बंगाल: चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधिकरणों के लिए 15 अप्रैल की समयसीमा देने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राज्य के अपीलीय न्यायाधिकरणों को मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की अपीलों पर फैसला करने के लिए कोई समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया. वहीं, कोर्ट ने मालदा में पिछले सप्ताह हुई उस घटना की जांच भी एनआईए को सौंपने का आदेश दिया है, जिसमें ‘विचाराधीन’ मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों के साथ कथित तौर पर हिंसा हुई थी.

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया. (फोटो: पिनाकपानी/विकिमीडिया कॉमन्स. CC BY-SA 4.0.)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को राज्य के अपीलीय न्यायाधिकरणों को मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की अपीलों पर फैसला करने के लिए कोई समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया.

ज्ञात हो कि 6 अप्रैल पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले चरण के लिए मतदाता पंजीकरण की अंतिम तिथि थी. 

एक अन्य घटनाक्रम में, शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव और कथित हमले की जांच राज्य पुलिस से अपने हाथ में लेने का निर्देश भी दिया. ये अधिकारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद ‘विचाराधीन’ मामलों की सुनवाई कर रहे थे. अदालत ने यह भी कहा कि यह निर्देश तब भी लागू होगा, भले ही एनआईए अधिनियम के तहत सूचीबद्ध अपराध सीधे तौर पर लागू न होते हों.

पश्चिम बंगाल में मतदान 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों को होने हैं. इन चरणों के लिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने की अंतिम तिथि क्रमशः 6 और 9 अप्रैल है.

समयसीमा तय करने से इनकार

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि गठित 19 न्यायाधिकरणों को 15 अप्रैल तक अपीलों का निपटारा कर देना चाहिए और जिन अपीलों में राहत मिलेगी, उनके नाम 18 अप्रैल को एक पूरक सूची में प्रकाशित किए जा सकते हैं, जो 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के मतदान से पांच दिन पहले होगा.

उन्होंने कहा, ‘अपीलें न्यायिक प्रक्रिया का ही विस्तार हैं और किसी भी मतदाता को मताधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.’ उनका तर्क था कि यदि सोमवार को ही मतदाता सूची को स्थिर कर दिया गया, तो लाखों लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएंगे और अपीलीय प्रक्रिया का महत्व खत्म हो जाएगा.

हालांकि, सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने इस समयसीमा को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

जस्टिस बागची ने कहा, ‘हर व्यक्ति चाहता है कि उसके मामले का जल्द से जल्द निपटारा हो जाए. लेकिन 19 न्यायाधिकरणों का 15 अप्रैल तक काम पूरा करने की होड़ केवल अव्यवस्था पैदा करेगी.’

प्रक्रिया तय करने के निर्देश

अदालत ने अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया तय करने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया कि वे तीन सदस्यीय समिति गठित करें, जिसमें पूर्व वरिष्ठतम चीफ जस्टिस या जज शामिल हों. यह समिति सभी 19 न्यायाधिकरणों के लिए एक समान प्रक्रिया निर्धारित करेगी.

साथ ही, अदालत ने कहा कि ‘विचाराधीन’ मामलों पर काम कर रहे न्यायिक अधिकारी दिन के अंत तक सभी मामलों का निपटारा कर देंगे. दोपहर तक लगभग 59.15 लाख मामलों पर निर्णय हो चुका था.

श्याम दीवान ने बताया कि करीब 40 लाख मामलों में से, जिन पर निर्णय हो चुका है, लगभग 55% नाम मतदाता सूची में जोड़े गए, जबकि लगभग 20 लाख नाम बाहर रह गए. उन्होंने कहा, ‘करीब सात लाख लोग पहले ही अपील दायर कर चुके हैं और कई लाख अपीलें दायर होने की प्रक्रिया में हैं.’

यही वे लोग हैं, जिनके नाम न तो एसआईआर के बाद प्रकाशित ‘अंतिम’ मतदाता सूची में शामिल हुए, और न ही ‘विचाराधीन’ प्रक्रिया के दौरान बनी पूरक सूचियों में.

उन्होंने यह भी बताया कि न्यायाधिकरण अभी पूरी तरह कार्यशील नहीं हैं, जिस पर अदालत ने उन्हें तुरंत पूरी तरह कार्यशील बनाने का निर्देश दिया.

मालदा घटना की जांच एनआईए को

इस बीच, पीठ ने मालदा में पिछले सप्ताह हुई उस घटना की जांच भी एनआईए को सौंपने का आदेश दिया है, जिसमें ‘विचाराधीन’ मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों का घेराव किया गया था और उनके साथ कथित तौर पे हिंसा हुई थी.

लाइव लॉ के अनुसार, अदालत ने कहा, ‘राज्य/स्थानीय पुलिस के सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं. अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए हम निर्देश देते हैं कि इन एफआईआर की जांच एनआईए को सौंपी जाए, चाहे इनमें दर्ज अपराध एनआईए अधिनियम के अंतर्गत आते हों या नहीं.’

गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के बीच मालदा की घटना को लेकर राज्य प्रशासन को फटकार भी लगाई थी.