जुवि शर्मा की ‘अबोली की डायरी‘ एक पुस्तक नहीं है, यह केवल और केवल दुख है. दुख के काले रेशों से बुना गया एक जाल है या एक लेप है. इसकी भाषा में शब्द नहीं हैं, दुख के रेंगते हुए कीड़े हैं. इन कीड़ों ने शब्दों की जगह ले ली है और एक नई भाषा को जन्म दे दिया है. शायद यही कारण है कि यह भाषा वहां तक जा पहुंचती है जहां पहुंचना साधारण भाषा के बस की बात नहीं है.
अस्तित्व के गहरे अंधेरों में जैसे कोई किसी काले दलदल में आहिस्ता-आहिस्ता उतरता है या धंसता जाता है. ‘अबोली की डायरी’ एक स्त्री का अंधेरा है, मगर जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, यह केवल एक दुखी आत्मा का अंधेरा बनता हुआ नज़र आने लगता है. अंतर केवल गोश्त, हड्डी और खाल के अलग-अलग सांचों का है जो इत्तेफाक से या मजबूरी से दो अलग-अलग शरीर कहलाते हैं, जैसे एक ही पृथ्वी में दो अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र, अलग-अलग आबो-हवा, अलग-अलग संस्कृति और अलग-अलग अपेक्षाएं.
मगर नीचे, बहुत नीचे वही पाताल, वही मिट्टी, वही मिट्टी का दुख-दुख जो अंदर से एक है पर मुखौटे अलग हैं.
यह केवल इंसान होने का दुख है पर दुख का यह ताना-बाना स्वयं इंसानों ने ही बनाया है. समाज मनुष्य की अच्छी कृति है मगर सामाजिक और नैतिक नियम कब डायनासोर में बदल जाते हैं इसका पता समाज को कभी लगता ही नहीं. सिस्टम चाहे वह कुछ हो, किसी का हो, कब अपने ही पंजों को खा जाएगा उसे पता ही नहीं चलता. जैसे शरीर में कब रक्त के कण अपनी संख्या बढ़ाकर शरीर के दूसरे अंशों को खाने लगते हैं और इस कैंसर का पता ही नहीं चलता, जब पता चलता है तो शरीर ही नहीं रहता. किसी भी बचाने के लिए अपने अंशों की कुर्बानी वस्ता करना एक जुल्म, एक अत्याचार ही है, मगर आदिम समाज से यही होता आ रहा है.
यह एक प्रकार से स्वयं को स्वयं के द्वारा निगल जाने के बराबर है. यह स्वयं, यह ‘ईगो’, यह ‘मैं’, काले अंधेरे में प्रकाश की खोज करेगा और यह खोज अंततः उसे अवसाद (डिप्रेशन) और पागलपन तक ले जाएगी और फिर आत्महत्या ही वह आखिरी नींद की गोली बन जाएगी जिसे उसे खाना है.
मगर अबोली नींद की यह आखिरी गोली नहीं खाती है. क्योंकि यह किताब स्त्री के विशेष संदर्भ में लिखी गई है, इसलिए नि:संदेह यह हमारे समाज में स्त्री की मानसिक और शारीरिक परिस्थिति का एक भयानक ब्यौरा पेश करती है, पर इसके बावजूद यह मनुष्य के अस्तित्व और उसकी बिखरती हुई, टुकड़े-टुकड़े होती हुई चेतना का एक रुदन आलाप भी है. जुवि शर्मा ने इसे जिस बेबाक अंदाज़ और ईमानदारी के साथ लिखा है, उसकी मिसाल हिंदी साहित्य में शायद ही मिल पाए.
क्योंकि यह उस ‘फैशनेबल फेमिनिज्म ट्रेंड’ को भी नकारती है जिसका आजकल बहुत चर्चा होती है. दुख, अपराधबोध, दुःस्वप्न, भ्रम, वहम और पागलपन सब को उतनी सरलता और सहजता के साथ एक ही सुर, एक ही लहर में लिखना जिस तरह कोई कविता लिखी जाती है, आसान काम नहीं था.
यह किताब गद्य में लिखी एक लंबी मगर सच्ची कविता की तरह है. एक ऐसी कविता जिसमें काव्य गुण तो हैं पर यह काव्य गुण कल्पना तथा संवेदनाओं से अधिक अनुभव और यथार्थ पर आरोपित कर दिए गए हैं. मिशेल फूको ने लिखा है कि समाज के अत्याचार और शोषण से बचने के लिए लोगों को चाहिए कि वह अपने जीवन पर आर्ट या कला का कंट्रोल बरकरार रखें. वह कहते हैं कि क्या हर व्यक्ति का अपना जीवन ही कोई कलाकृति क्यों नहीं बन सकती? हमारा जीवन ही एक आर्ट की वस्तु क्यों नहीं है?
‘अबोली की डायरी’ एक ऐसी ही कलाकृति है जिसमें जुवि शर्मा का अपना जीवन ही एक पवित्र कला की वस्तु बन गया है. ऐसी किताबें रोज़-रोज़ नहीं लिखी जातीं.
(ख़ालिद जावेद उर्दू के प्रतिष्ठित उपन्यासकार हैं.)
