देश के पहले और अब तक के एकमात्र वामपंथी कृषि मंत्री स्मृतिशेष चतुरानन मिश्र की आज जयंती है. खेती-किसानी और किसानों के लिए इस बेहद कठिन समय में (जब सालों चले लंबे संघर्ष के बाद 19 नवंबर, 2021 को वापस लिए गए तीन काले कृषि कानूनों को लेकर यह आशंका अभी भी जब तब सिर उठाती ही रहती है कि जानें कब उनको किसी और रास्ते फिर से किसानों पर थोपने की कोशिशें शुरू कर दी जाएं) उनको याद करें तो सबसे पहले वह राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना याद आती है, कृषि मंत्री रहते उन्होंने जिसकी सर्वप्रथम कल्पना कर उसकी रूपरेखा तैयार की, लेकिन जिसका जरा-सा भी श्रेय उनके खाते में नहीं आया.
प्रसंगवश, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना या कि संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (18 फरवरी, 2016 को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जिसका नाम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कर दिया गया) के नए रूप को लेकर आजकल शिकायतें की जाती हैं कि यह किसानों से ज्यादा बीमा कंपनियों के लाभ के लिए होकर रह गई है. क्योंकि जिन प्राकृतिक आपदाओं (सूखा, बाढ़, जलभराव, भूस्खलन, बेमौसम बारिश, और आंधी आदि), कीड़ों व बीमारियों वगैरह के प्रकोप से फसलों के नुकसान की भरपाई के उद्देश्य से इसे लागू किया गया है, उनके प्रकोप के वक्त बीमा कंपनियां कई मामलों में भरपाई के किसानों के दावों को येन केन प्रकारेण नकार देती हैं.
फिर भी यह योजना फसलों की क्षति से पीड़ित किसानों के लिए बड़े सहारे के तौर पर जानी जाती है और मोदी सरकार भी दावा करती है कि उसके द्वारा इसे उन्नत करके लागू करने का एकमात्र उद्देश्य किसानों को कम प्रीमियम पर व्यापक फसल सुरक्षा प्रदान करना है.
दुनिया की इस सबसे बड़ी फसल बीमा योजना को लेकर वह ‘एक राष्ट्र, एक योजना, एक फसल, एक प्रीमियम’ और फसलों की बुआई से लेकर कटाई के बाद तक के जोखिम कवर करने जैसी बातें भी करती है.
किसानों के लिए व्यापक फसल बीमा योजना
लेकिन अफसोस कि इस सिलसिले में चतुरानन मिश्र का नाम प्रायः भुला दिया जाता है. हालांकि उन्होंने ही अपने कृषि मंत्री काल में फसलों पर प्राकृतिक आपदाओं, कीट पतंगों व बीमारियों का कहर झेलने वाले किसानों के लिए व्यापक फसल बीमा योजना की जरूरत समझी और इसकी शुरुआती रूपरेखा तैयार कराई थी.
जानकारों के अनुसार, उनकी बनवाई रूपरेखा ही बाद में इस योजना को लागू करने का मूल आधार बनी. यों, कृषि मंत्री के रूप में उनको लंबा समय नहीं मिला. वे अपनी (भारतीय कम्युनिस्ट) पार्टी द्वारा 1996 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार में शामिल होने के फैसले के बाद 10 जुलाई, 1996 को एचडी देवेगौड़ा की सरकार में कृषि व किसान कल्याण मंत्री बने और उनकी सरकार के पतन के बाद बनी इंद्रकुमार गुजराल सरकार में भी इस पद पर बने रहे.
लेकिन राष्ट्रीय मोर्चा के अनेक अंतर्विरोधों व अंतर्कलहों और नेताओं के अहं के टकरावों के कारण गुजराल सरकार भी लंबी उम्र नहीं पा सकी और 19 मार्च, 1998 को उसकी व साथ ही चतुरानन मिश्र के मंत्रित्व की पारी भी समाप्त हो गई.
जाहिर है कि वे राजनीतिक रूप से बेहद अस्थिर समय में कृषि मंत्री बने थे. लेकिन इसकी परवाह किए बगैर कि वे कब तक मंत्री रहेंगे, उन्होंने छोटे व सीमांत किसानों की हितसाधक नई कृषि नीति लागू करने के लिए उसका मसौदा तो तैयार कराया ही, किसानों के कल्याण, कृषि के आधुनिकीकरण, फसलों के समर्थन मूल्य में वृद्धि और दलहन व तिलहन का उत्पादन बढ़ाने की विशेष परियोजनाओं के संचालन को भी सरकार के एजेंडे पर ले आए.
साथ ही टिकाऊ खेती, कृषि को उद्योग का दर्जा देने और किसानों की आत्महत्याएं रोकने के लिए कर्ज व बीमा सहायता की दिशा में भी कई कदम बढ़ाए.
वृद्धावस्था पेंशन योजना लागू कराने के लिए जद्दोजहद
सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण की योजनाओं के प्रति उनके झुकाव को इससे पहले विपक्षी संसद सदस्य के रूप में उनके द्वारा निभाई गई भूमिकाओं और प्राथमिकताओं में भी देखा जा सकता है. उस वक्त वे वृद्धावस्था पेंशन योजना लागू कराने के लिए जद्दोजहद करते भी देखे गए थे.
यों, वृद्धावस्था पेंशन योजना की सर्वप्रथम कल्पना और राज्यस्तर पर कार्यान्वयन 1960 के दशक के आरंभ में आंध्र प्रदेश के पहले दलित मुख्यमंत्री दामोदरम संजीवैया ने किया था. कहते हैं कि उनके इस कदम के पीछे उनकी मां की प्रेरणा थी. लेकिन इसको राष्ट्रीय स्तर पर लागू कराने में चतुरानन मिश्र के महत्वपूर्ण योगदान की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती.
1969 में पहली बार गिरिडीह सीट से बिहार विधानसभा के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने वहां तो वृद्धापेंशन योजना की शुरुआत का प्रस्ताव रखा ही था, बाद में 84 एवं 90 में दो बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए तो संसद के उस उच्च सदन में भी इस योजना को लागू करने के लिए एक संकल्प पेश किया था.
हालांकि, तत्कालीन सरकार ने उसको नामंजूर कर दिया था, लेकिन इससे वृद्धावस्था पेंशन की बात शुरू हुई तो इतनी दूर जा निकली कि सरकारों द्वारा आगे बहुत दिनों तक उसकी मांग की उपेक्षा संभव नहीं हुई. फिर व्यापक बहस के बाद उस पर आम सहमति बनी और देश भर में वृद्धावस्था पेंशन लागू होने का मार्ग प्रशस्त हुआ.
1995 के स्वतंत्रता दिवस पर देश की कांग्रेस की तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार द्वारा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के रूप में इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया. हालांकि उसे आर्थिक सुधारों और उदारीकरण के लिए ज्यादा जाना जाता है.
प्रसंगवश, गरीबों और जरूरतमंदों के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन सुनिश्चित करने के लिए मजबूती से आवाज बुलंद करने का श्रेय भी चतुरानन मिश्र के ही नाम है. अपने समूचे राजनीतिक जीवन में वे सत्तापक्ष में रहे हों या विपक्ष में, वंचितों और वृद्धों की आर्थिक सुरक्षा की पैरवी करते रहे. उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे सत्ता पक्ष में हैं या विपक्ष में.
बताते हैं कि कृषि मंत्री बनने के बाद उन्होंने मंत्री के रूप में उनको आवंटित सरकारी बंगले में जाने से मना कर दिया था और सांसद होने के कारण मिले नॉर्थ एवेन्यू स्थित अपने पुराने दो कमरों के फ्लैट में रहकर ही काम करते रहे थे. उस समय वे बिहार की मधुबनी सीट से लोकसभा के सदस्य थे. मधुबनी के ही नाहर गांव में सात अप्रैल, 1925 में एक मैथिल ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म भी हुआ था.
मंत्री थे तब भी वे अक्सर सामान्य यात्रियों की तरह यात्राएं किया करते थे. एक बार बिना किसी तामझाम के साधारण यात्री ही की तरह हवाई अड्डे पर पहुंच गए तो सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पहचाना ही नहीं.
उनके सिलसिले में यह तथ्य भी बहुत दिलचस्प है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में वे मजदूर नेता के रूप में जाने जाते थे और ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे. लेकिन कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने किसानों के कल्याण की जिम्मेदारी उठाई. हां, कृषि मजदूरों के कल्याण की भी.
आज़ादी की लड़ाई में अपनी सक्रियता के दौरान वे जेल भेजे गए तो जेल में ही वे वामपंथी विचारधारा के प्रति आकर्षित होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए. एक समय ब्रिटिश सत्ता के कोप के कारण उनको अपना गांव-घर छोड़कर नेपाल में शरण लेनी पड़ी थी. बाद में ब्रिटिश पुलिस की पकड़ में आ गए और दरभंगा जेल भेज दिए गए.
कोयला मजदूरों के शोषण के खिलाफ आंदोलन
आज़ादी के बाद हजारीबाग में उन्होंने कोयला मजदूरों के शोषण के खिलाफ आंदोलन किया तो लोगों से शराब नहीं पीने की अपील की और महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज बुलंद की. बताते हैं कि वे शराबबंदी के प्रबल समर्थक हुआ करते थे, क्योंकि उन्होंने अनेक परिवारों को शराब के कारण उजड़ते हुए देखा था.
उनकी पार्टी ने बिहार के गिरिडीह अंचल को उनकी कर्मभूमि बनाया तो वे वहां तीन दशकों तक कोयला मजदूरों और किसानों को गोलबंद करते रहे. उनका कहना था कि अपने जीवन मे उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया, वह गिरिडीह के संघर्षों के बल पर ही किया. इन संघर्षों के बल पर ही वे वहां से वे तीन बार विधायक चुने गए और ‘बिहार के लेनिन’ कहलाए.
कृषि मंत्री रहते हुए उन्होंने और अपनी पार्टी के गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लोकपाल विधेयक पारित कराने की कोशिश की थी, लेकिन विफल रहे थे. मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर मचे शोर के दौरान उन्होंने उनका ऐसा मुखर समर्थन किया था कि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव उनके फैन हो गए थे.
इसका फल यह हुआ था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चारा घोटाले को लेकर लालू के विरुद्ध तमाम प्रदर्शनों के बावजूद 1996 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मधुबनी में उसके प्रत्याशी चतुरानन मिश्र का समर्थन किया था.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
