क़रीब 89 लाख नाम हटाए गए: बंगाल एसआईआर के आंकड़ों से जुड़े पांच बड़े निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल में पुनरीक्षण प्रक्रिया की शुरुआत के मुकाबले मतदाता सूची में करीब 89 लाख मतदाता कम हो गए हैं. सबसे अधिक नाम राज्य के सबसे बड़े मुस्लिम बहुल ज़िले मुर्शिदाबाद में हटाए गए. यहां 4.55 लाख मतदाताओं को अपात्र घोषित किया गया है.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद, अपने मामले पेश करने के लिए लोग न्यायिक अधिकारियों के सामने कतार में खड़े हैं. यह तस्वीर 7 अप्रैल 2026 की नदिया जिले के कृष्णनगर की है. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: 6 अप्रैल की आधी रात को चुनाव आयोग द्वारा 12वीं और अंतिम पूरक मतदाता सूची जारी किए जाने के साथ ही पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया का औपचारिक रूप से समापन हो गया. 

इस महीने के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अब मतदाता सूची स्थिर (फ्रीज़) कर दी गई है. पुनरीक्षण प्रक्रिया की शुरुआत के मुकाबले मतदाता सूची में करीब 89 लाख मतदाता कम हो गए हैं.

आयोग द्वारा जारी अंतिम जिला-वार सूची, जिसमें जांच के दायरे में रखे गए मतदाताओं का विवरण है, विवाद को खत्म नहीं करती, बल्कि इस अभूतपूर्व कमी के पीछे के कठोर आंकड़ों को सामने लाती है. पहली बार सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट हुआ है कि न्यायिक समीक्षा के बाद कितने मतदाताओं को बहाल किया गया और कितनों को सीधे तौर पर बाहर कर दिया गया.

सिर्फ अडजुडिकेशन (जांच) के आंकड़े ही बेहद अधिक हैं, 60 लाख से अधिक मतदाताओं की जांच की गई, जिनमें से लगभग 32.68 लाख को पात्र पाया गया, जबकि 27.16 लाख को अपात्र घोषित किया गया. कुल मिलाकर, पुनरीक्षण से पहले की तुलना में मतदाता संख्या में 11.61% की कमी आई है.

चुनाव की ओर बढ़ते राज्य में अंतिम सूची का विश्लेषण प्रशासनिक स्तर पर मताधिकार से वंचित किए जाने की चिंताजनक तस्वीर पेश करता है. नीचे आंकड़ों से निकलने वाले पांच प्रमुख निष्कर्ष दिए गए हैं:

  1. बहिष्करण का पैमाना

अंतिम आंकड़े बताते हैं कि यह केवल पुराने नामों को हटाने या सामान्य शुद्धिकरण की प्रक्रिया नहीं थी. 60 लाख से अधिक मतदाताओं को अडजुडिकेशन की तेज़ प्रक्रिया से गुजारा गया, जिसके परिणामस्वरूप 27 लाख से अधिक नागरिकों को सीधे तौर पर अपात्र घोषित कर दिया गया.

एसआईआर से पहले की स्थिति और अंतिम सूची के बीच करीब 89 लाख नाम कम हो गए. यह हाल के समय की सबसे व्यापक और प्रभावशाली चुनावी छंटनी प्रक्रियाओं में से एक है. चिंता का विषय केवल यह आंकड़े नहीं है, बल्कि पारदर्शिता का समय भी है. जिला-स्तरीय आंकड़े तब सामने आए जब प्रक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी थी. जब तक यह डेटा सार्वजनिक किया गया, तब तक मतदाता सूची फ्रीज़ हो चुकी थी और उसके चुनावी असर तय हो चुके थे.

  1. जांच के दौरान भारी कटौती, नादिया में 78% हटाए गए

राज्य स्तर पर अडजुडिकेशन यानी जांच के दौरान औसतन 45.22% नाम हटाए गए (60,06,675 में से 27,16,393). लेकिन जिला-वार आंकड़े इससे भी अधिक कठोर स्थिति दिखाते हैं. कुछ जिलों में जांच के दायरे में आना लगभग मताधिकार से वंचित होने की पक्की वजह बन गया. 

नादिया जिले में जांच के दौरान 77.86% नाम हटा दिए गए. 2,67,940 में से 2,08,626 मतदाता अपात्र घोषित किए गए. 

​​हुगली भी ज्यादा पीछे नहीं रहा, जहां 70.33% (1,71,778 में से 1,20,813) नाम हटाए गए.

कोलकाता उत्तर में 63.96% मतदाताओं को सूची से हटा दिया गया, जबकि पूर्व बर्धमान और उत्तर 24 परगना में क्रमशः 57.40% (2,09,805) और 55.08% (3,25,666) नाम हटाए गए.

  1. मुस्लिम और मतुआ बहुल क्षेत्रों पर अधिक असर

आंकड़ों का भौगोलिक विश्लेषण स्पष्ट करता है कि यह प्रक्रिया कुछ खास समुदायों और सीमावर्ती जिलों को अधिक प्रभावित करती है.

सबसे अधिक नाम मुर्शिदाबाद में हटाए गए. यह राज्य का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल जिला है, यहां 4.55 लाख मतदाताओं को अपात्र घोषित किया गया. यह पैटर्न अल्पसंख्यक बहुल सीमावर्ती जिलों में भी जारी रहा. मालदा से 3.25 लाख नाम, दक्षिण 24 परगना से 2.22 लाख, नादिया से 2.08 लाख और उत्तर दिनाजपुर से 1.76 लाख नाम काटे गए.

कुल मतदाता सूची में कमी देखें तो मुर्शिदाबाद से 7.44 लाख, मालदा से 4.53 लाख और उत्तर दिनाजपुर से 3.63 लाख मतदाता कम हो गए.

मतुआ समुदाय के प्रमुख क्षेत्रों- उत्तर 24 परगना और नादिया पर भी भारी असर पड़ा. उत्तर 24 परगना में 12.38 लाख और नादिया में 4.82 लाख नाम सूची से हटाए गए. ज्ञात हो कि मतुआ समुदाय ऐतिहासिक रूप से नागरिकता और दस्तावेज़ी विवादों के प्रति संवेदनशील रहे हैं.

  1. शहरी और प्रवासी मजदूर वर्ग पर असर

ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में संख्या अधिक थी, लेकिन प्रतिशत के आधार पर शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी कटौती हुई.

इससे पता चलता है कि ईसीआई की मैपिंग प्रक्रिया ने शहरी किरायेदारों, दूसरे राज्यों से आए प्रवासी मजदूरों और रोज़गार के लिए बार-बार जगह बदलने वाले दिहाड़ी मजदूरों जैसी अस्थायी आबादी को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया.

कोलकाता उत्तर में 28.97% (4.36 लाख) मतदाता कम हुए, जबकि कोलकाता दक्षिण में 27.31% (2.47 लाख) की कमी आई.

औद्योगिक क्षेत्र पश्चिम बर्धमान में 16.44% (3.82 लाख) और हावड़ा में 14.33% (5.93 लाख) मतदाता सूची से हटाए गए. 

  1. चुनावी चरणों में असमान प्रभाव

इन कटौतियों का केंद्रीकरण जनसांख्यिकीय भी है और स्पष्ट रूप से चुनावी भी.

23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के 15 जिलों की 152 सीटों में कुल 39.57 लाख नाम हटाए गए. इनमें मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और पश्चिम बर्धमान प्रमुख हैं.

दूसरे चरण (29 अप्रैल) के आठ जिलों- हावड़ा, हुगली, कोलकाता उत्तर, कोलकाता दक्षिण, नादिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और पूर्व बर्धमान में 49.38 लाख नाम हटाए गए, जो कुल कमी का 55.5% है, जबकि ये जिले राज्य की 294 सीटों में से 142 सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

प्रशासनिक वास्तविकता

अंतिम सूची से यह भी स्पष्ट होता है कि केवल अडजुडिकेशन ही मतदाता कमी की पूरी वजह नहीं है. निर्वाचन आयोग ने अभी तक विधानसभा स्तर का डेटा भी जारी नहीं किया है.

जिला-स्तर के आंकड़े बताते हैं कि असली वजह शुरुआती ‘अनमैपिंग’ थी, यानी जिन मतदाताओं का 2002 की सूची से जुड़ाव नहीं मिला, उनके नाम ज्यादा हटे. आसान शब्दों में, जिन जिलों में शुरुआत में अनमैपिंग ज्यादा थी, वहां अंत में भी सबसे ज्यादा नाम कटे.

आधिकारिक तौर पर चुनाव आयोग का कहना है कि हर नाम की जांच की गई और अपात्र घोषित 27 लाख नागरिक पुनर्विचार के लिए न्यायाधिकरणों का रुख कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत यह बात औपचारिक रूप से सही भी है. लेकिन अदालत ने इन मतदाताओं को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है.

राज्य सरकार की तत्काल हस्तक्षेप की मांग के बावजूद अदालत ने कहा, ‘हम इसे जल्दबाज़ी में नहीं करना चाहते,’ और अनुमान जताया कि 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों को मामलों के निपटारे में 60 दिन तक लग सकते हैं.

फिलहाल, ये सभी 19 न्यायाधिकरण पूरी तरह से काम नहीं कर रहे हैं. उन्होंने अभी तक किसी आम नागरिक की अपील पर सुनवाई शुरू नहीं की है और केवल उम्मीदवारों से जुड़े दो तात्कालिक मामलों पर ध्यान दिया है.

पहले चरण की 152 सीटों के लिए 6 अप्रैल की समयसीमा खत्म हो चुकी है और दूसरे चरण की समयसीमा 9 अप्रैल को समाप्त हो रही है. ऐसे में इस चुनाव के लिए अपील का अधिकार व्यावहारिक रूप से बेअसर हो गया है.

चुनाव आयोग ने अर्थपूर्ण चुनावी पहुंच के बजाय ‘साफ’ मतदाता सूची को प्राथमिकता दी, और इसे शीर्ष अदालत की मंजूरी भी मिली. इसके चलते ऐसी स्थिति बनी है, जहां प्रशासनिक देरी ने ही अंतिम कानूनी बहिष्कार जैसा असर पैदा कर दिया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)