जामिया कुलपति ने कहा- सभी भारतीयों में ‘महादेव का डीएनए’ है, छात्र संगठनों ने विरोध जताया

आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर जामिया में आयोजित कार्यक्रम के एक कथित वीडियो में कुलपति मज़हर आसिफ़ यह कहते सुनाई देते हैं कि हर भारतीय में ‘महादेव का डीएनए’ है. छात्र संगठनों ने इस टिप्पणी को अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बताते हुए कड़ा विरोध जताया है.

'युवा कुंभ' कार्यक्रम का पोस्टर (बाएं) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति मज़हर आसिफ़ (दाएं).

नई दिल्ली: जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति मज़हर आसिफ़ के एक कथित बयान को लेकर विवाद देखने को मिला है. बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम के कथित वीडियो में कुलपति यह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि परंपरा और संस्कृति में भिन्नता के बावजूद, यहां हर कोई भारतीय है क्योंकि सभी में महादेव का डीएनए समाहित है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर साझा किए गए 30 सेकंड के एक वीडियो में, जिसकी अख़बार स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है, में कुलपति कहते हुए दिखाई देते हैं, ‘यहां इतने सारे लोग बैठे हैं जिनकी परंपराएं अलग-अलग हैं. मुझे नहीं लगता कि सबकी मातृभाषा एक ही है. मुझे नहीं लगता कि सबकी संस्कृति एक ही है. उनका क्षेत्र और धर्म भी अलग-अलग होगा. इसके बावजूद हम भारतीय हैं क्योंकि हमारे डीएनए में महादेव का डीएनए शामिल है.’

उल्लेखनीय है कि जिस कार्यक्रम का वीडियो कथित तौर पर सामने आया है, वह मंगलवार को विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संकाय में आरएसएस की शताब्दी वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था.

इस कार्यक्रम और कुलपति की टिप्पणी का छात्र संगठनों द्वारा विरोध भी किया गया, जिन्होंने आरोप लगाया है कि यह शिक्षण संस्थानों के ‘भगवाकरण’ का प्रतीक है.

जामिया की स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) इकाई ने इस बयान का कड़ा विरोध करते हुए इसे अवैज्ञानिक और अकादमिक मानकों के लिए प्रसिद्ध केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए अनुचित बताया है.

संगठन ने एक बयान में कहा, ‘हम कुलपति मज़हर आसिफ़ के उस बयान की निंदा करते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘हम सब में महादेव का डीएनए है’, यह बयान जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिया गया, जो अपनी अकादमिक और वैज्ञानिक उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है.’

एसएफआई ने यह भी आरोप लगाया कि इस टिप्पणी के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कार्रवाई की गई है.

वहीं, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) ने भी जामिया के कुलपति की इस टिप्पणी को अलोकतांत्रिक, अवैज्ञानिक और बहुसंख्यकवादी बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है.

संगठन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति द्वारा विविधता के बावजूद लोगों की भारतीयता को ‘महादेव के डीएनए’ से परिभाषित करने की बात जितनी अवैज्ञानिक है, उतनी ही मौलिक रूप से अलोकतांत्रिक भी है.

इसमें आगे कहा गया है कि भारतीय पहचान को इस तरह की संकीर्ण, सांप्रदायिक परिभाषाओं के अधीन करना उस फासीवादी परियोजना के अनुरूप है जिसे कुलपति ने बाद में ‘सनातनवाद’ कहा है.

संगठन के अनुसार, जामिया के कुलपति की टिप्पणियों ने एक बार फिर आरएसएस द्वारा विश्वविद्यालयों को हाईजैक करने और संघ की फासीवादी राजनीति के मुखपत्र के रूप में कुलपति पद के दुरुपयोग को उजागर कर दिया है.

इसमें आगे कहा गया है कि इस तरह शिक्षण संस्थानों में फासीवादी, अलोकतांत्रिक ताकतों को जगह देना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. जामिया के छात्र और देश भर की सभी प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतें इसका विरोध करेंगी और इसे विफल करेंगी.

गौरतलब है कि इस विवाद ने विश्वविद्यालय परिसरों में वैचारिक मंचों की मौजूदगी पर बहस को फिर से हवा दे दी है. हालांकि, आरएसएस या विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस विशिष्ट टिप्पणी पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन आरएसएस अक्सर ऐसे आयोजनों को युवाओं में सांस्कृतिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के प्रयासों के रूप में वर्णित करता रहा है.

बताया जाता है कि ‘युवा कुंभ’ कार्यक्रम, जहां ये टिप्पणियां की गईं, आरएसएस के व्यापक जनसंपर्क अभियान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य युवाओं को संस्कृति, पहचान और राष्ट्रवाद जैसे विषयों से जोड़ना है. ऐसे कार्यक्रमों में आमतौर पर भाषण, चर्चाएं और शिक्षाविदों और सार्वजनिक हस्तियों की भागीदारी शामिल होती है.

वहीं, इस बार जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 105वें स्थापना दिवस समारोह को लेकर भी विवाद देखने को मिला था. छात्र संगठनों ने ‘म्यूज़िक एंड डांस परफॉर्मेंस- अखंड भारत’, ‘संस्कृत क़व्वाली’ और दिल्ली पुलिस के गायन कार्यक्रम पर आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि ये आयोजन जामिया की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी परंपरा के ख़िलाफ़ हैं.