प्रिय झाल-मूढ़ी,
कितने गर्व और सम्मान की बात है कि कल दोपहर बाद से तुम राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गई हो. यह वही देश है जहां अक्सर मुद्दे अपनी बारी का इंतज़ार करते-करते बूढ़े हो जाते हैं, पर तुमने तो आते ही लाइन तोड़ दी, सीधे बहस और विमर्श के केंद्र में. अमेरिका-इजरायल-ईरान जैसे जटिल भू-राजनीतिक समीकरण भी तुम्हारे सामने फीके पड़ गए; और देश के मजदूरों के बीच पसरी हताशा, वह तो जैसे खबरों की दुनिया से ‘डिलीट’ ही कर दी गई.
तुम्हें यह जानकर भी थोड़ा अचरज होगा और शायद थोड़ा संकोच भी कि तुम्हारी इस अचानक मिली प्रसिद्धि का श्रेय तुम्हारे स्वाद, तुम्हारी सादगी या तुम्हारी सांस्कृतिक विरासत को नहीं, बल्कि उस कैमरे को जाता है जो तुम्हें ‘फ्रेम’ में फिट करके दिखाता है. आजकल चीज़ें अपने होने से कम और दिखने से ज़्यादा जानी जाती हैं. और तुम तो ठहरी ठेले पर बिकने वाली, कागज़ के ठोंगे में लिपटी हुई चीज़, तुम्हारा ‘ब्रांड मैनेजर’ तो कोई था ही नहीं, इसलिए तुम्हें यह मौका मिलने में इतनी देर लग गई.
अब जब तुम्हारा ज़िक्र हो ही रहा है, तो यह बताना भी ज़रूरी है कि तुम सिर्फ एक नाश्ता नहीं हो. तुम अविभाजित बंगाल के हर हिस्से, मसलन बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा की साझी स्मृति हो. तुम रेलवे प्लेटफॉर्म की भागदौड़ में भी हो और शाम के बाज़ार की फुर्सत में भी. तुम्हारी खुशबू में सरसों के तेल की तीखी सच्चाई है, और तुम्हारे स्वाद में हरी मिर्च की वह बेबाकी, और हां बारीक प्याज़ के छोटे-छोटे टुकड़े जो बिना लाग-लपेट के अपना असर छोड़ते हैं. तुम किसी एयर-कंडीशंड कैफ़े की मेन्यू कार्ड में नहीं मिलती और शायद यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है.
लेकिन, प्रिय झाल-मूढ़ी, तुम्हारी यह ताकत ही तुम्हारी ‘कमज़ोरी’ भी बन जाती है, कम से कम उन लोगों के लिए जो संस्कृति को सिर्फ बड़े-बड़े नामों, संगमरमर के स्मारकों और ‘विरासत’ के भव्य संस्करणों में ढूंढते हैं. पिछली बार जब व्यक्ति-विशेष ने संस्कृति की खोज की थी, तो वह रवीन्द्रनाथ टैगोर तक जाकर रुक गई थी. अब यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है पर समस्या यह है कि वहां से आगे बढ़ने की ज़रूरत भी कभी महसूस नहीं हुई.
तुम्हारे जैसे साधारण, रोज़मर्रा के अनुभवों में जो गहराई छिपी होती है, वह कैमरे के सामने उतनी ‘ग्लैमरस’ नहीं लगती. तुम्हें खाने के लिए जिस सहजता की ज़रूरत होती है, भीड़ में खड़े होकर, धूल-धक्कड़ के बीच, बिना किसी औपचारिकता के जो शायद उस सजे-सजाए, कैमरा-युक्त परिवेश में संभव ही नहीं है. वहां स्वाद भी ‘स्क्रिप्टेड’ होता है और अनुभव भी ‘डायरेक्टेड’.
तुम्हें यह भी जानना चाहिए कि तुम्हारी यह अचानक मिली प्रसिद्धि स्थायी नहीं है. जैसे ही कोई नया मुद्दा, नया चेहरा, या कोई और ‘फोटो-ऑप’ सामने आएगा, तुम फिर से अपने ठेले पर लौट जाओगी जहां तुम्हें किसी राष्ट्रीय बहस की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वहां तुम्हें पहचानने वाले लोग पहले से मौजूद हैं.
और शायद यही तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है कि तुम बिना किसी प्रचार, बिना किसी अभियान, और बिना किसी ‘नैरेटिव’ के भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी रहती हो. तुम्हें किसी भाषण की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हारा अस्तित्व ही अपने आप में एक कथन है, सादगी का, साझेपन का, और उस जीवन-दृष्टि का जो छोटे-छोटे सुखों में भी गहरा अर्थ खोज लेती है.
तो, प्रिय झाल-मूढ़ी, इस अचानक मिले ‘राष्ट्रीय सम्मान’ का आनंद लो पर उससे भ्रमित मत हो जाना. इस देसी भक्ति-विशेष की कृपा से ऐसी ‘अल्पकालिक चर्चाएं’ हमने पहले भी देखी हैं, जहां मुद्दे नहीं, मौके चमकते हैं; और सरोकार नहीं, साउंडबाइट्स टिकते हैं.
तुम्हारी असली जगह वही है जहां लोग तुम्हें बिना किसी कैमरे के, बिना किसी घोषणा के, बस अपने स्वाद और अपने समय के साथ स्वीकार करते हैं. वहां न कोई स्क्रिप्ट होती है, न कोई ‘कट’ और ‘रीटेक’. वहां तुम्हारा हर दाना उतना ही सच्चा होता है जितनी उस हाथ की मेहनत, जिसने दिनभर की थकान के बीच तुम्हें खरीदा है.
इसलिए, इस क्षणिक रोशनी से आंखें चौंधियाने मत देना. तुम्हारा मूल्य उस रोशनी में नहीं है जो अचानक तुम पर डाली गई है, बल्कि उस स्थायी उजाले में है जो तुम हर रोज़ अनगिनत ज़िंदगियों में चुपचाप जोड़ती हो.
तुम्हारा एक पुराना ग्राहक,
जो अब भी ठेले पर खड़ी ज़िंदगी को कैमरे से ज़्यादा सच्चा मानता है
(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)
(मूल रूप से एक्स पर प्रकाशित)
