ट्रैफिक जाम से जागरूकता तक: मज़दूरों की आवाज़ और हमारा लोकतंत्र

व्यवधान के महिमामंडन के पक्ष में न होते हुए यह मानना होगा कि राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित करे. लेकिन समायोजन का बोझ केवल उन पर नहीं डाला जा सकता जो पहले से ही हाशिए पर हैं. न ही सार्वजनिक जीवन में प्रभुत्व वर्गों की परेशानी-जन्य अधीरता को वास्तविक शिकायतों को ख़ारिज करने का आधार बनाया जा सकता है.

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'श्रमिक साथियों के आग्रह को सुनने के लिए एक ट्रैफिक जाम की आवश्यकता पड़ती है, तो शायद यह असुविधा संयोग नहीं, बल्कि एक सीख है. यह याद दिलाती है कि हमारी सहज दिनचर्या का सुचारू संचालन अक्सर दूसरों के अदृश्य श्रम पर टिका होता है.' (फोटो: पीटीआई)

दो सप्ताह पहले में नोएडा में हुए श्रमिक वर्ग के विरोध-प्रदर्शन, जिनका केंद्र बिंदु एनसीआर में वेतन समानता की एक सीधी-सादी मांग थी, सार्वजनिक चेतना में तब तक लगभग दर्ज ही नहीं हुए जब तक कि एक सोमवार की सुबह ट्रैफिक रेंगने नहीं लगा. अनेक यात्रियों के लिए यह प्रदर्शन किसी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक अवांछित व्यवधान की तरह सामने आया.

सहज प्रतिक्रिया यह नहीं थी कि मजदूर सड़कों पर क्यों उतरे, बल्कि यह थी- अभी क्यों, यहीं क्यों, और मेरी यात्रा क्यों बाधित हो. ये प्रतिक्रियाएं हमारी सार्वजनिक संस्कृति के बारे में एक असहज सच उजागर करती हैं: हम श्रम से लाभ उठाने के आदी हो चुके हैं, लेकिन उन जीवनों के प्रति लगभग उदासीन हैं जो इस व्यवस्था को थामे हुए हैं.

शहरी भारत, वस्तुतः, श्रमिक वर्ग की अदृश्य संरचना पर टिका है जहां निर्माण मजदूर, सफाई कर्मचारी, डिलीवरी कर्मी, फैक्ट्री श्रमिक, सुरक्षा गार्ड, ये कोई परिधीय पात्र नहीं, बल्कि वही लोग हैं जो महानगरीय जीवन को संभव और शायद जीने लायक बनाते हैं. फिर भी, उनकी चिंताएं मुख्यधारा की चेतना में अक्सर तभी प्रवेश करती हैं जब वे मध्यवर्गीय जीवन-सुविधा की लय को बाधित करती हैं.

ध्यान का यह असंतुलन आकस्मिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है जिसे हम ख़ारिज करना चाहते हैं.

राजनीतिक चिंतकों ने लंबे समय से ऐसे अलगाव के प्रति आगाह किया है. कार्ल मार्क्स ने बताया था कि पूंजीवादी आधुनिकता केवल श्रम के उत्पाद से ही नहीं, बल्कि मनुष्यों को एक-दूसरे से भी अलग-थलग कर देती है. समकालीन शहरों में यह अलगाव भौतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों रूपों में दिखाई देता है. जो श्रमिक ऊंची इमारत बनाता है, वह उसमें रहने का खर्च नहीं उठा सकता; जो आपके लिए भोजन पहुंचाता है, वह लेन-देन से परे लगभग अदृश्य ही रहता है. परिणामस्वरूप एक ऐसा विखंडित सामाजिक संसार बनता है, जहां परस्पर निर्भरता होने के बावजूद आपसी संवेदना विकसित नहीं हो पाती.

इसी तरह हन्ना एरेंट (Hannah Arendt) ने ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ की महत्ता पर बल दिया था और बताया था कि ये एक एक ऐसा स्थान है जहां व्यक्ति एक-दूसरे के सामने बराबरी के रूप में उपस्थित होते हैं, संवाद और क्रिया में भाग लेते हैं. जब श्रमिक वर्ग केवल एक ‘लॉजिस्टिक समस्या’- जैसे ट्रैफिक जाम, देरी या व्यवधान-के रूप में दिखाई देता है, तो उन्हें इस सार्वजनिक क्षेत्र से प्रभावी रूप से बाहर कर दिया जाता है. उनके राजनीतिक दावे असुविधा में बदल दिए जाते हैं, और उनकी आवाज़ें उन लोगों की अधीरता में दब जाती हैं जो शहर में अधिक तेजी से आगे बढ़ते हैं.

इस प्रकार, नोएडा के ये विरोध-प्रदर्शन केवल एक आर्थिक असमानता की शिकायत भर नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक कमी को उजागर करते हैं.

मूल प्रश्न यह है: ‘जनता’ में कौन शामिल है? यदि इस परिभाषा से वे लोग बाहर हैं जिनका श्रम शहर को जीवित रखता है, तो हमारा लोकतंत्र का बोध पहले से ही सीमित और कमजोर है. भारतीय संविधान, इसके विपरीत, कहीं अधिक व्यापक दृष्टि प्रस्तुत करता है. अनुच्छेद 19(1)(बी) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है. यह कोई सजावटी स्वतंत्रता नहीं, बल्कि यह मान्यता है कि विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं.

जब मजदूर उचित वेतन की मांग के लिए एकत्र होते हैं, तो वे लोकतंत्र को बाधित नहीं कर रहे होते- वे उसका अभ्यास कर रहे होते हैं, बल्कि उसे समृद्ध बना रहे होते हैं.

इसके अतिरिक्त, राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भी एक नैतिक ढांचा प्रस्तुत करते हैं जो स्पष्ट तौर पर  मुद्दे से जुड़ता है. अनुच्छेद 39(ड) ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ की बात करता है, जिसे न्यायपालिका ने समय के साथ व्यापक रूप में वेतन असमानताओं पर लागू किया है.

अनुच्छेद 43 राज्य से अपेक्षा करता है कि वह श्रमिकों के लिए जीवन-निर्वाह योग्य वेतन और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां सुनिश्चित करे. हालांकि ये प्रावधान प्रत्यक्ष रूप से न्यायालय में लागू नहीं किए जा सकते, फिर भी शासन के मार्गदर्शन के लिए ये मूलभूत हैं.

एनसीआर जैसे एकीकृत आर्थिक क्षेत्र में वेतन समानता की मांग कोई अतिवादी आग्रह नहीं, बल्कि एक संवैधानिक आकांक्षा है. उच्चतम न्यायालय ने भी समय-समय पर इन मूल्यों को पुष्ट किया है. अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) की व्याख्या करते हुए न्यायालय ने माना है कि गरिमा, उचित वेतन और मानवीय कार्य-परिस्थितियां एक सार्थक जीवन के अनिवार्य तत्व हैं.

जब मजदूर वेतन समानता के लिए संघर्ष करते हैं, तो वे केवल आर्थिक तर्क नहीं दे रहे होते, बल्कि संवैधानिक नैतिकता का आह्वान कर रहे होते हैं. फिर भी, अधिकार और उनकी सामाजिक स्वीकृति के बीच एक तनाव बना रहता है. विरोध का अधिकार, भले ही संवैधानिक रूप से सुनिश्चित हो, अक्सर शहरी व्यवस्था के निर्बाध प्रवाह की मांग से टकराता है.

ट्रैफिक जाम वह तात्कालिक कसौटी बन जाता है, जिसके आधार पर किसी विरोध की वैधता को आंका जाता है. यह दृष्टि संकीर्ण और अंततः आत्मघाती है, क्योंकि यदि केवल वही विरोध स्वीकार्य हो जो किसी को असुविधा न पहुंचाए, तो अधिकार का वास्तविक अर्थ ही समाप्त हो जाता है. प्रभावी असहमति, स्वभावतः, यथास्थिति को झकझोरती है.

यहां मैं स्पष्ट करना चाहूंगा मैं किसी भी प्रकार से व्यवधान के महिमामंडन के पक्ष में नहीं हूं लेकिन हमें मानना होगा कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह विभिन्न हितों के बीच संतुलन स्थापित करे. लेकिन समायोजन का बोझ केवल उन पर नहीं डाला जा सकता जो पहले से ही हाशिए पर हैं. न ही सार्वजनिक जीवन में प्रभुत्व वर्गों की परेशानी-जन्य अधीरता को वास्तविक शिकायतों को खारिज करने का आधार बनाया जा सकता है.

आज के परिवेश में सबसे अधिक आवश्यक है कि इस दृष्टिकोण में संपूर्ण बदलाव किया जाए और  श्रमिक वर्ग को किसी बाहरी श्रेणी के रूप में नहीं, बल्कि हमारे साझा सामाजिक ताने-बाने के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए. ‘हम’ और ‘वे’ के बीच की दूरी उतनी बड़ी नहीं है जितनी प्रतीत होती है या कराई जाती है. आर्थिक असुरक्षा कोई स्थायी पहचान नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसमें प्रतिकूल परिस्थितियों में हममे से कोई भी फिसल सकता है. इस नाजुकता को समझना एक गहरी सामाजिक एकजुटता की नींव बन सकता है.

इसके साथ ही, सार्वजनिक विमर्श का पुनर्संयोजन भी आवश्यक है. मीडिया की प्रवृत्ति अक्सर व्यवधान के दृश्य पर अधिक केंद्रित रहती है, जबकि मांगों के सार को हाशिए पर डाल देती है. सुर्खियां ट्रैफिक जाम पर बनती हैं, वेतन असमानता पर नहीं. इस प्रकार की पूर्वाग्रह से ग्रसित फ्रेमिंग जनमत को प्रभावित करती है और यह धारणा मजबूत करती है कि समस्या का केंद्र असुविधा है. एक अधिक जिम्मेदार विमर्श उन कारणों को सामने लाएगा जिनके चलते लोग सड़कों पर उतरते हैं, ताकि नागरिक मूल अन्याय से जुड़ सकें.

संस्थागत जवाबदेही पर पुनर्विचार भी उतना ही महत्वपूर्ण है. मजदूरों के लिए विरोध-प्रदर्शन पहला विकल्प नहीं होना चाहिए और अक्सर होता भी नहीं है. लेकिन जब प्रभावी शिकायत-निवारण तंत्र, समयबद्ध संवाद और पारदर्शी नीतियां ऐसी स्थितियों को पहले ही सुलझा सकती हैं और संस्थाएं सुनने में विफल होती हैं, तब सड़क ही हाशिए के लोगों का एकमात्र मंच बन जाती है.

इस संदर्भ में संवैधानिक मूल्यों के साथ गहरा जुड़ाव भी आवश्यक है. संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक नैतिक दिशा-सूचक भी है. समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रोजमर्रा के जीवन में सक्रिय रूप से जीना होगा. इसका अर्थ यह स्वीकार करना भी है कि किसी विरोध से उत्पन्न असुविधा, एक बड़े अन्याय को संबोधित करने की छोटी-सी कीमत हो सकती है. क्या हमें इस कीमत को चुकाने को तैयार नहीं रहना चाहिए?

उस सोमवार की सुबह का नोएडा ट्रैफिक जाम, एक अर्थ में, ‘दृश्यता का क्षण’ था. उसने दिनचर्या को तोड़ा, ध्यान आकर्षित किया और उस संघर्ष को सामने लाया जो लंबे समय से अदृश्य था. प्रश्न यह है कि क्या यह क्षण आत्ममंथन को जन्म देगा या केवल झुंझलाहट में बदलकर रह जाएगा. क्या सड़कें साफ होते ही हम अपनी सुरक्षित दिनचर्या में लौट जाएंगे, या उन जीवनों के प्रति एक गहरी जागरूकता साथ लेकर आगे बढ़ेंगे जो हमारे जीवन से चुपचाप, असमान रूप से जुड़ते हैं?

आइए, एक बार फिर से एक दूसरे से कहे कि लोकतंत्र मौन में नहीं फलता-फूलता. वह परस्पर दावों के टकराव में, सुनने की इच्छा में और दूसरों के संघर्षों में स्वयं को पहचानने की नैतिक क्षमता में विकसित होता है. जब श्रमिक वर्ग सड़कों पर उतरता है, तो वह केवल वेतन की मांग नहीं करता; वह गरिमा की घोषणा करता है- देखे जाने, सुने जाने और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदार के रूप में स्वीकार किए जाने का आग्रह करता है.

यदि हमारे श्रमिक साथियों के आग्रह को सुनने के लिए एक ट्रैफिक जाम की आवश्यकता पड़ती है, तो शायद यह असुविधा संयोग नहीं, बल्कि एक सीख है. यह याद दिलाती है कि हमारी सहज दिनचर्या का सुचारू संचालन अक्सर दूसरों के अदृश्य श्रम पर टिका होता है, और जिन व्यवधानों से हम चिढ़ते हैं, वे दरअसल हमें अपने सामाजिक-आर्थिक ढांचे की गहरी असमानताओं का सामना करने के लिए आमंत्रित करते हैं.

असली परीक्षा यह है कि हम ऐसे क्षणों को क्षणिक परेशानी मानकर भुला देते हैं या उन्हें नैतिक संकेत के रूप में ग्रहण करते हैं, जो हमें यह कहने और सच में मानने की दिशा में प्रेरित करें कि हम इन असमानताओं को दूर करने के लिए साथ खड़े हैं.

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)