नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को ओडिशा की अदालतों को फटकार लगाते हुए उन आदेशों पर नाराज़गी जताई जिनमें खनन-विरोधी प्रदर्शनों में शामिल आदिवासी और दलित समुदायों के लोगों के लिए ज़मानत पाने की शर्त के तौर पर पुलिस थानों की सफ़ाई करना अनिवार्य किया गया था.
द टेलीग्राफ ने बताया कि हाल की खबरों के अनुसार, ओडिशा हाईकोर्ट ने ऐसे लगभग 50 आदेश पारित किए थे, जिनमें पुलिस थानों की सफ़ाई को ज़मानत की शर्त बनाया गया था.
एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि ऐसे आदेश मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं और व्यक्तियों की गरिमा पर आघात करते हैं. अदालत ने यह भी कहा कि यह प्रवृत्ति हाशिये पर पड़े समुदायों के खिलाफ न्यायपालिका में मौजूद जातिगत पक्षपात को उजागर करती है.
पीठ ने ऐसे आदेशों को ‘घृणित’ बताते हुए कहा कि ये न्यायपालिका की ‘छवि को खराब’ करते हैं. अदालत ने कहा, ‘यह बात बिल्कुल सही रिपोर्ट की गई है कि यह न्यायपालिका में मौजूद भेदभाव को उजागर करता है, क्योंकि आरोपी हाशिए पर पड़े समुदायों से आते हैं और इसलिए इसलिए उन पर ऐसे बोझिल शर्तें थोपी जाती हैं.’
पीठ ने आगे कहा, ‘यह भी कहा गया है कि जब संपन्न लोगों को जमानत दी जाती है, तब इस प्रकार की शर्तें नहीं लगाई जातीं. इन शर्तों की प्रकृति इतनी क्रूर और निंदनीय है कि इससे ओडिशा की न्यायपालिका की छवि जाति-आधारित रूप में उभरने की आशंका है.’
शीर्ष अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि ऐसे लगभग 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इनमें से कुछ को ओडिशा हाईकोर्ट ने जमानत दी, लेकिन उन पर अभूतपूर्व शर्तें लगाई गईं, जैसे कि लगभग दो महीनों तक पुलिस थानों की सफाई करना.
अदालत ने यह भी कहा कि एक अन्य आदेश में, जब ओडिशा हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को जमानत दी, तो उसने इसी प्रकार का निर्देश दिया था, और इसी तरह का आदेश आदिवासी कार्यकर्ता लक्ष्मण नायक के मामले में भी जारी किया गया था.
लक्ष्मण नायक का मामला (जिनका ज़िक्र अक्सर कुमेश्वर नायक और हीरामाल नायक के साथ किया जाता है), जो रायगड़ा ज़िले की तिजीमाली पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन के खिलाफ ज़मीनी स्तर के विरोध से उभरा था, ओडिशा में विवादास्पद न्यायिक आदेशों की एक श्रृंखला का हिस्सा है.
लक्ष्मण नायक एक आदिवासी कार्यकर्ता और ‘मां माटी माली सुरक्षा मंच’ के सदस्य हैं; यह समूह वेदांता लिमिटेड की एक खनन परियोजना से अपनी पुश्तैनी ज़मीन की रक्षा के लिए बनाया गया है. 2024 के आखिर और 2025 की शुरुआत में विरोध प्रदर्शनों पर की गई सख़्त कार्रवाई के बाद कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने दंगा किया था और सरकारी अधिकारियों के काम में रुकावट डाली थी.
बता दें कि साल 2023 से तिजिमाली इलाके के आदिवासी और दलित समुदाय वेदांता लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित एक बॉक्साइट खनन परियोजना का विरोध कर रहे हैं. यह विरोध तब शुरू हुआ, जब कंपनी को तिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक आवंटित किया गया, ताकि वह ओडिशा के कालाहांडी ज़िले में स्थित लांजीगढ़ एल्युमिनियम रिफ़ाइनरी के लिए कच्चा माल जुटा सके.
इस परियोजना में पूर्वी घाट की तिजिमाली पहाड़ी श्रृंखला में बड़े पैमाने पर वन भूमि का डायवर्जन शामिल है – प्रस्तावित 1560.40 हेक्टेयर के खनन पट्टा क्षेत्र का लगभग 46.37% हिस्सा वन भूमि है. इस परियोजना के तहत दो गांव – रायगड़ा ज़िले का मालिपदर और कालाहांडी ज़िले का तिजिमाली – हटाए जाएंगे, जिनमें 140 से अधिक परिवारों की आबादी है.
