इस बार देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह में ‘साहित्य की स्वायत्तता और राजनीति’ पर संवाद हुआ. कथाकार मृदुला गर्ग का मत था कि लेखक कहीं भी काम, नौकरी करता हो लिखते समय वह पूरी तरह से स्वायत्त होता है. आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि साहित्य के मूल तत्व करुणा और संवेदना होते हैं और यही वे तत्व हैं जिनकी राजनीति में कोई जगह नहीं होती. पत्रकार-बुद्धिजीवी अभय कुमार दुबे ने बताया कि साहित्य और कलाओं को काबू में करने के लिए साहित्य और कलाओं की प्रतिष्ठित संस्थाओं को कमज़ोर करने, पुरस्कारों आदि की प्रतिष्ठा गिराने की रणनीति अपनायी गई है.
मुझे लगा कि इस समय राजनीति की सर्वग्रासिता और सर्वनाशिता का समय और स्वयं भारत में इन दिनों सबसे उग्र, आक्रामक विचारधारात्मक समय है. आज जिस हिंदुत्व का वर्चस्व है वह एक राजनीतिक विचारधारा है. धर्म, सत्ता, बाज़ार, मीडिया, संवैधानिक संस्थाएं उसके द्वारा फैलाए जा रहे झूठों, नफ़रत, हिंसा, भेदभाव, अत्याचार की मानसिकता की चपेट में हैं.
इस राजनीतिक विचारधारा का लक्ष्य हिंदू वर्चस्व, लगातार ‘अन्यता’ की रचना और प्रवाद, असहमति का विरोध और दमन, ज्ञान से अपसरण, अज्ञान का महिमामंडन, सार्वजनिक संवाद की झगड़ालू और अभद्र बनाना, व्यापक शिक्षा को संकुचित-संकीर्ण बनाना है ताकि भारत एक आज्ञापालक समाज हो जाए. उसका किसी तरह के समावेश में, सांस्कृतिक या बौद्धिक, विश्वास नहीं.
ऐसे में साहित्य राजनीति की अवहेलना या उपेक्षा नहीं कर सकता. अंततः साहित्य नागरिक कर्म भी है और उसकी नागरिकता का यह नैतिक और सर्जनात्मक तकाजा है कि वह ऐसे समय में राजनीति के विरोध में खड़ा, मुखर और सक्रिय हो. सब तरह की राजनीति के नहीं पर इस विभाजक आतंककारी राजनीति के विरुद्ध.
राजनीति, सब तरह की राजनीति, सत्ताकामी होती है और साहित्य सत्ता स्थापित करने की कोई आकांक्षा नहीं पालता. यही और उसका अनिवार्य रूप से आत्मालोचक और प्रश्नवाचक स्वभाव उसे अधिकार देता है कि वह स्वायत्त होकर ऐसी राजनीति का प्रतिपक्ष बने.
हिंदी साहित्य के लिए यह समय गहरे संकट का है क्योंकि हिंदुत्व को सबसे अधिक लोकप्रिय समर्थन हिंदी अंचल से मिल रहा है और हिंदी समाज का एक बड़ा और निर्णायक अंग, जिसमें उसका विशाल मध्यवर्ग शामिल है, हिंदुत्व का समर्थक है.
यह दुखद रूप से सामने आ रहा है कि हिंदी साहित्य के बुनियादी मानवमूल्यों, उसकी प्रश्नवाचकता, उसकी दृष्टि-विचार-शैली की बहुलता, उसकी परपीड़ा से सहानुभूति, उसकी समता-न्याय के लिए संघर्षशीलता, उसकी समावेशिता आदि का व्यापक हिंदी समाज पर बहुत कम प्रभाव पड़ा है. यह समाज अपने तेजस्वी उत्तराधिकार से, असाधारण क्रूरता से, मुक्त हो चुका है.
साहित्य भी विचार की एक विधा है. वह मानवीय स्थिति, मानवीय नियति, समाज, आत्म और मानवीय संबंधों आदि पर अपनी तरह से सोचता है. ऐसे समय में उसकी स्वायत्तता तभी ज़ाहिर और सुरक्षित रह सकती है जब वह जो हो रहा है उसका विरोध-प्रतिरोध करे. उसे अपने ही समाज का विरोध, उसका प्रतिपक्ष होना पड़ेगा. यही उसकी नैतिक और नागरिक बाध्यता है.
प्रश्न उठता है कि क्या हिंदी साहित्य यह कर रहा है? जिन शक्तियों ने धर्म-बाज़ार-शिक्षा-मीडिया आदि सभी को अपना पालतू उपनिवेश बना लिया है क्या साहित्य उससे बचा हुआ है? क्या वह ऐसा प्रतिरोध है?
साहित्य की स्वायत्तता का सत्यापन इस प्रश्न के ‘हां’ में उत्तर से ही हो सकता है. चूंकि व्यापक राजनीति नीतिहीन और मूल्य-रिक्त हो गई है, शायद इस समय साहित्य को मूल्यबद्ध प्रतिराजनीति हो सकना चाहिए.
नया षड्यंत्र
जब से हिंदुत्व की शक्तियां सत्तारूढ़ हुई हैं, उनका लगभग हर नया क़दम किसी व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा लगता है. जो जंजाल पिछले लगभग सवा दशक में बहुत चतुराई, सूझ-बूझ से लगातार सामाजिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में व्यापक और सशक्त हुआ है उससे हर क़दम को षड्यंत्र मानना सामान्य विवेक है, सीधी समझदारी है.
स्त्रियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का अधिनियम संसद 2026 में सर्वसम्मति से पारित कर चुकी है. उसमें यह प्रावधान भी है अगली जनगणना और परिसीमन हो जाने के बाद यह अधिनियम लागू किया जाएगा. ख़बर यह है कि केंद्र सरकार अब चाह रही थी कि बिना चालू जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के पहले ही यह अधिनियम लागू कर दिया जाए और उसके लिए संविधान में आवश्यक संशोधन कर दिया जाए.
2023 में विपक्ष तो यह इसरार कर रहा था कि अधिनियम 2024 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले लागू कर दिया जाए. पर तब तो सत्ता पक्ष ने इसे नहीं माना था और जनगणना और परिसीमन से उसे जोड़ा था. यह चाहा जा रहा था कि उसकी मनचाही जनगणना के आधार पर सीटों में इज़ाफ़ा भी कर लिया जाए, अधिनियम को अभी लागू करने की हड़बड़ी है. अब संसद सत्र में लोकसभा में विपक्ष के एकजुट विरोध के कारण दो तिहाई बहुमत नहीं मिल सका और संविधान संशोधन विधेयक गिर गया.
ज़ाहिर है यह इन दिनों चल रहे विधानसभा चुनावों में स्त्रियों के पक्ष में उठाए कदम की तरह प्रचारित करने की योजना थी. विपक्ष इसका विरोध करता, तो उसे स्त्री-विरोधी बताया जाएगा. जो अब हो भी रहा है. दूसरे, परिसीमन के विधिवत् होने से पहले सीटें बढ़ाने का उपक्रम उसकी आवश्यकता को ही समाप्त कर देगा. तीसरे, इस बार जो जनगणना हो रही है, उसमें पहली बार जाति गणना भी होने जा रही है. उससे जो डेटा संकलित होगा उसका आरक्षण, विशेष प्रयत्न आदि अनेक क्षेत्रों में प्रभाव पड़ेगा. चाल इस जाति गणना को लगभग अप्रासंगिक करने की है. जाति गणना हो भी जाएऔर उसका कोई प्रभाव सीटें निर्धारित करने पर नहीं पड़ने दिया जाए.
इन सब पहलुओं पर प्रशासकों, राजनयिकों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों की एक सामूहिक बैठक में विचार किया गया और इसका विरोध करते हुए एक वक्तव्य भी जारी किया गया.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
