बिहार के नए सम्राट को बधाई. इस पोस्टर में दो सम्राट हैं. सम्राट अशोक और सम्राट चौधरी. राजनीति के भीतर जो संसाधन होता है और जो संभावना होती है, पात्र वहीं से आता है. बिहार भाजपा के नेताओं के विरोध की ख़बरों का कोई मतलब नहीं है. अमित शाह ने बिहार चुनाव के समय कहा था कि सम्राट को बहुत बड़ा आदमी बनाऊंगा. उन्होंने बना दिया.

पहले से साफ़ था कि सम्राट ही बनेंगे. बाकी किसी नेता ने दावेदारी नहीं की. उम्मीद की होगी वो अलग बात है. जब ख़ुद से चुनना ही नहीं है तो दिल्ली से आकर कोई चुन रहा है, इस प्रक्रिया से विरोध नहीं है तब उसके चुनाव का कैसे विरोध कर सकते हैं. क्या एकनाथ शिंदे भाजपा के थे? हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा के थे? जब इनका विरोध नहीं हुआ तो सम्राट चौधरी का कैसे किया जा सकता था. मुख्यमंत्री बनने से पहले भाजपा के अध्यक्ष थे तब किसने उनका विरोध किया था?
सम्राट ने भाजपा में आकर क्या किया, कुछ तो किया होगा कि भाजपा ने अध्यक्ष बनाया और अब मुख्यमंत्री. बाकी नाराज़ नेताओं को अपने भीतर झांककर देखना चाहिए कि क्या वे वाकई सम्राट से योग्य हैं?
बिहार में पढ़ाई-लिखाई का क्या हाल हो गया है सबको पता है. उस राज्य के कॉलेजों में बीए एमए की पढ़ाई में टाइम खपाना व्यर्थ है. जिसने भी पढ़ाई छोड़ दी अच्छा किया. जो वहां से पढ़कर निकला है, क्या पढ़ा है, वही जानता है.
राजनीति में पढ़ाई का कोई मतलब नहीं रहा. भारत जैसे देश में होना भी नहीं चाहिए, कई हज़ार कॉलेज कबाड़ हो चुके हैं तो यहां से निकले किस नेता की डिग्री पर आप भरोसा करेंगे. जिस देश के प्रधानमंत्री की डिग्री देश ही नहीं देख सकता उस देश में सम्राट की पढ़ाई पर हंसने का कोई मतलब नहीं है.
बिहार का विकास पुल पुलिया से आगे नहीं जाएगा. जात, कॉन्ट्रेक्ट, दहेज, और पैरवी पांती का राज्य बना रहेगा. इसने नई सदी की सभी संभावनाओं से खुद को अलग कर लिया है. कोई कोशिश करे तो अच्छी बात है. नीतीश कुमार ने बिहार के मूल स्वभाव को थामे रखा, मगर बिहार बेसब्र हो गया था. उसे खुलकर खेलना था. खाना था. खिलाना था. दो साल से यही सुन रहे हैं. जिस राज्य में काम का पैमाना सड़क और थाना बन जाए इसका मतलब है कि बिहार अभी कई दशक तक न्यूनतम आकांक्षाओं में ही लिपटा रहेगा.
नीतीश के बीस साल में बिहार ने कानून व्यवस्था को कितना आत्मसात् किया है, उसके लक्षण आने वाले समय में दिखेंगे.
नीतीश कुमार अपनी सेहत में नहीं है. 2029 तक नीतीश ही रहेंगे, इस वादे को सुविधा से भुला दिया गया है. छल से उनके नाम पर वोट मांगा गया. इसमें तो नीतीश भी पार्टनर थे. इतने साल तक मुख्यमंत्री रहे व्यक्ति को घेरकर दिल्ली पहुंचा दिया गया. उन्होंने या उनकी पार्टी ने विरोध नहीं किया. जो विरोध हुआ वो बनावटी साबित हुआ. नीतीश कुमार ने कम से कम दो साल से मीडिया से बात नहीं की. करने नहीं दिया गया.
नीतीश को कभी न कभी रिटायर होना था मगर उनकी विदाई वैसी तो नहीं हुई. जिसके हकदार हैं. उन्होंने बिहार के लिए शुरू में अच्छा काम किया और बाद में सीमित और उसके बाद बिहार जानता है, किस तरह उनका काम छितरा गया. फिर भी नीतीश लंबे समय तक याद किए जाएंगे. जिस राज्य की जनता आज भी सात हजार कमाने के लिए मोहताज है उसे उन्होंने शानदार सड़क दी. ये बिहार की कमी है कि उसने उसे सड़क का इस्तेमाल ठीक से नहीं किया.
नीतीश जब तक बोला करते थे तब तक किसी समुदाय को आहत नहीं किया. हर समुदाय को लगा कि नीतीश हैं तभी नीतीश बने रहे. इसके लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए.
काश नियति ने उन्हें अच्छी सेहत दी होती तो नीतीश कुमार कुछ और करते. कई लोगों ने ऐसा कहा मगर क्या वाकई नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी से लड़ पाते? ऐसा तो कभी नहीं लगा नहीं. उन्होंने दो बार भाजपा को झटका देकर संकेत ज़रूर किया फिर जब वापस आए तो लगभग कान पकड़कर माफी मांगते रहे कि अब कभी भाजपा से अलग नहीं होंगे.
नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के बीच तनाव तो था. एक दूसरे से बड़ा समझने की होड़ भी थी. लंबे दौर में नरेंद्र मोदी ने नीतीश से सारा हिसाब चुका लिया. बस तब चुकाया जब नीतीश सेहत से कमजोर पड़ गए और जांच एजेंसियों से भय खा गए. इस मुक़ाबले में जीत नरेंद्र मोदी की हुई लेकिन तब हुई जब लड़ने वाले को पता ही नहीं कि उसके साथ क्या हो रहा है.
नीतीश ने जिस बिहार के दम पर मोदी को चैलेंज करना चाहा, मोदी ने उस बिहार से ही नीतीश को बाहर कर दिया. यह सत्य है और भारत की राजनीति में हिसाब चुकाने की बड़ी घटना है. आजीवन आपातकाल के नाम पर लड़ने की कमाई खाने वाले समाजवादी भी इस खेल में चुप हो गए. वे आज तक सत्तर के घेरे से बाहर नहीं आ सके और लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले इस समय लोकतंत्र की लड़ाई में कहीं नज़र नहीं आते.
नीतीश के दौर के समाजवादी दिल्ली में मकान के लिए राज्यसभा की दौड़ वाले नेता रह गए हैं.
सम्राट का मुख्यमंत्री बनना बंद कमरे में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति की व्यक्तिगत जीत का जश्न है. वे जश्न मनाने के हकदार हैं. यह दोनों के जीवन की बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने साबित कर दिया कि बिहार की राजनीतिक बुद्धिमत्ता बाकी प्रदेश से अलग नहीं है. इस भ्रम को अगर किसी ने तोड़ा है तो उसके सम्राट नरेंद्र मोदी और अमित शाह हैं.
यह हर बिहारी के लिए गर्व का दिन है. इतनी आसानी से कोई अच्छा दोस्त भी अपने दोस्त को भ्रम से बाहर नहीं निकाल पाता. मोदी-शाह ने बिहार के इस मिथक को ध्वस्त कर दिया. ये और बात है कि दोनों को बिहार को इस भ्रम से निकालने में मेहनत करनी पड़ी. सब्र करना पड़ा. मौक़े का इंतज़ार करना पड़ा. बहुत बाद में समझ आ गया कि जो काम दस हज़ार के नोट से हो सकता है उस काम के लिए कई साल से इतनी मेहनत क्यों कर रहे थे. पैसा तो उनके पास था ही, बस उसका इस्तेमाल कब करना है या तो वे पहले से जानते थे या वाकई दो साल पहले पता चला होगा! सम्राट चौधरी को बधाई.
(मूल रूप से रवीश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित)
