‘क्षणिक आक्रोश’ अब क्षण-क्षण के ‘पागलपन’ की ओर क्यों बढ़ चला है?

आजकल हमारे समाज में क्षणिक पागलपन- किसी मामूली बात पर चाकू घोंप देना, गोली चला देने जैसी अभागी घटनाओं की बारंबारता इतनी बढ़ गई है कि अख़बारों में इन्हें सरसरी तौर पर पढ़कर परे सरका दिया जाता है. दूसरा सवाल यह कि अगर यह पागलपन है तो हमेशा कमज़ोरों के विरुद्ध ही क्यों अभिव्यक्त होता है?

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

रोमन दार्शनिक सेनेका ने गुस्से को मनुष्य की सबसे विनाशकारी भावना करार देते हुए ऐसा क्षणिक पागलपन बताया है, जो कुछ पलों के लिए उसकी तर्कशक्ति और विवेक, सरल शब्दों में कहें तो, सोचने-समझने की क्षमता को उससे छीन लेता है.

पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के सहबाला गांव में एक सेवानिवृत्त फौजी के आपा खोकर चार-पांच साल की एक बच्ची को, सिर्फ इतनी-सी बात पर, कि उसने फौजी के पेड़ से अमरूद तोड़ लिया था, बेरहमी से पीटने व रेलिंग से बांध देने की घटना को स्वाभाविक ही, इसी क्षणिक पागलपन के रूप में व्याख्यायित किया जा रहा है.‌

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्थित छावनी क्षेत्र की उस घटना को भी, जिसमें अपनी नानी के साथ एक शादी में आए ग्यारह साल के एक बच्चे ने बिना पूछे वहां के स्टॉल पर रखी मिठाइयों में से एक रसगुल्ला उठाकर अपने मुंह में रख लिया तो खाना बना रहे एक कारीगर को इतना गुस्सा आ गया कि उसने उसको धधकते तंदूर की ओर धकेल दिया, जिससे जलकर वह गंभीर रूप से घायल हो गया और उसकी जान पर बन आई.

खबरों के अनुसार, पुलिस ने इन दोनों ही मामलों में अपराध दर्ज कर लिए हैं और जांच कर रही है. लेकिन इस सिलसिले में दो और बड़े सवाल जवाब की मांग कर रहे हैं.

पहला यह कि आखिर क्या कारण है कि आजकल हमारे समाज में इस क्षणिक पागलपन की बारंबारता इतनी बढ़ गई है कि घर हो या बाहर, ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं. इतनी आम कि अखबारों में इन्हें सरसरी तौर पर पढ़कर परे सरका दिया जाता है. इसी तरह दृश्य माध्यमों पर देख व सुनकर सिर झटक कर छुट्टी कर दी जाती है.

दूसरा सवाल यह कि अगर यह पागलपन है तो हमेशा कमजोरों के विरुद्ध ही क्यों अभिव्यक्त होता है? क्यों कमजोर ही सबलों के गुस्से के शिकार होते हैं?

क्या इसलिए कि किसी के गुस्से से पागल हो उठने के क्षण में भी उसका यह ‘विवेक’ बना रहता है कि जो उससे सवाया है, वह कितना भी दुष्ट हो, कितनी भी गुस्ताखियां क्यों न करें और उन्हें लेकर उसको कितना भी गुस्सा क्यों न आए, उसको गुस्से में उस पर हाथ नहीं उठाना है क्योंकि सवाया प्रत्याक्रमण अगले ही पल उसके सारे गुस्से की हवा निकाल कर उसके ‘होश’ की दवा लाकर उसके हाथ पर धर सकता है.

अगर हां, तो सवाल है कि यह पागलपन क्योंकर है और इसे पागलपन के बजाय बुज़दिली क्यों न कहा जाए, जैसा कि किसी शायर ने कहा भी है: किसी बुज़दिल की सूरत घर से ये बाहर निकलता है/मिरा ग़ुस्सा किसी कमज़ोर के ऊपर निकलता है.

बुज़दिल की सूरत

इस सिलसिले में महात्मा गांधी का एक सवाल भी गौरतलब है, जो उन्होंने कभी अहिंसा के पक्ष में पूछा था. तब, जब किसी ने उनसे पूछा कि अहिंसक बने रहकर किसी दुष्ट को सबक कैसे सिखाया जा सकता है? इस पर उनका प्रति प्रश्न था कि दुष्ट आपसे सवाया है तो आप उस पर हाथ उठाकर उसे कैसे सबक सिखा पाएंगे?

उनका यह प्रति प्रश्न इस तथ्य के बावजूद था कि उनके जीवन दर्शन में कहीं भी अहिंसा कायरता की पर्याय नहीं है और किसी कारण कायरता व हिंसा के बीच ही चुनाव की विवशता सामने आ जाए तो वे हिंसा को चुन लेने की बात कहते.

ऐसे में यह पूछना भी बहुत मौजूं लगता है कि क्या सबलों के सामने भीगी बिल्ली बने रहने और निर्बलों के सामने अकड़ने की प्रवृत्ति इस क्षणिक पागलपन से बड़ी होती है और अपने नजदीक आते ही उस ‘पागलपन’ का सारा कस-बल निकाल देती है?

दलितों-वंचितों (और अल्पसंख्यकों) पर जरा-जरा-सी बात पर हाथ उठा देने के ‘अभ्यस्त’ लोगों के गुस्से का ऊंट पहाड़ के नीचे आता है तो किससे छिपा है कि क्या-क्या होता है? शायद इसी के मद्देनजर स्वामी विवेकानंद ने कभी कहा था कि अपने शरीर को कमजोर या निर्बल बनाए रखना संसार का सबसे बड़ा पाप है क्योंकि यह कमजोरी ही अंततः उसके किसी सबल के गुस्से का शिकार होने का रास्ता बनाती है.

मनोवैज्ञानिकों की बात करें, तो वे गुस्से को अनेक रूपों में व्याख्यायित करते हैं, जिनमें एक रूप ‘प्यार भरे’ गुस्से का भी है. प्यार मां का हो या किसी और का, उसमें इस गुस्से की भूमिका भी होती ही होती है. अलबत्ता, यह गुस्सा दिखावे का ज्यादा होता है.

लेकिन उस गुस्से को क्या कहा जाए, जो किसी बच्ची को अमरूद तोड़ लेने या किसी बच्चे को एक रसगुल्ला खा लेने की क्रूर सजा देने की सीमा तक चला जाता और कई मामलों में जानें तक ले लेने पर उतारू हो जाता है?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इस तरह के गुस्से का व्यक्ति की श्रेष्ठता ग्रंथि (जिससे पैदा हुए अहं या कि उच्चताबोध के कारण वह मानने लगता है कि उसे किसी को भी कोई भी सबक सिखाने का हक है, लेकिन खुद उसको कोई सबक सीखने की जरूरत नहीं है) और उसके जाए मानसिक स्वास्थ्य (पढ़ें: असंतुलन) से अभिन्न संबंध होता है.

ऊंच-नीच पर आधारित समाज व्यवस्था इसके बढ़ने के लिए सबसे उपयुक्त जलवायु उपलब्ध कराती है, जबकि तनावों से भरी जीवनशैली, काम का क्षमता से बहुत ज्यादा बोझ, अपर्याप्त आराम, चिंताएं, उनकी पैदा की गई नींद की कमी और हार्मोनल डिसऑर्डर वगैरह भरपूर खाद-पानी देते हैं. इसमें अपनी उच्चता खो देने के डर को और शामिल कर लें तो मनोवैज्ञानिकों का यह कहना भी सच साबित होता है कि गुस्सा अक्सर गुस्सा करने वाले के दिलो-दिमाग में जड़ें जमाए किसी न किसी डर या असहायता की ही उपज होता है – किसी परिस्थिति पर नियंत्रण खो देने के अहसास और उससे जन्मे तनाव का भी.

ऐसा गुस्सा प्रायः उसकी नाक पर रहने लगे तो उसको अपराधी बन जाते देर नहीं लगती, यह तो हम आजकल अपने देश और समाज में चारो और देख ही रहे हैं.

गुस्सा बनाम गुस्सा

अन्यथा और कौन सा कारण हो सकता है कि ‘क्षणिक’ कहलाने वाला यह ‘पागलपन’ (जो कभी-कभी खूब सोच-समझकर अपनाया गया भी लगता है) लोगों की नाक पर इतनी देर तक कब्जा जमाए रहने लगे कि गुस्से व बदले में कोई फर्क ही न रह जाए.

गौर कीजिए: इसके ही चलते अब शादियों में डीजे पर मनपसंद गाने व डांस तक को लेकर हत्याएं होने लगी हैं.

गत मार्च में देश की राजधानी दिल्ली के रानी बाग इलाके में एक शादी में अपनी पसंद का गाना बजने में बाधक बनने को लेकर एक अहंकारी युवक को दूसरे पर इतना गुस्सा आया कि उसने उस 17 वर्षीय नाबालिग को चाकू घोंपकर मार डाला. इसी महीने में सवाई माधोपुर (राजस्थान) में डीजे पर नाचने को लेकर हुए विवाद में भी एक गुस्साए युवक ने दूसरे की चाकू घोंपकर हत्या कर दी.

साफ है कि पानी सिर से ऊपर होने लगा है. इस कारण और कि जिसे हम अब तक ‘क्षणिक पागलपन’ मानते आ रहे थे, अब वह क्षण-क्षण की बात बनने की ओर बढ़ चला और हमारी जिंदगियों को बेबसी व बेहिसी के हवाले किए दे रहा है.

निस्संदेह, उसे रोकने और काबू करने की जिम्मेदारी में सबसे बड़ा हिस्सा हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं का भी है क्योंकि उनके द्वारा शोषण और बेईमानी की बिना पर बनाई ऊंच-नीच यानी गैरबराबरी की व्यवस्था ने ही हममें से किसी को मनमानीपूर्वक गुस्सा निकालने की ‘क्षमता’ दे रखी है और किसी को हर हाल में उसे सहने को बेबस कर रखा है. इसके चलते इस ‘क्षणिक पागलपन’ के अनर्थ बहुत बड़े होते जा रहे हैं.

हां, यहां यह समझना भी बहुत जरूरी है कि यह ‘पागलपन’ उस सात्विक गुस्से का कतई प्रतिनिधित्व नहीं करता, जो कभी-कभी स्वत्व व अधिकार छीनने वालों के विरुद्ध भड़क जाता है और भड़क जाता है तो जल्दी शांत होने को नहीं आता. सात्विक गुस्सा तर्क और विवेक की शक्तियों से जुदा नहीं करता, बल्कि पूरे होशो-हवास में उन पर आधारित व्यवस्था बनाने की बात करता है. हमें समय रहते इस ‘पागलपन’ को ठीक से और उस सात्विकता से अलग करके पहचानना होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)