नई दिल्ली: भारत-भूटान सीमा से सटे असम के चिरांग ज़िले में उस समय तनाव भड़क उठा, जब आरक्षित वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने के उद्देश्य से चलाए गए बेदखली अभियान के दौरान वन कर्मियों और आदिवासी प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, इस झड़प के दौरान वन अधिकारियों ने रिपु-चिरांग आरक्षित वन क्षेत्र में भूमि पर कथित रूप से अतिक्रमण करने के आरोप में 25 आदिवासियों को हिरासत में ले लिया था. इसके बाद महिलाओं सहित कई स्थानीय लोग उनकी रिहाई की मांग को लेकर रुनिखाता वन रेंज कार्यालय के बाहर जमा हो गए. कुछ प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि वन अधिकारियों ने उनके साथ, जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं, मारपीट की.
शुक्रवार सुबह कार्यालय के बाहर और भी बड़ी संख्या में भीड़ जमा हो गई और कथित तौर पर उन्होंने कार्यालय में तोड़फोड़ की.
कुछ अज्ञात अधिकारियों ने द असम ट्रिब्यून को बताया कि प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर वन विभाग के कम से कम चार वाहनों में आग लगा दी और कार्यालय को भी जलाने का प्रयास किया.
पुलिस के मौके पर पहुंचने और प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने के बाद स्थिति और भी अधिक तनावपूर्ण हो गई. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वन कर्मियों ने कथित तौर पर गोलियां भी चलाईं. इस घटना में 30 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें से अधिकांश पुलिसकर्मी थे. इसके अलावा, चार प्रदर्शनकारियों को भी हिरासत में लिया गया.
हिंसा की इस घटना के बाद राज्य सरकार ने चिरांग और कोकराझार जिलों में इंटरनेट और डेटा सेवाओं को निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया.
ये दोनों जिले ‘बोडोलैंड क्षेत्रीय क्षेत्र’ (Bodoland Territorial Region) का हिस्सा हैं. इन विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करने वाले संगठनों – ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन और ऑल संताल स्टूडेंट्स यूनियन- ने आरोप लगाया है कि यह बेदखली अभियान मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों को निशाना बनाने के उद्देश्य से चलाया गया था.
ख़बरों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि वन विभाग चुनिंदा तौर पर केवल आदिवासी लोगों को ही हिरासत में ले रहा है, जबकि उसी इलाके में अन्य समुदायों के लोगों को जंगल की ज़मीन साफ करने की छूट दे रहा है.
एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘अगर यहां जंगल साफ करना गैर-कानूनी है, तो कार्रवाई सिर्फ हमारे खिलाफ, यानी आदिवासी लोगों के खिलाफ ही क्यों की जा रही है? बोडो समुदाय के लोग भी यही कर रहे हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. यह एकतरफा कार्रवाई है, और हम इसी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे.’
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए लोगों के साथ वन कार्यालय के अंदर दुर्व्यवहार किया गया और पुलिस अधिकारियों ने महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की.
प्रदर्शनकारी ने आगे कहा, ‘वे हम पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, और हिरासत में किया गया यह दुर्व्यवहार हमें तोड़ने की उनकी एक चाल थी. इससे हमारे लोग भड़क गए, जिसके चलते स्थिति हिंसक हो गई.’
मणिपुर: दो बच्चों के मौत के विरोध में प्रदर्शन, सुरक्षा बलों से झड़प में पांच प्रदर्शनकारी घायल
हिंसाग्रस्त मणिपुर में जारी अशांति के बीच 17 अप्रैल को इंफाल ईस्ट के कुछ हिस्सों में तनाव फैल गया, जब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं.
खबरों के अनुसार, मुख्यमंत्री युमनम खेमचंद सिंह के निजी आवास के पास सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़प में कम से कम पांच प्रदर्शनकारी घायल हो गए. ये प्रदर्शनकारी बिष्णुपुर जिले के मोइरांग ट्रोंगलाओबी इलाके में में हुए धमाके, जिसमें दो बच्चों की मौत हो गई थी, के लिए न्याय की मांग कर रहे थे.

गुरुवार रात इंफाल पश्चिम के सिंगजामेई स्थित मुख्यमंत्री के निजी आवास के पास यह झड़प हुई. सुरक्षा बलों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले और नकली बम (मॉक बम) का इस्तेमाल किया.
इंफाल पूर्व जिले में भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन हुआ. जहां खुराई लामलोंग में एक मशाल रैली को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे गए.
यह रैली ‘ऑल मणिपुर यूनाइटेड क्लब्स ऑर्गनाइजेशन’ और अन्य समूहों द्वारा राज्य में हाल ही में हुई हिंसा की घटनाओं के बाद चल रहे विरोध प्रदर्शनों के हिस्से के तौर पर आयोजित की गई थी. इंफाल पूर्व के अलग-अलग इलाकों से बड़ी संख्या में महिला प्रदर्शनकारी खुराई लामलोंग बाज़ार की ओर मार्च करते हुए आगे बढ़ीं; इस दौरान उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ नारे लगाए.
खबरों के अनुसार, रैली से पहले ही इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी; राज्य और केंद्रीय बलों को अहम जगहों पर तैनात किया गया था और प्रदर्शनकारियों को तय सीमाओं से आगे बढ़ने से रोकने के लिए बैरिकेड लगाए गए थे. जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, तो सुरक्षा बलों के साथ उनकी झड़प हो गई, जिसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने स्थिति को काबू में करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल किया.
ज्ञात हो कि हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों के तहत कई जगहों पर दिन के समय धरने-प्रदर्शन और रात के समय मशाल रैलियां आयोजित की गई हैं.
असम: नागरिक समूह ने ‘अलोकतांत्रिक कार्रवाइयों’ को लेकर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की आलोचना की
अक्सोम नागरिक सम्मेलन के बैनर तले प्रमुख नागरिकों के एक समूह ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की कड़ी आलोचना की है और उनकी हालिया कार्रवाइयों व सार्वजनिक बयानों को ‘बेहद निंदनीय’ और ‘अलोकतांत्रिक’ करार दिया. यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं.
13 अप्रैल को जारी एक प्रेस बयान में समूह ने कहा कि असम में मतदान अधिकांशतः शांतिपूर्ण रहा और केवल कुछ छिटपुट घटनाएं हुईं, लेकिन चुनाव से पहले और बाद के घटनाक्रमों ने राज्य में लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को लेकर ‘गंभीर चिंताएं’ पैदा की हैं.

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा द्वारा लगाए गए आरोपों का उल्लेख करते हुए संगठन ने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया कि उन्होंने कानूनी तरीकों से जवाब देने के बजाय राज्य मशीनरी का दुरुपयोग किया. बयान में कहा गया कि आरोपों का साक्ष्यों के साथ खंडन करने या न्यायिक रास्ता अपनाने के बजाय पुलिस को असम से बाहर, यहां तक कि दिल्ली में भी, खेड़ा को निशाना बनाने के लिए तैनात किया गया.
बयान में कहा गया, ‘मुख्यमंत्री को इस तरह की पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है. उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए या यदि आरोप झूठे हैं तो मानहानि का मामला दर्ज करना चाहिए.’
संगठन ने असम में पुलिस शक्तियों के चुनिंदा इस्तेमाल का भी आरोप लगाया. इसमें 4 अप्रैल को असम जातीय परिषद (एजेपी) की उम्मीदवार कुंकी चौधरी द्वारा पानबाजार थाने में दर्ज शिकायत का हवाला दिया गया, जिसमें उनके और उनके परिवार के खिलाफ कथित एआई डीपफेक वीडियो का मामला उठाया गया था. संगठन के अनुसार, इस एफआईआर पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
इसके विपरीत, समूह ने दावा किया कि चौधरी के सोशल मीडिया हैंडलर को देर रात हिरासत में लिया गया, जबकि स्वयं उम्मीदवार को एक चुनाव संबंधी मामले में पुलिस ने तलब किया. साथ ही, एजेपी अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई के आवास पर हाल ही में छापेमारी किए जाने का भी आरोप लगाया गया.
प्रेस की स्वतंत्रता पर चिंता जताते हुए संगठन ने मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया कि उन्होंने उनकी आलोचना करने वाले कुछ मीडिया संस्थानों को धमकी दी. बयान में कहा गया, ‘सत्ता से सच कहना मीडिया का पवित्र कर्तव्य है – यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. इस तरह की डराने-धमकाने की कोशिशें लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ पर प्रहार करती हैं.’
चुनाव संपन्न होने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखे जाने के बाद संगठन ने मतगणना प्रक्रिया के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने और किसी भी हस्तक्षेप को रोकने के लिए ‘लगातार निगरानी’ की अपील की.
यह बयान अक्सोम नागरिक सम्मेलन की ओर से जारी किया गया और इसे हिरन गोहैन, हरेकृष्ण डेका, अजीत कुमार भुइयां, परेश मालाकर, अब्दुल मन्नान और संतनु बोरठाकुर जैसी प्रमुख हस्तियों ने समर्थन दिया.
असम: मुआवजे की मांग को लेकर दीमा हसाओ के ग्रामीणों का विरोध तेज़, हाईवे परियोजना रोकने की चेतावनी
असम के दीमा हसाओ ज़िले में तनाव बढ़ गई है, क्योंकि हरंगाजाओ के अंतर्गत आने वाले डोलाईचुंगा गांव के लोगों ने चल रहे हाईवे निर्माण परियोजना से नुकसान हुई अपनी खेती की ज़मीन के लिए मुआवज़े की मांग करते हुए अपना विरोध तेज़ कर दिया है.
खबरों के अनुसार, ग्रामीणों ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को 48 घंटे की समयसीमा देते हुए चेतावनी दी कि अगर तय समय के भीतर मुआवज़ा जारी नहीं किया गया, तो वे इस इलाके से गुज़रने वाले सिलचर-सौराष्ट्र ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर चार-लेन सड़क प्रोजेक्ट में बाधित करेंगे.
स्थानीय लोगों का कहना है कि जाटिंगा और हरंगाजाओ के बीच स्थित डोलाइचुंगा गांव के कई परिवारों की कृषि भूमि और बागानों को निर्माण कार्य के कारण भारी नुकसान हुआ है. उन्होंने बताया कि कई बार अपील करने के बावजूद उन्हें अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है.
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ज़िला प्रशासन, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनॉमस काउंसिल और एनएचएआई के अधिकारियों ने मिलकर कई बार निरीक्षण किया और हर बार मुआवज़े का आश्वासन दिया, लेकिन कोई भुगतान नहीं किया गया.
ग्रामीणों ने यह भी याद दिलाया कि इसी मुद्दे को लेकर दो महीने पहले भी निर्माण कार्य रोक दिया गया था. हालांकि, उस समय अधिकारियों के आश्वासन के बाद काम फिर से शुरू किया गया, जिसे अब वे पूरा न किए जाने का आरोप लगा रहे हैं.
नॉर्थईस्ट नाउ के मुताबिक, प्रशासनिक पक्ष से एनएचएआई के परियोजना निदेशक योगेश राव ने बताया कि क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण जमीन पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि 2006 से अधिग्रहित भूमि के लिए मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है, और वर्तमान मामला नई प्रभावित भूमि से जुड़ा हुआ है.
उन्होंने आगे कहा कि एक नामित प्राधिकरण ने नई जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. उनके अनुसार, अधिकारी अब उस रिपोर्ट की समीक्षा कर रहे हैं और सत्यापन पूरा होने के बाद मुआवजा जारी किया जाएगा.
त्रिपुरा: तिपरा मोथा ने आदिवासी परिषद चुनाव में जीत दर्ज की
तिपरा मोथा ने त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त ज़िला परिषद (एडीसी) चुनाव में जीत हासिल की है. 12 अप्रैल को हुए मतदान के नतीजे शुक्रवार को घोषित हुए, जिसमें पार्टी ने 28 में से 24 सीटें जीतीं. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को केवल चार सीटों से संतोष करना पड़ा, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का खाता भी नहीं खुला.

2021 के एडीसी चुनाव में तिपरा मोथा ने 18 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को नौ सीटें मिली थीं, जो बाद में एक निर्दलीय के शामिल होने से बढ़कर 10 हो गई थीं.
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले तिपरा मोथा ने भाजपा के साथ गठबंधन किया था और सरकार का हिस्सा बनी थी. हालांकि, लोकसभा चुनाव से पहले हुए तिपरासा समझौते (Tiprasa Accord) के क्रियान्वयन को लेकर देरी और मतभेदों के कारण दोनों दलों के बीच तनाव बढ़ गया.
तिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मन ने खुले तौर पर मुख्यमंत्री माणिक साहा पर ‘ग्रेटर तिपरालैंड’ (Greater Tipraland) की मांग में बाधा डालने का आरोप लगाया. यह एक प्रस्तावित राज्य है, जिसमें बांग्लादेश और दक्षिणी असम के कुछ हिस्से शामिल होंगे.
भाजपा कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों ने भी दोनों दलों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया. आखिर में भाजपा ने एडीसी चुनाव तिपरा मोथा के खिलाफ स्वतंत्र रूप से लड़ा.
सिक्किम: गैर-सिक्किमी से शादी करने पर बच्चों की संपत्ति और पहचान के अधिकार वाली याचिका खारिज
सिक्किम हाईकोर्ट ने 100 से अधिक स्थानीय महिलाओं की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने गैर-सिक्किमी पुरुषों से विवाह के बाद अपने बच्चों के लिए पहचान प्रमाण पत्र (सीओआई) और संपत्ति अधिकार की मांग की थी.
जस्टिस मीनाक्षी मदन राय ने 6 अप्रैल, 2026 को ‘पुष्पा मिश्रा और अन्य बनाम सिक्किम राज्य’ मामले में यह फ़ैसला सुनाया. याचिकाकर्ता, जो सभी जन्म से सिक्किमी हैं, ने 2018 की एक सरकारी अधिसूचना को चुनौती दी थी और तर्क दिया था कि मौजूदा नियम उनके संवैधानिक समानता के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और लिंग के आधार पर भेदभाव करते हैं.
महिलाओं की मांग थी कि उनके बच्चों को सीओआई का दर्जा दिया जाए, जिससे उन्हें सरकारी नौकरियों, पूरे विरासत अधिकारों और अन्य राज्य लाभों तक पहुंच मिल सके, जो मूल सिक्किमी निवासियों के लिए आरक्षित हैं.
हालांकि, अदालत ने राज्य के लंबे समय से चले आ रहे रुख को बरकरार रखा. अदालत ने कहा कि अनुच्छेद-371एफ के तहत सिक्किम के विशेष संवैधानिक सुरक्षा उपाय उन कानूनों की रक्षा करते हैं, जो 1975 में भारत के साथ राज्य के विलय से पहले लागू थे. अदालत ने सिक्किम सब्जेक्ट रेगुलेशन 1961 का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई सिक्किमी महिला गैर-सिक्किमी पुरुष से विवाह करती है, तो उसके बच्चे अपने आप सीओआई के लिए योग्य नहीं होते.
लैंगिक भेदभाव के आरोप पर अदालत ने कहा कि यह अंतर सिक्किम की ऐतिहासिक और कानूनी परिस्थितियों पर आधारित है और इसे असंवैधानिक भेदभाव नहीं माना जा सकता.
याचिका खारिज करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे अभी भी रेजिडेंशियल सर्टिफिकेट (आरसी) के लिए आवेदन कर सकते हैं. इससे उन्हें शिक्षा और कुछ अन्य राज्य लाभ मिल सकते हैं, हालांकि यह सीओआई के बराबर अधिकार नहीं देता.
अदालत ने इस मुद्दे को नीति से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि इन नियमों में कोई बड़ा बदलाव केवल विधायिका द्वारा ही किया जा सकता है, न कि न्यायिक हस्तक्षेप से.
मिज़ोरम: मिजो नेशनल फ्रंट ने लेंगपुई भूमि घोटाले मामले में सीबीआई जांच में देरी को लेकर राज्य सरकार पर साधा निशाना
मिजोरम की मुख्य विपक्षी पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि वह 187.90 करोड़ रुपये के कथित लेंगपुई भूमि घोटाले में सीबीआई जांच शुरू कराने के लिए ठोस कदम उठाने में विफल रही है.
शुक्रवार को आइजोल में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एमएनएफ के विधिक प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष लालपियानफेला चावंगथु ने आरोप लगाया कि जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) सरकार केवल सीबीआई जांच के लिए सहमति देने की अधिसूचना जारी करने के आगे कोई कदम नहीं उठाया.
उन्होंने दावा किया कि सरकार ने इसके बाद कोई सार्थक कार्रवाई नहीं की और जांच को आगे बढ़ाने की उसकी मंशा पर सवाल उठाया. उनके अनुसार, सरकार या तो जांच आगे बढ़ाने के लिए इच्छुक नहीं है या उसमें ऐसा करने का साहस नहीं है.
चावंगथु ने कहा कि हालांकि सरकार ने 23 फरवरी को सीबीआई जांच के लिए सामान्य सहमति देने की अधिसूचना जारी की थी, लेकिन केवल इस कदम से स्वतः जांच शुरू नहीं हो जाती.
उन्होंने कहा कि सीबीआई द्वारा मामले को लेने के लिए राज्य सरकार को औपचारिक रूप से शिकायत को सीबीआई निदेशक को भेजनी होती है, जिसमें जांच का अनुरोध किया जाता है. उन्होंने जोड़ा कि सरकार ने यह साबित करने के लिए कोई प्रमाण नहीं दिया है कि ऐसा कदम उठाया गया है.
एमएनएफ नेता ने आगे बताया कि 25 मार्च को पार्टी के प्रतिनिधियों ने इस मामले में हुई प्रगति जानने के लिए मुख्य सचिव से मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्हें राज्य सतर्कता विभाग के पास भेज दिया गया.
चावंगथु के अनुसार, सतर्कता सचिव के कार्यालय ने उन्हें आश्वासन दिया कि दस्तावेज 26 मार्च को उपलब्ध करा दिए जाएंगे, लेकिन पार्टी को अब तक वे प्राप्त नहीं हुए हैं.
वहीं, जेडपीएम के एक नेता ने कहा कि विपक्षी दलों से शिकायत मिलने के बाद सरकार पहले ही सीबीआई जांच के लिए सहमति दे चुकी है.
विवाद के केंद्र में स्थित भूमि आइजोल से लगभग 32 किलोमीटर दूर लेंगपुई हवाई अड्डा के पास है. इस भूमि का अधिग्रहण भारतीय वायु सेना द्वारा लड़ाकू विमानों के ठिकाने और ईंधन भरने की सुविधा स्थापित करने के लिए किया गया था.
विपक्षी दलों ने संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में जल्दबाजी को लेकर चिंता जताई है.
मिजो नेशनल फ्रंट और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अलग-अलग शिकायतें दर्ज कर 187.90 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं की सीबीआई जांच की मांग की है.
विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि मुआवजा प्रक्रिया के दौरान आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया. उनका दावा है कि दो ऐसे व्यक्तियों को अधिकांश मुआवजा दिया गया, जो मूल भूमि मालिक नहीं थे, जबकि वास्तविक जमीन मालिकों को बहुत कम या कोई मुआवजा नहीं मिला.
