ग्रेट निकोबार परियोजना से आदिवासियों का विस्थापन न होने का केंद्र सरकार का दावा झूठ: कांग्रेस

अंडमान निकोबार प्रशासन ने ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना से प्रभावित स्थानीय समुदायों के लिए एक मसौदा पुनर्वास योजना तैयार की है, और इसे अंतिम रूप देने के लिए ज़ोर दे रहा है. इसका हवाला देते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि केंद्र का यह दावा कि परियोजना से स्थानीय जनजातियां प्रभावित या विस्थापित नहीं होंगी ‘साफ तौर पर झूठ’ था.

ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित गलाथिया राष्ट्रीय उद्यान. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: andamantourism.gov.in/VASHALE DEVI)

नई दिल्ली: कांग्रेस ने शनिवार (4 अप्रैल) को 92,000 करोड़ रुपये की ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना से प्रभावित निकोबारी परिवारों को ‘पुनर्वास’ करने की नई मसौदा योजना को लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधा.

पार्टी नेता जयराम रमेश ने कहा, ‘बुलडोजर स्थानीय समुदायों की चिंताओं की परवाह किए बिना आगे बढ़ रहा है.’

एक सोशल मीडिया पोस्ट में द हिंदू की रिपोर्ट का हवाला देते हुए – जिससे स्थानीय लोगों में भ्रम और चिंता पैदा हुई है – कांग्रेस सांसद और संचार प्रभारी महासचिव रमेश ने कहा कि केंद्र के पहले के दावे कि इस परियोजना से स्थानीय जनजातियों के प्रभावित या विस्थापित नहीं होंगे ‘साफ तौर पर झूठ’ थे.

द हिंदू ने शनिवार (4 अप्रैल) को रिपोर्ट किया था कि अंडमान निकोबार प्रशासन ने ग्रेट निकोबार द्वीप पर इस प्रोजेक्ट से प्रभावित स्थानीय समुदायों के लिए एक मसौदा पुनर्वास योजना तैयार की है, और इसे अंतिम रूप देने के लिए ज़ोर दे रहा है. केंद्र के वकीलों ने कलकत्ता हाईकोर्ट को बताया है कि वे 15 दिनों के भीतर आदिवासियों की सहमति दिखा देंगे.

यह परियोजना, जिसे 2022 में चरण-1 की मंजूरी दी गई थी, में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक एकीकृत टाउनशिप, नागरिक और सैन्य उपयोग का हवाई अड्डा, तथा 450 एमवीए क्षमता वाला गैस और सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट बनाया जाएगा.

हालांकि, इस परियोजना की मंज़ूरियों को कलकत्ता हाईकोर्ट की एक पीठ के सामने चुनौती दी गई है. यह चुनौती सहमति प्रक्रियाओं और स्थानीय जनजातियों के वन अधिकारों के कथित उल्लंघन को लेकर दी गई है.

जिस तरह से यह परियोजना आगे बढ़ रहा है, उसका ज़िक्र करते हुए रमेश ने कहा, ‘बुलडोज़र स्थानीय समुदायों की चिंताओं की परवाह किए बिना आगे बढ़ रहा है. लेकिन यहां एक बुनियादी विरोधाभास है: (नरेंद्र) मोदी सरकार दावा करती है कि ग्रेट निकोबार इंफ्रा प्रोजेक्ट जनजातियों को प्रभावित या विस्थापित नहीं करेगा – तो फिर पुनर्वास योजना क्यों? साफ़ तौर पर यह दावा झूठ है.

मसौदा योजना में पुनर्वास कहां होगा और किन लोगों का पुनर्वास किया जाएगा, इस संबंध में दिए गए विवरणों ने ग्रेट निकोबार के समुदाय के सदस्यों के बीच भ्रम पैदा कर दिया है. ये समुदाय सदस्य 2004 की सुनामी के कारण जिन पश्चिमी तटीय वन क्षेत्रों से विस्थापित हुए थे, वहां अपने पुश्तैनी जंगलों में वापस लौटने की मांग कर रहे हैं.

मालूम हो कि इस परियोजना में ग्रेट निकोबार द्वीप की 16,610 हेक्टेयर भूमि पर एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (आईसीटीटी), एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और 450 एमवीए गैस और सौर-आधारित बिजली संयंत्र आदि विकसित करना शामिल है.

इन विकास परियोजनाओं के निर्माण के लिए 130 वर्ग किलोमीटर जंगल को परिवर्तित करना भी शामिल है. यह द्वीप पर रहने वाले स्वदेशी शोम्पेन और निकोबारी समुदायों को भी प्रभावित करेगा.

पारिस्थितिकीविदों, मानवविज्ञानियों, सांसदों और नागरिक समाज संगठनों ने इस परियोजना का विरोध किया है क्योंकि इससे स्थानीय लोगों पर संभावित प्रतिकूल सांस्कृतिक प्रभाव पड़ेगा. दस लाख से अधिक पेड़ों की कटाई, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों के आसपास निर्माण और पर्यटन के लिए आगंतुकों की आमद के कारण संभावित पारिस्थितिक प्रभावों के लिए भी इसकी आलोचना की गई है.