वॉइसेस इन द विंड: जहां भारत अनेक स्वरों में सांस लेता है

पुस्तक समीक्षा: नमिता गोखले और मालाश्री लाल द्वारा संपादित 'वॉइसेस इन द विंड' वही करती है, जो पहाड़ करते हैं. वह स्थिर दिखती है लेकिन उसके भीतर निरंतर गति है. वह कई दिशाओं से आए स्वरों को अपने भीतर समेटती है और फिर उन्हें आगे बढ़ा देती है.

(फोटो साभार: penguin.co.in)

भारत की ताक़त कभी एकरूपता में नहीं रही. वह कहीं और है. अनेकताओं को बिना भय के साध लेने में. यहां धर्म एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं. संस्कृतियां संवाद करती हैं. भाषाएं एक-दूसरे में बहती हैं. यह कोई अमूर्त विचार नहीं है. यह दैनिक जीवन का हिस्सा है. एक साथ कई रूपों में जीने की क्षमता.

राजनय से बहुत पहले ही, भारत ने अपनी कहानियों के माध्यम से सौम्य शक्ति (सॉफ्ट पावर) का अभ्यास किया. लोककथाएं चलीं. लोकगीत चले. वे इलाक़ों के पार गए. समुदायों के पार गए. उन्होंने एक साझा सांस्कृतिक स्मृति को रचा. लगातार. बिना किसी औपचारिक ढांचे के. वाचिक परंपरा के सहारे पीढ़ियों के साथ उनका हस्तांतरण होता रहा जिसमें प्रकृति और उसके तत्वों की अपनी विशिष्ट भूमिका रही.

हिमालय भी इस परंपरा के केंद्र में स्थित एक ऐसा भू-दृश्य है जहां मौन और ध्वनि साथ-साथ रहते हैं. जहां दूरी और निकटता का अर्थ बदल जाता है. यहां कहानियां हवा के साथ चलती हैं. इसकी चोटियों और विभिन्न पर्वत शृंखलाओं के बीच से गुजरती हैं. घाटियों में उतरती हैं. फिर किसी और दिशा में बढ़ जाती हैं.

इंडिया वाइकिंग से प्रकाशित ‘वॉइसेस इन द विंड’ में संपादक द्वय नमिता गोखले और मालाश्री लाल इसी व्यापक मौखिक परंपरा को एक साथ लाती हैं. यह सिर्फ़ संकलन नहीं है. यह सुनने की एक संवेदनशील प्रक्रिया है. एक ऐसी कोशिश, जो बिखरी हुई आवाज़ों को बिना दबाए, एक साझा स्थान देती है.

एक जीवित अभिलेख

किताब में संकलित कहानियां कश्मीर और लद्दाख से शुरू होती हुई, हिमाचल और उत्तराखंड से गुजरती हैं और  फिर पूर्वोत्तर के बहुस्तरीय संसार में प्रवेश करती है. यह विस्तार सिर्फ़ भौगोलिकता का नहीं बल्कि अनुभवों का है. अलग-अलग जीवन-पद्धतियों का. अलग-अलग स्मृतियों का.

इन कथाओं को जो चीज़ जोड़ती है, वह उनका साझा लयबोध है. वे कहीं भी हों, उनकी गति पहचान में आती है. ये कहानियां अलाव के पास कही गईं. आंगनों में. यात्राओं के दौरान. श्रम के बीच के विरामों में. वे अपने भीतर वही बनावट लेकर आती हैं. उनमें ठहराव है. एक सांस है. स्वर का उतार-चढ़ाव है. जैसे कोई सामने बैठकर बोल रहा हो. और इसलिए यह कहानियां साहित्य और जन श्रुतियों की उस वाचिकता से जाकर जुड़ती हैं जिसे अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए किसी लिखित शिलालेख की आवश्यकता नहीं होती.

इन कहानियों में वर्णित संसार खुला हुआ है. यहां नदियां गाती हैं. पशु बोलते हैं. देवता मनुष्यों के बीच चलते हैं. बिना किसी आडंबर के. बिना किसी चमत्कारिक दबाव के. यह सब स्वाभाविक है. यहां छलिया पात्र व्यवस्था को चुनौती देते हैं. साधारण लोग कठिन परिस्थितियों से जूझते हैं. यहां प्रेम की भी कथाएं हैं. वियोग भी है. पुनर्मिलन भी. यह कहानियां एक ऐसा समानांतर संसार रचती हैं जहां मनुष्येतर लोक भी उतनाअ ही उपस्थित है. जहां कौवे आज्ञा पालन करते हैं. एक सर्प-राज अदृश्य रहकर भी प्रभावी है.

और इस लोक को पूर्ण बनाने में स्त्रियों की अपनी भूमिका है. वह इन कथाओं के केंद्र में बार-बार लौटती हैं. वे निष्क्रिय नहीं हैं. वे रास्ते बनाती हैं. प्रतिरोध करती हैं. स्थितियों को बदलती हैं. अक्सर बिना शोर के लेकिन एक स्पष्ट दृढ़ता के साथ. इन कथाओं में नैतिकता परिभाषित और एकरेखीय नहीं है. अच्छा और बुरा स्थिर नहीं है. पात्र बदलते हैं. परिस्थितियां बदलती हैं. निर्णय बदलते हैं. यहां जीवित रहने के लिए चतुराई उतनी ही ज़रूरी है जितनी ताक़त. ये कथाएं अस्पष्टता को जगह देती हैं. विरोधाभास को स्वीकार करती हैं. अनिश्चितता को मिटाती नहीं, उसे अपने भीतर समेटती हैं.

लोककथा और लोक-वृत्त

भारत का लोक-वृत्त औपचारिक संस्थाओं के कारण नहीं बल्कि कथा-कथन के माध्यम से बना है. यह साझा सुनने का परिणाम है. यह आवागमन का परिणाम है. एक कथा का दूसरे तक पहुंचना. फिर उसका दोहराया जाना. फिर उसमें थोड़ा-बहुत बदल जाना. और इस प्रकार एक मिश्रित संवेदनशीलता का निर्माण जो लोक वृत्त की एक विशिष्ट पहचान है.

वॉइसेस इन द विंड की कथाएं जाति, भाषा और भौगोलिकता के परे जाकर एक सार्वभौमिक पहचान रचती हैं, जिसमें एकरूपता का आग्रह नहीं होता. अरुणाचल की कथा हिमाचल में सुनी हुई लग सकती है. कश्मीर की कोई छवि उत्तराखंड में पहचानी जा सकती है.

यह समानता किसी योजना का परिणाम नहीं है. यह समय के साथ, स्मृति के सहारे बनती है. यहीं सॉफ्ट पावर का वास्तविक अर्थ सामने आता है. एक ऐसी सांस्कृतिक प्रक्रिया जो पहचान की विविधता के बावजूद एक अंतर्निहित गठजोड़ में सभ्यताओं को बांधती हैं. इसीलिए ये कहानियां जोड़ती हैं, बिना भिन्नताओं को मिटाए. वे विविधता को बनाए रखते हुए एक साझा कल्पनाशील धरातल तैयार करती हैं. एक ऐसा लोक-वृत्त, जहां सहमति अनिवार्य नहीं है, लेकिन पहचाओं का सह-अस्तित्व संभव है.

स्मृति और उसका क्षय

लोककथाएं किसी बंधे-बंधाए लिपि की अनुपस्थिति में कुछ अमूर्त आधारों पर जीवित रहती हैं. वे आवाज़ पर निर्भर हैं. स्मरण पर. निरंतरता पर. जो नहीं दोहराया जाता, वह धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है.  इस अर्थ में वॉइसेस इन द विंड वस्तुतः एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है. यह कथाओं को इकट्ठा करती है. उन्हें संरक्षित करती है. लेकिन उन्हें स्थिर नहीं बनाती.

हर कहानी अपने भीतर स्थानीय ज्ञान लेकर चलती है. पारिस्थितिकी की समझ, जीवन के तरीकों और संबंधों की जटिलता को आधुनिकीकरण और शहरीकरण के प्रक्रिया में संरक्षित करती हैं.  यहां नियम हैं, लेकिन वे घोषित नहीं हैं. वे भीतर समाए हुए हैं. प्रकृति के साथ कैसे संतुलन रखना है और अनिश्चितता के बीच कैसे निर्णय लेना है, यह सब कथाओं में गुंथे हुए हैं.

इन कथाओं को पुस्तकाकर रूप में प्रकाशित करके संपादकों ने उनकी यात्रा को आगे बढ़ाया है. अब एक दूरस्थ गांव की कथा किसी और शहर में पढ़ी जा सकती है. किसी और भाषा में समझी जा सकती है. किताब एक अभिलेख बनती है. लेकिन साथ ही एक मार्ग भी. वह इन कथाओं को नए संदर्भों में ले जाती है.

संपादकीय श्रम

नमिता गोखले और मालाश्री लाल इस काम में एक संतुलन बनाए रखती हैं. वे अति-संपादन से बचती हैं. वे भिन्नताओं को समतल नहीं करतीं. कहानियों को उनके अपने स्वर में रहने देती हैं. यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि मौखिक परंपरा का मूल स्वर इसी विविधता में है. इस काम के लिए धैर्य चाहिए. अलग-अलग क्षेत्रों में जाना. विभिन्न भाषाओं और बोलियों को सुनना. बिखरे हुए स्रोतों को जोड़ना.

यह सिर्फ़ संकलन नहीं है. यह एक कठिन सांस्कृतिक श्रम है और एक बड़ी जिम्मेदारी भी. वे कथाओं पर अपना नियंत्रण नहीं थोपतीं. वे उन्हें खुला रहने देती हैं. हर क्षेत्र अपनी लय में बोलता है. हर कथा अपनी बनावट में रहती है. यही इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति है. नलिनाक्ष्य तालुकदार के चित्र भी इसी संवेदना के साथ आते हैं. वे व्याख्या नहीं करते बल्कि साथ चलते हैं. रेखाएं शांत हैं. उनमें संयम है. वे कथा के लिए जगह बनाते हैं, उसे भरते नहीं.

अंत की ओर

यह किताब सिर्फ़ कथाओं का संकलन नहीं है बल्कि एक स्मृति-स्थल है. एक ऐसा स्थान, जहां भारत की बहुस्तरीयता बिना किसी दावे या बिना किसी आग्रह के स्पष्ट दिखाई देती है. कहानियां वहां जाती हैं, जहां सीमाएं नहीं जा पातीं. वे एक ऐसे संवाद की रचना करती हैं, जो निरंतर चलता रहता है. अंततः वॉइसेस इन द विंड वही करती है, जो पहाड़ करते हैं. वह स्थिर दिखती है लेकिन उसके भीतर निरंतर गति है. वह कई दिशाओं से आए स्वरों को अपने भीतर समेटती है और फिर उन्हें आगे बढ़ा देती है.

(आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर लिखते हैं.)