट फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा की आर्ट सीरीज़ ‘पिंक सिटी’ का एक हिस्सा था. जूलिया ने उस सेटअप में हाथी और एक मॉडल की कुछ तस्वीरें लीं और कुछ महीनों बाद उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किया.
हाल ही में इस ‘गुलाबी हाथी’ की तस्वीरों ने लोगों के बीच काफी तेज प्रतिक्रिया पैदा की. तस्वीरें वायरल हुईं, बहुत से लोगों ने इसे पशु-क्रूरता बताया, और जब इसी हलचल के बीच उस हाथी ‘चंचल’ की मृत्यु की ख़बर सामने आई, तो यह मामला और भी ज्यादा संवेदनशील और विवादास्पद बन गया.
पहली नजर में यह घटना साफ तौर पर क्रूरता जैसी लगती है, लेकिन अगर हम इसे थोड़ा गहराई से देखें, तो यह सिर्फ एक घटना नहीं है. यह हमारे समाज की उस बड़ी सच्चाई को सामने लाती है, जहां जानवरों के साथ होने वाली कई क्रूरताएं सामान्य मानी जाती हैं, लेकिन हमारा गुस्सा केवल कुछ खास घटनाओं पर ही बाहर आता है.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जिस रंग से हाथी को रंगा गया था, वही रंग एक इंसानी मॉडल पर भी इस्तेमाल किया गया था. राजस्थान समेत भारत के कई हिस्सों में हाथियों को सजाने और रंगने की परंपरा पहले से चली आ रही है. अभी तक ऐसा कोई पक्का सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि हाथी की मौत उसी रंग की वजह से हुई. ज्यादा संभावना यही लगती है कि मौत प्राकृतिक कारणों से हुई हो. ऐसे में सिर्फ इस एक दृश्य को क्रूरता का केंद्र बना देना, असली समस्या को सीमित कर देता है.
हाथी की सवारी से परेशानी क्यों नहीं?
जिस जगह यह घटना हुई, वहां ‘हाथीगांव’ जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जहां बड़ी संख्या में हाथियों को रखा जाता है और उनका इस्तेमाल मुख्य रूप से पर्यटकों के मनोरंजन के लिए किया जाता है. इन हाथियों की पीठ पर भारी काठी यानी हौदा बांधा जाता है, जिसका वजन लगभग 150 से 200 किलो तक होता है, और फिर सवारी के समय उसके ऊपर 2 से 4 लोग बैठते हैं. इस तरह कुल वजन 400 से 600 किलो तक पहुंच जाता है.
हाथी ताकतवर जरूर होते हैं, लेकिन उनकी रीढ़ इस तरह का वजन ढोने के लिए बनी नहीं होती. लंबे समय तक यह सब झेलना उनके लिए गंभीर शारीरिक और मानसिक दर्द का कारण बनता है. हौदे का लगातार इस्तेमाल हाथियों के शरीर पर गहरा असर डालता है. उनकी रीढ़ की हड्डी पर असामान्य दबाव पड़ता है, जिससे स्थायी नुकसान और विकृति हो सकती है.
साथ ही, काठी के घर्षण से त्वचा के नीचे तक चोट और घाव बन जाते हैं, सूजन हो जाती है, और कई बार ये घाव लंबे समय तक ठीक नहीं होते. लगातार वजन ढोने से दर्द स्थायी हो जाता है, जिससे हाथी लंगड़ाने लगते हैं और ठीक से चल भी नहीं पाते. ऐसे हाथियों में घाव और चोटें बहुत आम हो जाती हैं.
इसके अलावा, लगातार बंधन और नियंत्रण में रहने से उनमें मानसिक तनाव बढ़ता है, जिससे उनका व्यवहार बदल जाता है और कई बार वे आक्रामक भी हो जाते हैं.
बात केवल हाथी की ही नहीं
अगर इस पूरे मामले को महज़ हाथियों तक सीमित न रखें, तो साफ दिखाई देता है कि जानवरों के साथ क्रूरता हमारे समाज के कई हिस्सों में फैली हुई है. शादियों में घोड़ों का इस्तेमाल परंपरा के रूप में होता है, लेकिन वही घोड़े तेज रोशनी, तेज आवाज, पटाखों और भीड़ के बीच घंटों खड़े रहने को मजबूर होते हैं. उनके मुंह में कसी हुई लगाम और शरीर पर भारी सजावट उनकी तकलीफ को और बढ़ा देती है. कई बार वे थकावट और डर के कारण गिर भी जाते हैं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि यह सब हमारे लिए एक आम दृश्य बन चुका है.
इसी तरह ऊंटों का इस्तेमाल रेगिस्तानी पर्यटन में बड़े पैमाने पर होता है, जहां वे तेज गर्मी, कम पानी और लगातार काम के बीच जीते हैं. बंदरों को करतब सिखाने के लिए उन्हें डर और मार के जरिए प्रशिक्षित किया जाता है और छोटे बंधन में रखा जाता है. सांपों के साथ तो और भी बुरा होता है, उनके दांत तोड़ दिए जाते हैं या उनका जहर निकाल दिया जाता है ताकि वे सुरक्षित दिख सकें, लेकिन इस प्रक्रिया में वे अक्सर मर जाते हैं या बीमार हो जाते हैं.
कई पक्षियों जैसे- तोते, मैना और उल्लू को छोटे-छोटे पिंजरों में बंद कर दिया जाता है, जिससे वे अपनी प्राकृतिक उड़ान से वंचित हो जाते हैं. बैलों और सांडों को प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल किया जाता है, जहां उन्हें उत्तेजित करने के लिए कई बार हिंसक तरीके अपनाए जाते हैं. कई उदाहरण तो ऐसे भी देखे गए हैं जहां पालतू जानवरों के साथ भी अक्सर लापरवाही होती है, उन्हें सही खाना, इलाज या देखभाल नहीं मिलती.
इन सभी उदाहरणों में एक ही बात साफ दिखती है कि इंसान अपने मनोरंजन, सुविधा और फायदे के लिए जानवरों की पीड़ा को नजरअंदाज कर देता है. क्योंकि यह क्रूरता हमेशा साफ दिखाई नहीं देती, इसलिए यह हमें उतना झकझोरती भी नहीं है. लेकिन जैसे ही कोई एक दृश्यात्मक घटना सामने आती है, हमारा गुस्सा अचानक बढ़ जाता है.
इस पूरे मामले में एक और चिंताजनक बात यह है कि जूलिया को सोशल मीडिया पर जिस तरह की गालियां, धमकियां और अपमानजनक टिप्पणियां मिलीं, वह बिल्कुल गलत है. खासकर तब जब अभी तक यह साबित ही नहीं हुआ कि हाथी की मौत उसी कारण से हुई थी. यह बहुत आसान सरलीकरण है, जहां बिना पूरी बात जाने जो सामने दिख रहा है उसी पर दोष मढ़ दिया जाता है.
‘सुविधाजनक’ आक्रोश क्यों?
ऐसी घटनाओं में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक तरफ हम खुद उन शादियों और आयोजनों का हिस्सा बनते हैं जहां हाथियों पर बारात निकाली जाती है, उन्हें रंगा और सजाया जाता है, और हम खुद उन पर बैठकर आनंद लेते हैं. लेकिन जब वही चीज किसी दूसरे संदर्भ में होती है, खासकर किसी विदेशी कलाकार द्वारा, तो अचानक हमारी संवेदनशीलता जाग जाती है.
भारत में पशु संरक्षण के लिए कानून मौजूद हैं जैसे पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम 1960 और वन्यजीव संरक्षण कानून 1972, लेकिन उनका सही तरीके से पालन नहीं होता. अवैध कैद, शोषण और जानवरों से जबरदस्ती काम करवाना आज भी जारी है. यह बात कई बार कही जा चुकी है और बार-बार कहना ज़रूरी है कि सिर्फ कानून होना काफी नहीं है, उनका सख्ती से लागू होना भी जरूरी है.
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों ने असली जिम्मेदारों से सवाल पूछने के बजाय अपना गुस्सा एक आसान लक्ष्य पर निकाल दिया. सवाल उठने चाहिए थे उन संस्थाओं पर जो हाथियों के रख-रखाव और उपयोग के लिए जिम्मेदार हैं, जैसे सरकारी व्यवस्था, वन विभाग और प्रबंधन सिस्टम. लेकिन इसके बजाय एक व्यक्ति को निशाना बनाया गया, जिससे असली मुद्दा पीछे छूट गया.
मेरे अपने अनुभव भी यही दिखाते हैं कि ऑनलाइन गुस्सा और जमीन की सच्चाई अलग होती है. मैंने खुद देखा है कि जो लोग जूलिया की आलोचना कर रहे थे, उन्हें ट्रोल कर रहे थे, उन्हीं में से कुछ लोगों की प्रोफाइल पर ऐसे शादी और समारोहों की तस्वीरें थीं जहां हाथियों का इस्तेमाल किया गया था. बाद में उन्होंने वे तस्वीरें हटा दीं, लेकिन इससे सच्चाई नहीं बदलती.
हर तरह की क्रूरता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत
एक वन्यजीव रेस्क्यूअर के रूप में मैंने कई बार घायल कुत्तों, बिल्लियों और सांडों को बहुत बुरी हालत में देखा है. कई बार सांपों को बचाने के लिए बुलाया जाता है, लेकिन जब तक मैं पहुंचता हूं, तब तक उन्हें मार दिया जाता है. शादियों में लंगड़ाती घोड़ी के पास लोगों को नाचते हुए देखना भी आम बात है. सोशल मीडिया के दौर में यह अक्सर साबित हुआ है कि कैसे हमारी संवेदनशीलता सिर्फ दिखावे तक सीमित होती है.
असल में ‘गुलाबी हाथी’ कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि यह एक आईना है जो हमें हमारा ही व्यवहार दिखाता है. यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम जानवरों को सच में एक जीवित और संवेदनशील प्राणी मानते हैं, या सिर्फ एक साधन के रूप में देखते हैं.
यह मुद्दा सिर्फ एक हाथी या एक कलाकार का नहीं है, बल्कि हमारी सोच का है. जब तक हम हर तरह की क्रूरता के खिलाफ एक समान आवाज नहीं उठाते, तब तक कोई भी बदलाव अधूरा रहेगा. परंपराओं को भी समय के साथ परखने, ज़रूरी हो तो बदलने की जरूरत है, खासकर तब जब वे किसी और जीव के दर्द का कारण बन रही हों.
यह घटना हमें सिर्फ प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि खुद को देखने और समझने का मौका देती है. असली सवाल यही है कि क्या हम सच में बदलाव चाहते हैं, या सिर्फ सोशल मीडिया पर ख़ुद को ‘एनिमल लवर’ दिखाने के लिए गुस्सा करते हैं.
हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां हमारा आक्रोश सोशल मीडिया ट्रेंड्स तय करते हैं और रोज़मर्रा की क्रूरता का कोई हैशटैग नहीं बनता. केवल एक अंगूठे से दिन के ज्यादातर फैसले लेने वाले हम, अपने आक्रोश को भी उतनी ही देर देते हैं जितनी देर एक स्वाइप में लगती है. चुनिंदा मुद्दों पर उठते आक्रोश को हम तुरंत राइट स्वाइप कर देते हैं, और रोज़मर्रा की क्रूरता पर हमारा लेफ्ट स्वाइप स्थायी है. जब तक हमारा आक्रोश हर जगह समान नहीं होगा, तब तक हमारी संवेदनशीलता भी अधूरी रहेगी.
(मृदुल वैभव वन्यजीव फोटोग्राफर, स्नेक रेस्क्यूअर और पर्यावरण विशेषज्ञ हैं.)
