कई किताबें ऐसी होती हैं जो पढ़ने की प्रक्रिया के दौरान हमसे कोई संवाद नहीं करतीं, पर उसके अर्थ हमारे अवचेतन को कुछ समय बाद जाकर परेशान करते हैं. प्रश्न उठाते हैं, पुनर्विचार की मांग करते हैं. साल 2025 में आए उपन्यास ‘फ्लेश’ को पढ़ने के बाद पहला विचार जो मन में आया वह यह कि ऐसी किताब को बुकर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से क्यों सम्मानित किया गया है?
हम जानते हैं कि पुरस्कारों की अपनी राजनीति, अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है जिसमें लेखक, प्रकाशक, बाजार, पाठक यह सब अपनी नियत भूमिका निभा रहे होते हैं. पर रचना पुरस्कारों की मोहताज़ नहीं होती. किसी युग में उसकी श्रेष्टता का मयार पुरस्कार नहीं रहे हैं बल्कि उसकी वह संवेदनशीलता रही है जो पाठकों को अपनी दुनिया में खींच लाने में सक्षम होती है. हां, आज के आधुनिक समय में जहां बाज़ार ने लेखन को भी एक उत्पाद के रूप में सीमित करने की कवायद की हुई है, तो इन पुरस्कारों से यह अवश्य होता है कि कोई रचना जो संभवतः स्वयं पाठकों तक पहुंचने में कुछ समय और लगाती, वह जल्दी और अधिक प्रभावशाली ढंग से पहुंच जाती है.
पर सोचने वाली बात यह भी है कि किसी रचना को अगर कोई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार दिया गया है तो उसके पीछे क्या कारण रहे हैं. पिछले कुछ सालों में बुकर कमेटी ने प्रायः अपने निर्णयों में उस साहित्यिक रचना के लिए उत्साह दिखलाया है, जो एक समानांतर दुनिया की रचना करते हैं- एक ऐसी वास्तविकता जो समकालीन जीवन के किसी-न-किसी अंग, किसी विचार से जाकर जुड़ती है.
साल 2025 के बुकर पुरस्कार से सम्मानित उपन्यास ‘फ्लेश’ ने साहित्यिक परिदृश्य में बड़ी शांति से एक वैचारिक बहस का सूत्रपात किया है- पुरुषों के अनुभवों को साहित्य के केंद्र में लाने की ‘वैध’ आवश्यकता का. और इस असाधारण विषयवस्तु के लिए ही इस उपन्यास को बुकर दिया गया है. हमारी जड़ता को फ्लेश उतनी ही चुप्पी से तोड़ती है जिस शांति से यह किताब बुकर के अन्य दावेदारों से आगे निकल गई थी.
आधुनिक पुरुष की कहानी
डेविड सॉल्लॉय की फ्लेश को पढ़ते वक़्त कई सारे सवाल हमारे मन में आते हैं. सवाल विषयवस्तु की प्रासंगिकता का और उसके उद्देश्य या उपादेयता का. नितांत पुरुषवादी दृष्टि से साहित्य की रचना कोई अनोखी बात नहीं है. संस्कृति और कलाओं की विकास यात्रा में ऐसी कई धाराएं हुई हैं जहां कला की अभिव्यक्ति विशुद्ध पुरुष दृष्टि से हुई है.
अर्नेस्ट हेमिंग्वे, मार्क ट्वेन से लेकर चार्ल्स बुकोवोस्की और हारूकी मुराकामी ने साहित्य में पुरुष जीवन को अपनी दृष्टि से विश्लेषित किया है. फ्लेश को हम उसी परंपरा की अगली कड़ी जैसे सामान्यीकरण में न भी ढालें तब भी यह कहा जा सकता है कि इसने वस्तुतः एक साहित्यिक बहस की शुरुआत की है जो पुरुषों के अनुभवों को वरीयता नहीं बल्कि दृश्यता देने की मांग करती है.
एक आधुनिक पुरुष किस प्रकार अपने जीवन को जी रहा है, उसके संदर्भों और अनुभवों ने किस प्रकार उसे गढ़ा है और किस तरह वह अपने परिवेश और स्वयं अपने निर्णयों के दबावों को झेलता हुआ आगे बढ़ता है, फ्लेश हमें उसी की कहानी कहता है. यह उपन्यास पुरुष मन के भीतर पैठ कर पुरुष के निर्णयों और उसके विचारों का एक अनोखा विश्लेषण है.
हंगेरियन-कनाडाई मूल के लेखक सॉल्लॉय ने अब तक छह उपन्यास लिखे हैं और 20 से भी अधिक भाषाओं में उनके अनुवाद हो चुके हैं. फ्लेश से पहले भी उनकी एक और कृति ‘ऑल दैट मैन इज़’ (कहानी संग्रह) को वर्ष 2016 के बुकर के लिए नामांकित किया गया था.
फ्लेश के बुकर जीतने के अवसर पर दिए अपने अभिभाषण में सॉल्लॉय ने अपनी रचना के शीर्षक पर बात करते हुए यह कहा था कि कैसे आज के संदर्भों में ‘फ्लेश’ शीर्षक रखना वस्तुतः एक कलात्मक ज़ोखिम था. इस तरह के नाम से पुस्तक के एक विशिष्ट श्रेणी में सीमित कर दिए जाने का ख़तरा था. ऐसे शीर्षक से यह ध्वन्यायार्थ आने की संभावना होती कि इसमें सिवा दैहिक क्रियाओं के कोई और चीज़ नहीं होगी.
पर अंततः लेखक और प्रकाशक दोनों ने ही यह ज़ोखिम उठाया क्योंकि बक़ौल सॉल्लॉय गल्प-साहित्य विशेषकर उपन्यास विधा ही तमाम कलात्मक, औपचारिक या नैतिक ख़तरे उठा सकती है और इसीलिए भी यह विधा अन्य सभी विधाओं में सबसे अधिक जीवंत है.
बहरहाल, फ्लेश की केंद्रीय अवधारणा एक पुरुष होने के अनुभवों को ध्वनि देना है. एक पुरुष इस दुनिया में अपने अस्तित्व को, संबंधों को, अपने कामों को किस प्रकार से देखता और जीता है और कैसे इन सब अनुभूतियों को वह सबसे पहले देह के माध्यम से ग्रहण करता है, इसे फ्लेश समकालीन संदर्भों में देखती है.
और देह को वरीयता देने का कारण जैसा कि सॉल्लॉय कहते हैं यह है कि व्यक्ति अपने भीतर की संवेदनाओं और अपने बाह्य संसार को सबसे मूलभूत रूप में एक देह के माध्यम से ही प्राप्त करता है और उसका संश्लेषण करता है. ऊपरी स्तर पर देखा जाए तो उपन्यास एक व्यक्ति के एक किशोर से पूर्ण रूप से वयस्क बनने की कथा के रूप में लिखा गया है.
शून्य से शून्य तक की यात्रा
एक ऐसे व्यक्ति इस्तवान की कहानी जो ख़ुद को लेकर, अपनी इच्छाओं को लेकर एकदम ही आवेगरहित निष्क्रियता से संचालित है. पाठकों का परिचय सबसे पहले-पहल 15 वर्षीय इस्तवान से होता है. अपनी कामकाजी मां के साथ हंगरी के एक सर्वहारा बस्ती में बीत रहा उसका जीवन किसी भी दृष्टि से उलेखनीय नहीं है. पर फ्लेश का एक बारीक पाठ हमें उसकी कथा को वर्ग-गतिशीलता की एक यात्रा के रूप में भी समझने की दृष्टि देता है.
हंगरी के जिस निम्न वर्गीय सर्वहारा पृष्ठभूमि से इस्तवान आता है वहां संसाधनों की कमी और वर्ग के अंतर को एक मौन स्वीकृति मिली हुई है. उसके प्रति इस्तवान में हम कोई विशेष विक्षोभ भी नहीं देखते हैं और न ही उसकी महत्त्वाकांक्षा को ही स्पष्ट रूप से लेखक ने दिखलाया है. पर यह जीवन के उत्तरोतर अनुभवों और अवसरों के ही कारण होता है कि वह हंगरी के उस परिवेश से निकलकर लंदन के पूंजीपति वर्ग में शामिल होने तक का सफ़र तय करता है.
पर फ्लेश इस्तवान के जीवन के उठान मात्र की कहानी नहीं है, बल्कि उसके ढलते भाग्य और जीवन की भी कथा है. और संभवतः इसीलिए भी वह अपना गहरा असर छोड़ती है कि महज परिस्थितियों के बदल जाने से हम इस्त्वान के जीवन को फिर से उसी शून्य में वापस से घूमकर आता हुआ देखते हैं, जिस शून्य से उसने कभी अपनी यात्रा शुरू की थी. ताश के पत्तों की तरह कैसे एक व्यक्ति का जीवन भी ढहकर गिर सकता है इस्तवान का जीवन इसका अप्रतिम उदाहरण है.
पर यह इस कहानी की लेखन शैली है या लेखक के पुरुष जीवन को इस अलगाव के साथ देख पाने की ईमानदार कथावस्तु कि न तो इस्तवान अपने उत्कर्ष पर इतना खुश दिखता है और न ही अपनी अवनति पर ही इतना विक्षुब्ध.
डेविड सॉल्लॉय अपनी कहानी के माध्यम से शायद यह कहना चाहते हैं कि प्रायः जीवन इतना सुपरिभाषित-योजनाबद्ध तारतम्यता से नहीं चलता. अधिकांश बस जैसे-जैसे वह हमारे सामने आती है वैसे-वैसे उसे जीते जाने के लिए अभिशप्त होते हैं और इस तरह कितनी बार यह होता कि जो हम सोचकर चले थे उसके बदले हमें कुछ और मिलता है और जो शायद उतना बुरा भी प्रायः नहीं होता, पर फिर भी यह मानवीय व्यक्तित्व की विचित्रता है कि वह एक साथ संतुष्टि और असंतुष्टि के भावों के बीच गोते लगाता रहता है.
इस्तवान के निर्णयों, उसके अनुभवों और उस अनुभव को किस भाषा में वह अपने आप के साथ समंजित करता है, इसके बीच इतना बड़ा अलगाव है जो हमें इस्तवान को समझने की एक दृष्टि देता है.
‘मिनिमलिस्ट’ लेखन
सॉल्लॉय की लेखन कला की एक विलक्षणता यह है कि वह कम-से-कम शब्दों में कथा को रचते हैं. और यह ‘मिनिमलिस्ट’ लेखन कहीं से भी उनके कथ्य का अभिप्रेत पाठकों तक पहुंचा पाने में असफल नहीं होता. सॉल्लॉय उपन्यास जैसी विधा जो एक लंबा वितान देती है, उसमें भी अपनी मुख्य कथा के अतिरिक्त कुछ और नहीं कहते हैं. वह कोई पूर्वपीठिका या अपने पाठ का कोई स्पष्टीकरण साथ में देते हुए नहीं चलते.
इस्तवान के केवल होने की या उसके चरित्र की विचित्रताओं की कोई पार्श्वकथा लेखक हमें नहीं बतलाते. वह बस उसके द्वारा जिए गए जीवन स्थितियों का चित्रण भर कर देते हैं. उन स्थितियों ने उसके मानस पर कैसा प्रभाव डाला, उसके अंतकरण में किस तरह की संवेदनाएं उत्पन्न कीं, इसकी कोई झलक पाठकों को ही नहीं, बल्कि उसके आस-पास के लोगों को भी नहीं मिलती.
एक किशोर के रूप में इस्तवान की जीवन यात्रा के अनुक्रम को हम एक वयस्क पुरुष में उसकी परिणति तक देखते हैं पर इसके बावजूद हम उपन्यास को इस्तवान की जीवनी नहीं मान सकते, क्योंकि उसके जीवन के अनेकानेक पहलुओं को सॉल्लॉय खुला छोड़ देते हैं और इस प्रकार सॉल्लॉय पाठक को अपनी अनुभूति और प्रज्ञा से कहानी के रिक्त स्थानों को समझे जाने का भी एक स्पेस देते हैं.
फ्लेश एक साधारण सी कथा के बावजूद कुछ अधिक सार्थक बिंदुओं पर विचार करने के लिए छोड़ देता है. नायक इस्तवान के जीवन की रूप-रेखा हमें सॉल्लॉय के पुरुषत्व संबंधी दृष्टिकोण से परिचित करवाती है जो यह प्रस्ताव देती है कि कैसे पुरुषत्व की समाज-सम्मत, सभ्यता संपोषित परिभाषा से इतर पुरुषत्व का एक रूप वह भी है जहां वह व्यक्ति में एक निष्क्रिय उदासीनता भर सकता है. पर इस्तवान की अपने स्वयं के जीवन को लेकर जो यह एक विशिष्ट किस्म की निष्क्रियता या अलगाव है उससे हमें यह नहीं समझना चाहिए कि वह कहीं से भी अपने जीवन को एक मृत संवेदना और एक निष्क्रिय देह से जी रहा है. उसके लिए जीवन उसके शरीर से होकर गुजरने वाली अनुभूति है जिसे वह बिना किसी अतिरिक्त उत्तेजना के साथ जी रहा है.
लेखक ने उसे एक ऐसे साधारण से पुरुष के रूप में निर्मित किया है जो अपनी इच्छाओं और अनुभूतियों के प्रति बिना किसी शर्म या किसी सामाजिक नैतिकता की बंदिशों के विशुद्ध आदिम रूप में ईमानदार है. उसके किए गए कार्यों के प्रति या उसके लिए गए निर्णयों के प्रति बतौर पाठक हम कई प्रश्न उठा सकते हैं, पर वह किसी भी प्रकार के उत्तर के लिए जवाबदेह नहीं है.
पर देखा जाए तो, सॉल्लॉय द्वारा एक पुरुष का इस तरह किए गए चित्रण के अपने अंतर्निहित ख़तरे भी हैं. वह यह कि जिस तरह से इस्तवान अपने हर संबंध में या अपने जीवन को ही लेकर किसी वृहत पूर्व निर्धारित योजना के साथ नहीं चल रहा होता है, वह पुरुषों की जीवनदृष्टि का एक सरल सामान्यीकरण करने की गुंजाइश छोड़ देता है.
और किसी भी सर्जनात्मक प्रस्तुति की तरह फ्लेश के साथ एक सार्वभौमिक प्रश्न लगा ही रहता है कि लेखक के द्वारा किया गया चित्रण एक व्यक्ति विशेष की कथा है या उसे उसकी संपूर्ण जाति के अनुभवों के लिए सामान्यीकृत किया जा सकता है.
विशुद्ध पुरुष अनुभवों की कहानी
फ्लेश एक निश्चित जगह की कहानी हो कर भी हमें एक सार्वभौमिक कहानी लगती है और ऐसा इसीलिए है क्योंकि लेखक ने कहीं भी स्थान विशेष की विशिष्टताओं को कहानी या कथा नायक के जीवन को प्रभावित करने का अवसर नहीं दिया है. यह एक ऐसे सार्वभौमिक पुरुष की कहानी बनने की क्षमता रखता है जो किसी भी देश और काल से परे है. विशुद्ध पुरुष अनुभवों की कहानी, जिसमें एक रूढ़ सांस्कृतिक और स्थानीय पृष्ठभूमि की आवश्यकता नहीं है. उपन्यासकार का उद्देश्य ही यह दिखलाने का रहा है कि कि कैसे आज के समय में एक पुरुष होने की अपनी चुनौतियां हैं.
फ्लेश विचार का एक और सिरा हमें थमाती है. वह यह कि आज के समय में जब विकृत/विषाक्त मर्दानगी (toxic masculinity) की अवधारणा पर प्रायः कला और संस्कृति के हर क्षेत्र में प्रश्न उठाया जा रहा है, तो फ्लेश में इस्तवान के माध्यम से एक ऐसा चरित्र गढ़ना जो समस्या से रहित नहीं है, कहीं उस अवधारणा को वैधता देने का प्रस्ताव तो नहीं.
पर यहीं पर सॉल्लॉय हमें हतप्रभ करते हैं. इस्तवान स्त्रियों के साथ अपने संबंधों में कहीं भी उनके साथ आक्रामक या उन्हें सीमित करने की मानसिकता से ग्रसित नहीं है. इसके विपरीत अपने सभी संबंधों में ऐसा लगता है लेखक उसे कोई एजेंसी नहीं देना चाहते. वह स्थितियों और व्यक्तियों के अधीन नज़र आता है.
मसलन यह थोड़ा समस्यापूर्ण लगता है कि कैसे हर बार, यह स्त्रियां हैं जो उसके साथ संबंध बनाने के लिए इच्छुक लगती हैं और इसका कारण इस्तवान की एक खास दैहिक अपील है जो एक उपन्यास के ही एक पात्र थॉमस के शब्दों में कहा जाए तो ‘a primitive form of masculinity’ हो सकती है. यह अवश्य है कि इस्तवान अपने इसी दैहिक शक्ति या यौन आकर्षण से जीवन में आगे बढ़ता है पर यह लेखक की कथावस्तु की शक्ति है जो इसे समस्या के रूप में नहीं चित्रित करती.
इस्तवान का एक ऐसे पात्र के रूप में चित्रण जो पुरुष शरीर की अपनी मूलभूत दैहिक आवश्यकताओं के प्रति कहीं भी शर्मसार नज़र नहीं आता, एक बेहद निजी और वास्तविक चित्रण है. एक पुरुष हो कर अपनी दैहिक वासना की अभिव्यक्ति सॉल्लॉय के संसार में एक साधारण सत्य है जो अंततः हमारे पितृसत्तात्मक समाजों की लैंगिक असमानता को और मुखरित (pronounced) करती है. क्योंकि एक स्त्री को अपनी वासनाओं या इच्छाओं को यूं अभिव्यक्त करने की कितनी स्वतंत्रता समाज और संस्कृति देती है, इस पर अलग ही बहस हो सकती है.
बहरहाल, फ्लेश की कथावस्तु से मेरी अपनी असहजताएं हैं. पर यह रचना अपने पाठकीय पूर्वाग्रह से बाहर निकलकर रचना के मूल्यांकन के लिए बाध्य करती है. और यही वजह है कि फ्लेश जैसे विशुद्ध पुरुष दृष्टि से देखे गए जीवन की कहानी को भी पढ़ने की ज़रूरत है. एक समानांतर दुनिया को रचने-जानने की जिज्ञासा ही तो साहित्य सृजन का कारण है.
