कश्मीर: गांदरबल में मारे गए युवक के परिवार की शव लौटाने की मांग विधानसभा में गूंजी, न्यायिक जांच की मांग

भारतीय सेना ने 31 मार्च और 1 अप्रैल की दरमियानी रात गांदरबल में मुठभेड़ में एक आतंकी को मार जाने का दावा किया था. इस व्यक्ति के परिवार ने आतंकवाद के आरोप का खंडन किया है. 4 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस शख़्स के शव को लौटाने की मांग करते हुए सेना के इस दावे का विरोध किया कि वह आतंकी था.

4 अप्रैल, 2026 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र के दौरान विधायक इरफ़ान हाफ़िज़ लोन गांदरबल में कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ की जांच की मांग करते हुए तख्तियां थामे हुए हैं. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: गांदरबल मुठभेड़ का मुद्दा शनिवार (4 अप्रैल) को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में गूंजा, जहां सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस ने युवक के शव को लौटाने की मांग की और सेना के इस दावे का विरोध किया कि वह एक आतंकी था.

शनिवार को शीतकालीन सत्र के समापन के अंतिम दिन जब विधानसभा की बैठक हुई, तो सत्तारूढ़ दल के विधायक मुबारक गुल ने इस सप्ताह की शुरुआत में विवादास्पद मुठभेड़ में मारे गए ‘निर्दोष’ युवक के लिए न्याय की मांग की.

गांदरबल के लार इलाके के चौंटवालीवार गांव के निवासी और कॉमर्स में पोस्ट-ग्रेजुएट राशिद अहमद मुगल का शव 1 अप्रैल को सेना द्वारा स्थानीय पुलिस को सौंपा गया था. सेना का दावा था कि वह एक आतंकी था और अरहामा के जंगलों में मुठभेड़ के दौरान मारा गया.

हालांकि, मुगल के परिवार ने सेना के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि उसका आतंकवाद से कोई संबंध नहीं था और आरोप लगाया कि उन्हें ‘बेरहमी से मार डाला गया.’

इस मुद्दे पर बोलते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक अन्य वरिष्ठ नेता हसनैन मसूदी ने विधानसभा में कहा कि कि मुगल के परिवार के पास संवैधानिक अधिकार है कि वे अपने रीति-रिवाजों के अनुसार मारे गए युवक का सम्मानजनक तरीके से अंतिम संस्कार करें.

दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले की पंपोर सीट से विधायक और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मसूदी ने कहा, ‘यह एक संवैधानिक रूप से स्वीकृत अधिकार है. लेकिन आज तक शव परिवार को नहीं लौटाया गया है. उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है. सम्मानजनक अंतिम संस्कार के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हत्याएं एक जगह होती हैं, लेकिन कब्रिस्तान दूसरी जगह होते हैं. यदि उपराज्यपाल ने जांच के आदेश दिए हैं, तो इस परंपरा को भी समाप्त किया जाना चाहिए.’

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शुक्रवार को 31 मार्च और 1 अप्रैल की दरमियानी रात युवक की हत्या की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए. जांच समिति को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं.

हत्या की न्यायिक जांच की मांग करते हुए बांदीपोरा से कांग्रेस विधायक निजामुद्दीन भट्ट ने विधानसभा में कहा कि मजिस्ट्रेट जांच ‘अपर्याप्त’ है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग द्वारा जारी आदेश में जांच की रूपरेखा स्पष्ट नहीं की गई है.

उन्होंने कहा, ‘अगर शुरुआत में ही सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार छीना जा रहा है, तो किस तरह की निष्पक्ष जांच की उम्मीद की जा सकती है? ऐसी परिस्थितियों में, प्रशासनिक जांचों में कमियां रह जाती हैं. न्याय जल्द मिलना चाहिए. यह एक गंभीर मुद्दा है और दिखाता है कि लोगों की जान को कितनी मामूली चीज़ समझा जा रहा है.’

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के विधायक आरएस पठानिया ने इस मुद्दे पर चर्चा का विरोध करते हुए कहा कि यह कानून-व्यवस्था का मामला है, जो जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

मुगल के चाचा गुलाम रसूल ने बताया कि परिवार ने गांदरबल के उपायुक्त जतिन किशोर और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक खालिद पोसवाल सहित वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष अपनी तीन मांगें रखी हैं और न्याय की मांग की है.

उन्होंने कहा, ‘हम जानना चाहते हैं कि उन्हें क्यों मारा गया. वह निर्दोष था. हत्यारों का पर्दाफाश होना चाहिए और उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए; साथ ही, उनका शव हमें लौटाया जाना चाहिए ताकि हम उसे अपने कब्रिस्तान में दफना सकें.’

साल 2020 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव के एक साल बाद से सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ों में मारे गए संदिग्ध आतंकवादियों के शव उनके परिवारों को सौंपना बंद कर दिया. इसके पीछे उन्होंने कोविड-19 से संबंधित चिंताओं का हवाला दिया और वायरस के प्रसार को रोकने के लिए उन्हें उनके घरों से दूर दफनाया जाने लगा.

इससे पहले 2018 के जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अध्ययन और सुरक्षा एजेंसियों का कहना था कि 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद उग्रवादी अपने साथियों के जनाजों का इस्तेमाल नए युवाओं की भर्ती के लिए कर रहे थे.

महामारी समाप्त होने के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने कोविड-19 काल की इस व्यवस्था को स्थानीय उग्रवाद को नियंत्रित करने के लिए आधिकारिक नीति के रूप में अपनाया, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार कश्मीर में स्थानीय आतंकियों की भर्ती में भारी गिरावट आई है.

हालांकि, दफ़नाने की नई नीति ने इन संदिग्ध आतंकवादियों के परिवारों को हमेशा के लिए दुख में डाला है, क्योंकि इस्लामी रिवाजों के अनुसार मृतकों के लिए दुआ करने के लिए इन कब्रिस्तानों तक जाने का नियमित खर्च उनके मानसिक और आर्थिक बोझ को और बढ़ा देता है.

शनिवार को विधानसभा में इस नीति का विरोध करते हुए मसूदी ने कहा, ‘एक नई शुरुआत होनी चाहिए, जहां लोगों के अधिकारों और सम्मानजनक तरीके से दफ़नाने के अधिकार का सम्मान किया जाए.’

इन कब्रिस्तानों में सैकड़ों संदिग्ध स्थानीय आतंकवादी और विदेशी नागरिक दफ़नाए गए हैं; ये कब्रिस्तान उत्तरी और मध्य कश्मीर के कुछ हिस्सों में स्थित हैं, और यहां मारे गए लोगों के सिर्फ़ करीबी परिवार वालों को ही जाने की इजाज़त है.

मुगल के शव को उत्तरी कश्मीर ले जाया गया और ज़चलदारा में ऐसे ही एक कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया. अंतिम संस्कार में उनके भाई एजाज़ अहमद और कुछ करीबी रिश्तेदार शामिल हुए थे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)