नई दिल्ली: केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विभिन्न प्रिंट मीडिया में विज्ञापनों पर 76,13,129 रुपये खर्च किए हैं. यह जानकारी सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आई है.
महाराष्ट्र के अमरावती निवासी अजय बसुदेव बोस द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत दायर आवेदन में मंत्रालय से पूछा गया था कि आरएसएस की शताब्दी के मौके पर विभिन्न प्रिंट मीडिया में विज्ञापनों पर कुल कितना खर्च किया गया. इस आवेदन का जवाब 13 अप्रैल 2026 को संस्कृति मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी एवं केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) पप्पूंजय कुमार ने दिया.
अपने जवाब में मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विभिन्न प्रिंट मीडिया में दिए गए विज्ञापनों पर कुल 76,13,129 रुपये खर्च किए गए. जवाब में यह भी बताया गया कि यह खर्च सीधे तौर पर संस्कृति मंत्रालय द्वारा वहन किया गया.
ध्यान रहे यह राशि केवल प्रिंट मीडिया में दिए गए विज्ञापनों पर किए गए खर्च से संबंधित है, न कि आरएसएस के शताब्दी समारोह के पूरे आयोजन पर हुए कुल खर्च से. यह समारोह 1 अक्टूबर, 2025 को संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे.
आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर, 1925 में नागपुर में हुई थी और 2025 में इसने अपने 100 वर्ष पूरे किए. यह संगठन स्वयं को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का वाहक बताता है, जबकि आलोचक इसे ‘हिंदुत्व’ विचारधारा पर आधारित मानते हैं, जो भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में देखने की वकालत करती है.
आरएसएस की शताब्दी के अवसर पर देशभर में कई कार्यक्रम, आयोजन और प्रचार गतिविधियां आयोजित की गईं. हालांकि, अब यह सामने आया है कि इन गतिविधियों के प्रचार-प्रसार में केंद्र सरकार के एक मंत्रालय ने भी वित्तीय भूमिका निभाई.
संस्कृति मंत्रालय ने क्या कहा?
इस संबंध में सरकार का पक्ष जानने के लिए संस्कृति मंत्रालय के अपर महानिदेशक (मीडिया एवं संचार) एम. अन्नादुरई को ये सवाल भेजे गए:
- क्या संस्कृति मंत्रालय के पास किसी वैचारिक या गैर-सरकारी संगठन के कार्यक्रमों के प्रचार के लिए सरकारी धन खर्च करने की कोई स्पष्ट नीति या दिशानिर्देश हैं?
- आरएसएस के 100 वर्ष के कार्यक्रम के लिए विज्ञापन देने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया?
- किन मानदंडों के आधार पर आरएसएस के लिए विज्ञापन जारी करने का निर्णय लिया गया?
- क्या पिछले वर्षों में अन्य सामाजिक, सांस्कृतिक या धार्मिक संगठनों के कार्यक्रमों के लिए भी इसी तरह सरकारी विज्ञापन जारी किए गए हैं? यदि हां, तो उनके विवरण क्या हैं?
- क्या मंत्रालय यह मानता है कि किसी विशेष विचारधारा से जुड़े संगठन के प्रचार पर सार्वजनिक धन खर्च करना राज्य की तटस्थता (न्यूट्रैलिटी) के अनुरूप है?
- क्या इस निर्णय में मंत्री स्तर पर कोई विशेष निर्देश या स्वीकृति शामिल थी?
इन सवालों के जवाब ईमेल पर नहीं मिले, लेकिन मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने फोन पर बातचीत की. इससे पता चला कि इस तरह के कार्यक्रमों का निर्णय गृह मंत्री के नेतृत्व वाली एक कमेटी लेती है और आधिकारिक रूप से इसे संस्कृति मंत्रालय अंजाम देता है.
उन्होंने बताया कि मंत्रालय एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं, संस्थाओं और व्यक्तित्वों की वर्षगांठ मनाता है:
संस्कृति मंत्रालय में एक ‘प्रोग्राम’ है, जिसे ‘शताब्दी और वर्षगांठ’ (सेंटेनरीज़ एंड एनिवर्सरीज़) कहा जाता है. इसके तहत हम उन व्यक्तियों, संस्थानों और घटनाओं की शताब्दी या वर्षगांठ मनाते हैं, जिन्हें नेशनल इम्प्लीमेंटेशन कमेटी (एनआईसी) द्वारा घोषित किया जाता है. इस कमेटी की अध्यक्षता भारत के गृह मंत्री करते हैं.
आरएसएस के शताब्दी समारोह और उससे जुड़े विज्ञापनों के बारे में मंत्रालय के सचिव ने बताया:
आरएसएस के 100 वर्ष का आयोजन भी एक शताब्दी समारोह का हिस्सा था, जिसे एनआईसी की मंजूरी के बाद संस्कृति मंत्रालय द्वारा आधिकारिक तौर पर मनाया गया. जब हम ऐसा कोई स्मृति-समारोह (कमेमोरेशन) आयोजित करते हैं, तो विज्ञापन जारी किए जाते हैं, साथ ही स्मारक सिक्के और डाक टिकट भी जारी किए जाते हैं. आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री द्वारा एक सिक्का और डाक टिकट जारी किया गया था और देशभर के अखबारों में विज्ञापन भी दिए गए थे. यह एक मानक प्रक्रिया है, जो सभी शताब्दी समारोहों के लिए अपनाई जाती है. यह मंत्रालय के आधिकारिक कार्य का हिस्सा है.

विवेक अग्रवाल ने यह भी जोड़ा कि आरएसएस का कार्यक्रम संस्कृति मंत्रालय के एक औपचारिक आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा था और इसी कारण आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई गई. उन्होंने ऐसे अन्य कार्यक्रमों के उदाहरण भी दिए:
हमने जैन मुनि स्वामी विज्ञानानंद की संस्था के 100 वर्ष पूरे होने पर समारोह आयोजित किया. इसके अलावा वंदे मातरम के 150 वर्ष और सरदार पटेल की जन्मशती भी मनाई गई. दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी व्यक्ति या संस्थान के 25, 50, 75 वर्ष या 25 के गुणक वाले वर्षों का स्मरणोत्सव एनआईसी की मंजूरी से मनाया जा सकता है. आप मंत्रालय की वेबसाइट पर ऐसी सूची देख सकते हैं. इसमें सोमनाथ पर हुए हमले के 1000 वर्ष, गुरु तेग बहादुर की शहादत के 350 वर्ष और अहिल्याबाई होलकर से जुड़े समारोह भी शामिल हैं.
संस्कृति मंत्री और आरएसएस
इस संदर्भ में मौजूदा संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की पृष्ठभूमि की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है. शेखावत ने 1992 में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर से छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, जहां वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) – जो आरएसएस का छात्र संगठन है – के बैनर तले चुने गए थे.
बाद के वर्षों में भी उनका जुड़ाव आरएसएस से जुड़े संगठनों और गतिविधियों से बना रहा है. वह आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच का हिस्सा रहे और साथ ही संघ की सीमा जन कल्याण समिति में भी सक्रिय रहे. इस संगठन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमा के किनारे ‘द्वितीयक नागरिक रक्षा पंक्ति’ तैयार करना बताया जाता है.
अक्टूबर 2025 में आरएसएस के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम शामिल होते हुए गजेंद्र सिंह शेखावत ने आरएसएस को ‘राष्ट्र निर्माण की प्रखर पाठशाला’ बताया था और कहा था कि इस संगठन ने देश में नई ऊर्जा और दिशा का संचार किया है. अपने भाषण में शेखावत में संघ की जमकर तारीफ की थी.
‘यह किसी कानून का उल्लंघन नहीं लेकिन…’
आरएसएस के 100 पर संस्कृति मंत्रालय द्वारा विज्ञापन पर खर्च का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारतीय संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष मानता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह किसी विशेष विचारधारा या संगठन का पक्ष न ले. लेकिन द वायर हिंदी से बातचीत में सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय हेगड़े कहते हैं, ‘ऐसे मामलों पर सवाल तो उठने चाहिए लेकिन संस्कृति मंत्रालय तो विभिन्न ऐसे कार्यक्रमों पर पैसे खर्च करता है, जिसमें कव्वाली फेस्टिवल भी शामिल है. संस्कृति मंत्रालय की विचारधारा धर्मनिरपेक्ष नहीं है. और ऐसा कोई विशिष्ट संवैधानिक प्रावधान भी नहीं है जो टैक्स के पैसे को किसी भी उद्देश्य के लिए उपयोग करने से रोकता हो.’
हालांकि, हेगड़े ने यह भी रेखांकित किया कि ऐतिहासिक रूप से राज्य के संसाधनों को राजनीतिक या सांप्रदायिक आयोजनों से अलग रखा जाता रहा है. उन्होंने उदाहरण दिया, ‘जब कांग्रेस की सरकार थी और कांग्रेस की स्थापना के 100 साल (शताब्दी) हुए थे, तो क्या उसके लिए सरकारी धन का इस्तेमाल किया गया था? नहीं, इन चीजों को हमेशा अलग रखा जाता था.’
हेगड़े अंत में कहते हैं कि भले ही यह खर्च किसी मौजूदा कानून का उल्लंघन न करता हो, लेकिन यह शासन की निष्पक्षता और राज्य की तटस्थता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है. इसलिए भविष्य में इस तरह की स्थितियों से निपटने के लिए स्पष्ट कानून बनाया जाना चाहिए.
