भारत ने लिपुलेख पर नेपाल के दावे को ख़ारिज किया, कैलाश मानसरोवर यात्रा पर विवाद बढ़ा

लिपुलेख पास को लेकर भारत और नेपाल आमने-सामने आ गए हैं. नेपाल ने कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर आपत्ति जताई है, जबकि भारत ने उसके दावे को तथ्यहीन बताया है. नई नेपाली सरकार के गठन के बाद सीमा विवाद पर दोनों देशों के बीच यह पहला खुला टकराव है.

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23 अगस्त 2025 को जारी इस तस्वीर में एनडीआरएफ की टीम पिथौरागढ़ जिले स्थित लिपुलेख दर्रे से कैलाश मानसरोवर यात्रा कर लौटे श्रद्धालुओं के पांचवें और अंतिम जत्थे की धारचूला (उत्तराखंड) पहुंचने पर सहायता करती नज़र आ रही है. (Photo: @15bnNdrf/X via PTI)

नई दिल्ली: भारत ने रविवार (3 मई) को लिपुलेख पास पर नेपाल के क्षेत्रीय दावे को खारिज करते हुए उसे ‘तथ्यहीन’ बताया. यह प्रतिक्रिया नेपाल सरकार के उस बयान के बाद आई, जिसमें काठमांडू ने भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा का विरोध किया था. नेपाल का कहना है कि यह इलाका उसकी संप्रभु सीमा के भीतर आता है.

करीब एक महीने पहले बालेन शाह के नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सीमा विवाद को लेकर दोनों पड़ोसी देशों के बीच यह पहला सार्वजनिक टकराव है. शाह भारी चुनावी जीत के बाद सत्ता में आए हैं.

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसने मीडिया में आई उन खबरों पर ध्यान दिया है, जिनमें कहा गया है कि भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग से तीर्थयात्रा आयोजित की जा रही है. मंत्रालय ने दोहराया कि इस क्षेत्र पर नेपाल की स्थिति ‘स्पष्ट और दृढ़’ है.

नेपाल सरकार ने अपने बयान में कहा कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि के बाद से नेपाल का अभिन्न हिस्सा रहे हैं.

नेपाल ने यह भी कहा कि उसने भारत और चीन, दोनों देशों को राजनयिक माध्यमों से अपनी आपत्ति दर्ज कराई है. काठमांडू ने भारत से आग्रह किया है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, विस्तार, सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा जैसी गतिविधियां न करे. साथ ही चीन को भी औपचारिक रूप से बताया गया है कि लिपुलेख क्षेत्र नेपाल का हिस्सा है.

नेपाल के बयान के कुछ ही घंटों बाद भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जवाब दिया. उन्होंने कहा कि भारत की स्थिति हमेशा स्पष्ट और एक जैसी रही है. लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है. उन्होंने कहा कि इस रास्ते से यात्रा दशकों से होती रही है, यह कोई नई व्यवस्था नहीं है.

नेपाल के दावे पर भारत ने कहा कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों तथा प्रमाणों पर आधारित हैं. विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीमा दावों का इस तरह एकतरफा और कृत्रिम विस्तार स्वीकार्य नहीं है.

हालांकि भारत ने यह भी कहा कि वह नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों, जिनमें लंबित सीमा विवाद भी शामिल हैं, पर संवाद और कूटनीति के जरिए रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है.

यह विवाद तब उभरा जब भारत ने 1 मई को घोषणा की कि 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त तक आयोजित की जाएगी. इसके तहत 50-50 यात्रियों के 10 जत्थे उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से जाएंगे, जबकि 10 जत्थे सिक्किम के नाथू-ला मार्ग से यात्रा करेंगे. नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने भी यात्रा बहाल होने का स्वागत करते हुए कहा कि चीन इस वर्ष 1,000 भारतीय तीर्थयात्रियों की सुविधा सुनिश्चित करेगा.

नेपाल की नई सरकार की ओर से आया विरोध अप्रत्याशित नहीं माना जा रहा है. बालेन शाह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी (आरएसपी) विपक्ष में रहते हुए भारत-नेपाल संबंधों, खासकर लिपुलेख मुद्दे पर राष्ट्रवादी रुख अपनाते रहे हैं.

काठमांडू के मेयर रहते हुए शाह ने 2023 में अपने कार्यालय में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगाया था. इसे भारत की नई संसद भवन में लगे ‘अखंड भारत’ भित्तिचित्र के जवाब के तौर पर देखा गया था.

पिछले वर्ष नेपाली मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग से व्यापार बहाल करने पर शाह ने चीन जाने से इनकार कर दिया था. उन्होंने काठमांडू के थमेल इलाके में चीनी नववर्ष कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति भी नहीं दी थी.

अगस्त 2025 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में भाग लेने चीन गए थे, तब शाह ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि वे बीजिंग को यह याद दिलाना न भूलें कि लिपुलेख नेपाल का हिस्सा है. उन्होंने कहा था कि भारत और चीन के बीच इस मार्ग से व्यापार फिर शुरू करने का समझौता नेपाल की संप्रभुता का उल्लंघन है.

आरएसपी ने भी अगस्त 2025 में जारी एक बयान में भारत-चीन समझौते की आलोचना की थी और कहा था कि नेपाल की सहमति के बिना कोई भी देश इस दर्रे से व्यापार नहीं कर सकता.