नॉर्थईस्ट डायरीः असम में कथित तौर पर बिस्कुट फैक्ट्री से निकले ज़हरीले कचरे से 12 मवेशियों की मौत

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय के प्रमुख समाचार.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: असम की एक बिस्कुट फैक्ट्री कथित रूप से जहरीला कचरा फैलाने के कारण बड़े पर्यावरणीय विवाद और कानूनी परेशानी में घिर गई है, क्योंकि इस कचरे को खाने से कम से कम 12 मवेशियों की मौत हो गई.

स्थानीय खबरों के अनुसार, गोलाघाट जिले में तनाव का माहौल है, जहां देरगांव के अंतर्गत रंगोलिटिंग इलाके में यह घटना सामने आई. बताया जा रहा है कि पास की एक बिस्कुट फैक्ट्री से निकले जहरीले कचरे को खाने के कारण ये मवेशी मारे गए.

इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है और उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं. ग्रामीण अपने नुकसान के लिए उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं.

ग्रामीणों ने फैक्ट्री प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया है और चेतावनी दी है कि यदि तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो वे और कड़ा आंदोलन करेंगे. लोगों ने यह भी कहा है कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो फैक्ट्री को बंद करने तक की कार्रवाई की जाएगी.

तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व व्यक्तिगत या पारंपरिक कानून से समाप्त नहीं होता:  गौहाटी हाईकोर्ट

एक महत्वपूर्ण फैसले में गौहाटी हाईकोर्ट की कोहिमा पीठ ने पारंपरिक न्याय और क़ानूनी उपायों की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत महिला का भरण-पोषण पाने का अधिकार, किसी भी पारंपरिक समझौते या तलाक के आदेश के बावजूद लागू रहता है.

बीते 6 अप्रैल को जस्टिस यारेनजुंगला लोंगकुमेर ने दीमापुर की फैमिली कोर्ट के 27 फरवरी, 2024 के एक आदेश को रद्द कर दिया. उस आदेश में भरण-पोषण की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि यह मामला पहले ही एक ‘गांव बुरा’ (जीबी) की पारंपरिक अदालत (कस्टमरी कोर्ट) द्वारा सुलझा लिया गया था.

यह मामला अक्टूबर 2015 में शुरू हुए एक लिव-इन संबंध से जुड़ा है, जिसे 16 जनवरी 2016 को परिवार और रिश्तेदारों की उपस्थिति में औपचारिक रूप से विवाह में बदल दिया गया था. याचिकाकर्ता (पत्नी) के अनुसार, शादी के बाद रिश्ता जल्द ही हिंसक हो गया और उसे शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न के साथ ‘अपमानजनक और अमानवीय व्यवहार’ का सामना करना पड़ा.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

15 अगस्त 2018 को प्रतिवादी (पति) ने किफिरे स्थित जीबी पारंपरिक अदालत के समक्ष तलाक की कार्यवाही शुरू की. कुछ ही दिनों बाद 20 अगस्त को याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट की गई और उसे घर से जबरन निकाल दिया गया.

इसके बाद उसने दीमापुर के महिला थाने का रुख किया, जिसके चलते प्रतिवादी को हिरासत में लिया गया. हिरासत के दौरान ही 20 अगस्त 2018 को दोनों के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें प्रतिवादी ने उत्पीड़न के बदले मुआवजा देने का वादा किया. इस समझौते में पदमपुखरी गांव में जमीन हस्तांतरण सहित अन्य शर्तें शामिल थीं. याचिकाकर्ता को बाद में आंशिक मुआवजा मिला, जिसमें 5 लाख रुपये नकद और एक वाहन (स्मार्ट कार्ड और बीमा पॉलिसी सहित) शामिल थे.

इसी बीच, 10 अक्टूबर 2018 को याचिकाकर्ता ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी), दीमापुर के समक्ष सुरक्षा, आवास और आर्थिक राहत की मांग करते हुए कार्यवाही शुरू की. यह मामला लंबित रहने के दौरान 15 नवंबर 2018 को जीबी पारंपारिक कोर्ट ने विवाह को समाप्त करने का फैसला सुनाया.

इसमें खास बात यह है कि पारंपारिक अदालत ने 20 अगस्त के समझौते की शर्तों में बदलाव किया और निर्देश दिया कि कुछ अहम चीज़ें, जिनमें 15 लाख रुपये की बकाया रकम, 1.5 लाख रुपये के शादी के तोहफ़े और पदमपुखरी में ज़मीन का मालिकाना हक़ शामिल था, उन्हें समझौते से हटा दिया. इस प्रकार, समझौता नाममात्र के लिए तो बरकरार रहा, लेकिन उसकी महत्वपूर्ण शर्तें प्रभावी रूप से समाप्त कर दी गईं.

बाद में 21 जून 2024 को जेएमएफसी के समक्ष चल रहे घरेलू हिंसा के मामले में अंतिम आदेश पारित हुआ, जिसमें याचिकाकर्ता को 12,000 रुपये मासिक किराया, 20,000 रुपये मासिक भरण-पोषण और 40,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया.

इसके बाद याचिकाकर्ता ने 5 अगस्त 2021 को दीमापुर की फैमिली कोर्ट में धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण याचिका (Maintenance Case No’ 04/2021) दायर की’ हालांकि, प्रतिवादी ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए कहा कि जीबी पारंपारिक अदालत, जिसे संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत संरक्षण प्राप्त है, पहले ही भरण-पोषण के मुद्दे का निपटारा कर चुका है और याचिकाकर्ता को 2018 के समझौते के तहत मुआवजा मिल चुका है. इन आपत्तियों को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट ने याचिका को अस्वीकार्य मानते हुए खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता चाहें तो जीबी कोर्ट के आदेश को अपील के माध्यम से चुनौती दे सकती है.

इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया’ पुनर्विचार में हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही इस्तेमाल नहीं किया और पारंपरिक समझौते को क़ानूनी राहत में रुकावट के तौर पर गलत तरीके से देखा.

अदालत ने धारा 125 सीआरपीसी की प्रकृति और उद्देश्य पर जोर देते हुए कहा, ‘धारा 125 सीआरपीसी एक धर्मनिरपेक्ष, संक्षिप्त और स्वतंत्र कानूनी उपाय है.’

अदालत ने दोहराया कि यह प्रावधान सामाजिक न्याय का एक साधन है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को असहाय होने से बचाना है और इसे किसी भी व्यक्तिगत या पारंपरिक कानून के अधीन नहीं किया जा सकता. अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व किसी भी व्यक्तिगत या पारंपरिक कानून के कारण समाप्त नहीं होता.

साथ ही यह भी कहा गया कि पूर्व में हुए समझौते कानूनी अधिकारों को खत्म नहीं करते और याचिकाकर्ता को धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार बना रहता है, चाहे पारंपरिक अदालत ने कोई भी फैसला क्यों न दिया हो.

अदालत ने यह भी दोहराया कि पुनर्विवाह होने तक तलाकशुदा महिला को धारा 125 सीआरपीसी के तहत ‘पत्नी’ ही माना जाता है, और जहां पारंपरिक व्यवस्थाएं उसके जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं हैं, वहां अदालत हस्तक्षेप कर सकती है.

अंत में अदालत ने फैमली कोर्ट के 27 फरवरी 2024 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया. अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों पक्ष अपनी संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करें और साक्ष्य प्रस्तुत करें’ साथ ही, यह भी कहा कि भरण-पोषण तय करते समय अदालत पहले से मिले 5 लाख रुपये, वाहन, 20,000 रुपये मासिक भरण-पोषण और 12,000 रुपये किराये को ध्यान में रखे.

सिक्किम: सरकारी स्कूल ने ड्यूटी के दौरान कर्मचारियों द्वारा निजी रील बनाने पर प्रतिबंध लगाया

सिक्किम के डिक्चू स्थित एक सरकारी स्कूल ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि छात्र और शिक्षक पढ़ाई पर केंद्रित रहें, ड्यूटी के दौरान कर्मचारियों द्वारा निजी रील बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया है.

स्कूल के प्रिंसिपल संतोष रेग्मी ने एक नोटिस में कहा, ‘इस संस्थान के सभी कर्मचारियों को सूचित किया जाता है कि वे स्कूल परिसर के भीतर ड्यूटी के दौरान निजी रील बनाने/तैयार करने से परहेज करें.’

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

हालांकि, स्कूल ने ऐसे वीडियो बनाने की अनुमति दी है जो छात्रों के लिए शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया के ‘नवाचारपूर्ण तरीकों’ का हिस्सा हों.

प्रिंसिपल ने कहा कि इस तरह की सामग्री नियमित कक्षा शिक्षण और स्कूल की सीखने की प्रक्रिया के निर्धारित समय में किसी प्रकार का व्यवधान या बाधा डाले बिना बनाई जा सकती है.

नोटिस के अनुसार, निर्देश के तहत कर्मचारियों को स्कूल परिसर में ड्यूटी के दौरान किसी भी व्यक्तिगत सोशल मीडिया सामग्री को रिकॉर्ड करने या उसमें शामिल होने की भी अनुमति नहीं है.

मणिपुर: ताज़ा हिंसा में चार लोगों की मौत, इंफाल में कर्फ्यू लागू

मणिपुर में मंगलवार को हुई ताज़ा हिंसा में कम से कम चार लोगों की मौत हो गई, जिनमें से दो लोग पुलिस की गोलीबारी में मारे गए.

खबरों के मुताबिक, अधिकारियों और मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, बिष्णुपुर ज़िले (जो कि मेईतेई बहुल इलाका है) में एक घर में हुए बम धमाके में मेईतेई समुदाय के दो बच्चों की मौत हो गई.

राज्य के गृह मंत्री गोविंददास कोंथौजम ने बताया कि बाद में उसी दिन, पुलिस ने सुरक्षा बलों के एक कैंप पर धावा बोलने वाली भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलीबारी की, जिसके परिणामस्वरूप दो और लोगों की मौत हो गई.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: X/@manipur_police)

मणिपुर मई 2023 से ही जातीय तनाव से जूझ रहा है. उस समय आरक्षण और आर्थिक लाभों को लेकर मुख्य रूप से मेईतेई समुदाय और कुकी आदिवासी समुदायों के बीच हिंसक झड़पें शुरू हो गई थीं. इस हिंसा में अब तक लगभग 260 लोगों की जान जा चुकी है और 60,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं.

इस ताज़ा घटना के बाद मेईतेई समूहों ने बम धमाके में कुकी उग्रवादियों के शामिल होने का आरोप लगाया है, जिसे कुकी संगठनों ने सिरे से खारिज कर दिया है. मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह ने कहा कि इस हमले के दोषियों की अभी तक पहचान नहीं हो पाई है और उन्होंने इस हमले को राज्य में बनी नाज़ुक शांति को भंग करने की एक साज़िश बताया.

हालात को काबू में करने के लिए प्रशासन ने इंफाल और उसके आसपास के इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया है और इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया है.

उखरुल में ग्रामीण समूहों के बीच गोलीबारी में बीएसएफ का एक कॉन्स्टेबल की मृत्यु

हिंसाग्रस्त मणिपुर के उखरुल ज़िले में 10 अप्रैल को गांवों के दो हथियारबंद गुटों के बीच हुई गोलीबारी में एक बीएसएफ कॉन्स्टेबल की जान चली गई.

नॉर्थईस्ट नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा की यह घटना शुक्रवार शाम के समय लितान इलाके में हुई, जब मोंगकोट चेपु के संदिग्ध कुकी-ज़ो सदस्यों और शिकिबंग के तंगखुल नगा लोगों के बीच गोलीबारी शुरू हो गई. दोनों गुटों के बीच यह झड़प मोंगकोट चेपु गांव के पास शाम करीब 4:45 बजे हुई.

मृतक की पहचान सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की 170वीं बटालियन के मिथुन मंडल के रूप में हुई है. वह उस समय ड्यूटी पर थे, जब उन्हें एक गोली लग गई. घटना के समय उन्हें सड़क सुरक्षा अभियान के लिए तैनात किया गया था. गोलीबारी में उनके कंधे पर गंभीर चोट लगी थी.

चोट लगने के बाद उन्हें इलाज के लिए इंफाल के एक अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी. डॉक्टरों ने बताया कि गोली लगने से उनके शरीर के अंदरूनी हिस्सों को गंभीर नुकसान पहुंचा था.

9 फरवरी 2026 को उखरुल ज़िले में संदिग्ध उग्रवादियों द्वारा कथित तौर पर कई घरों में आग लगाने के बाद तैनात किए सुरक्षाकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में जांच शुरू कर दी गई है और पुलिस ने गोलीबारी के संबंध में एक केस दर्ज कर लिया है. इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और अधिकारी गोलीबारी के लिए ज़िम्मेदार लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.

इस बीच, इस हत्या की निंदा करते हुए मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि कॉन्स्टेबल ने ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवा दी, जब उन्हें किसी अज्ञात दिशा से आई एक गोली लग गई.

उन्होंने आगे कहा कि मंडल, जो पश्चिम बंगाल के भागजान टोला गांव के रहने वाले थे, इलाज मिलने के बावजूद शाम करीब 6 बजे अपनी चोटों के कारण चल बसे. मुख्यमंत्री ने उनकी सेवा को भी सराहा और उनकी प्रतिबद्धता व समर्पण की तारीफ की.

नगा संगठन ने घटना की निंदा की

इस बीच, नगा समुदाय का शीर्ष संगठन तंगखुल नगा लोंग (टीएनएल) संघर्ष वाले इलाके में शांति और व्यवस्था बहाल करने के लिए तैनात एक केंद्रीय बल के सदस्य की हत्या की कड़ी निंदा की है.

शोक संतप्त परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए टीएनएल ने कुकी समुदाय के कुछ व्यक्तियों और उनके नागरिक समाज संगठनों द्वारा फैलाए गए कथित ‘झूठे नैरेटिव’ की भी आलोचना की. संगठन ने आरोप लगाया कि बिना किसी प्रमाण या साक्ष्य के इस घटना का दोष तंगखुल नगाओं पर मढ़ा गया है.

संगठन ने कहा कि कहा कि तंगखुल नगा गांव के वालिंटयर्स ने कभी भी केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों को निशाना नहीं बनाया है.

संगठन ने आगे आरोप लगाया कि लितान इलाके में संघर्ष शुरू होने के बाद से कुकी समूह के कैडर और हथियारबंद ग्रामीण लगातार आक्रामक बने हुए हैं, और बार-बार तंगखुल नगा गांवों को निशाना बना रहे हैं.

वहीं, उखरूल स्थित कुकी सीएसओ वर्किंग कमेटी ने दावा किया कि लितान सरेइखोंग कब्रिस्तान के पास लितान फार्मिला में एक लाल छत वाले घर से एक तंगखुल उग्रवादी ने बीएसएफ जवान पर गोली चलाई.

कुकी संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि ऐसे बंकरों का बार-बार उपयोग मोंगकोट चेपू पर हमले करने के लिए किया गया है, जिससे नागरिकों और सुरक्षा बलों दोनों को खतरा होता है. उसने यह भी कहा कि जमीन पर मौजूद बलों ने अब तक इन हमलों को रोकने के लिए जवाबी कार्रवाई नहीं की है.

त्रिपुरा: टिपरा मोथा प्रमुख ने भाजपा पर आदिवासी हितों के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया

त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) चुनावों से पहले टिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मा ने ने भाजपा पर आदिवासी हितों के साथ ‘विश्वासघात’ करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि टीटीएएडीसी चुनाव 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक ‘सेमीफाइनल’ की तरह होंगे.

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने स्वदेशी (आदिवासी) लोगों से किए गए वादों को पूरा नहीं किया और उनकी आकांक्षाओं को नजरअंदाज किया है.

टिपरा मोथा प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा. (फोटो साभार: X/@PradyotManikya)

देबबर्मा ने कहा कि टीटीएएडीसी चुनाव केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं है, बल्कि यह भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा. उनके अनुसार, इस चुनाव का परिणाम यह दिखाएगा कि लोग किसके साथ खड़े हैं और किस पर भरोसा करते हैं.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का मुख्य लक्ष्य आदिवासी समुदाय के अधिकारों और ‘ग्रेटर टिपरालैंड’ की मांग को आगे बढ़ाना है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा.

देबबर्मा ने भाजपा पर आरोप लगाया कि सत्ता में आने के बाद पार्टी ने आदिवासी क्षेत्रों के विकास और राजनीतिक अधिकारों को लेकर अपने वादों को लागू नहीं किया.

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे टीटीएएडीसी चुनाव में अपनी ताकत दिखाएं, क्योंकि यह चुनाव 2028 के विधानसभा चुनाव का संकेत देगा.

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर उनकी पार्टी को मजबूत जनादेश मिलता है, तो यह आने वाले विधानसभा चुनावों में बड़ा राजनीतिक बदलाव ला सकता है.

इस बीच, उन्होंने शुक्रवार को दावा किया कि उनकी पार्टी टीटीएएडीसी की कुल 28 सीटों में से 24 सीटें जीतने की राह पर है.

देबबर्मा ने यह भी दोहराया कि अगर सत्ता में आए तो परिषद मिज़ोस, रियांग और चकमा जैसे आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की औपचारिक मान्यता की दिशा में काम करेगी.

त्रिपुरा में टीटीएएडीसी चुनावों के लिए मतदान 12 अप्रैल को है, मतगणना 17 अप्रैल को होनी है.

मेघालय: गारो हिल्स के संगठनों ने जीएचएडीसी चुनावों के लिए विशेष आदिवासी मतदाता सूची की मांग की

मेघालय के गारो हिल्स क्षेत्र के कई संगठनों ने गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (जीएचएडीसी) से कानूनी प्रावधानों में संशोधन कर एक अलग मतदाता सूची तैयार करने की मांग की है, ताकि गैर-जनजातीय लोगों को परिषद चुनावों से बाहर रखा जा सके.

इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने शुक्रवार को मुख्य कार्यकारी सदस्य से मुलाकात की, उन्हें हाल ही में नियुक्ति पर बधाई दी और तत्काल ध्यान देने योग्य प्रमुख मुद्दों को पेश किया.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

इस ज्ञापन पर एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक एम्पावरमेंट (एडीई), आचिक होलिस्टिक अवेकनिंग मूवमेंट (एएचएएम), आचिक यूथ वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन (एवाईडब्ल्यूओ), फेडरेशन फॉर आचिक फ्रीडम (एफएएफ), फेडरेशन ऑफ खासी जयंतिया एंड गारो पीपल (एफकेजेजीपी), और गारो स्टूडेंट्स यूनियन (जीएसयू) जैसे समूहों ने संयुक्त रूप से हस्ताक्षर किए हैं.

उनकी मांगों के केंद्र में चुनावी प्रणाली में बदलाव की मांग है. संगठनों ने यह तर्क दिया कि जीएचएडीसी चुनावों में गैर-आदिवासियों को मतदाताओं या उम्मीदवारों के रूप में शामिल करना छठी अनुसूची के मूल उद्देश्य के खिलाफ है.

उन्होंने प्रस्ताव दिया कि मतदान का अधिकार और चुनाव लड़ने की पात्रता, दोनों ही सख्ती से केवल मेघालय के अनुसूचित जनजाति (एसटी) निवासियों तक ही सीमित होनी चाहिए; साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल एसटी प्रमाण पत्र होना ही अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है.

ज्ञापन में आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदायों के बीच बढ़ते टकराव का भी उल्लेख किया गया, जिसका कारण लंबे समय से अनसुलझे मुद्दे बताए गए हैं, जिनमें आदिवासी भूमि पर बड़े पैमाने पर हो रहे अतिक्रमण शामिल है.

संगठनों ने इस बात पर भी गौर किया कि मौजूदा कानून, जैसे कि ‘गारो हिल्स जिला (भूमि हस्तांतरण) अधिनियम, 1955’ और ‘मेघालय भूमि हस्तांतरण (विनियमन) अधिनियम, 1972’, पहले से ही छठी अनुसूची क्षेत्रों में गैर-आदिवासियों द्वारा भूमि के स्वामित्व को प्रतिबंधित करते हैं.

हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि कमजोर क्रियान्वयन और कम सजा के कारण इन कानूनों का उल्लंघन जारी है. इसलिए उन्होंने कड़े दंड, जिसमें लाखों रुपये तक का जुर्माना शामिल हो, लागू करने की मांग की.

विभिन्न समूहों ने परिषद से आदिवासी समुदायों के अधिकारों और पहचान को सुरक्षित करने के लिए निर्णायक कदम उठाने का आग्रह किया, और इस बात पर ज़ोर दिया कि क्षेत्र में सद्भाव बनाए रखने तथा आगे किसी भी तरह के तनाव को रोकने के लिए समय पर हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है.

ज्ञात हो कि पिछले महीने गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (जीएचएडीसी) चुनाव में गैर-आदिवासी उम्मीदवारों की भागीदारी को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे. जिसके बाद चुनावों को टालना पड़ा था और इलाके में कर्फ्यू लगाया गया था.