एल्गर परिषद केस: बिना सुनवाई के क़रीब आठ साल की क़ैद के बाद सुरेंद्र गाडलिंग को ज़मानत मिली

एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार नागपुर के जाने-माने मानवाधिकार अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग को सोमवार को लंबी अवधि की हिरासत के आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने ज़मानत दे दी. गाडलिंग बिना किसी सुनवाई और कई दौर की ज़मानत याचिकाओं के बावजूद क़रीब आठ साल से क़ैद हैं.

सुरेंद्र गाडलिंग. (फोटो साभारः फेसबुक)

मंगलुरु: बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2018 के विवादास्पद एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार नागपुर के जाने-माने मानवाधिकार अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग को सोमवार (4 मई) को लंबी अवधि की हिरासत के आधार पर ज़मानत दे दी.

रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल 6 जून को सुरेंद्र गाडलिंग को बिना किसी सुनवाई और कई दौर की जमानत याचिकाओं के बावजूद कैद में आठ साल हो जाते.

बॉम्बे उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता शामिल थे, ने गाडलिंग की जनवरी 2024 से लंबित जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया.

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का हवाला देते हुए समानता के आधार पर उन्हें जमानत दी, यह देखते हुए कि इस मामले में 16 आरोपियों में से 14 को पहले ही जमानत मिल चुकी है.

उल्लेखनीय है कि एल्गार परिषद मामले में ही 84 वर्षीय पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की 2021 में न्यायिक हिरासत में कथित चिकित्सा लापरवाही के कारण मृत्यु हो गई थी.

हालांकि, गाडलिंग अभी हिरासत में ही रहेंगे क्योंकि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में उन पर एक अलग मामला चल रहा है. 2016 के उस आगजनी मामले में, जिसमें कथित तौर पर 76 लौह अयस्क परिवहन वाहनों को जलाया गया था, गाडलिंग को तीन साल बाद जनवरी 2019 में गिरफ्तार किया गया था.

आगजनी मामले में भी उनके सह-आरोपियों को उसी वर्ष जमानत मिल गई थी, जबकि गाडलिंग की जमानत याचिका अभी लंबित है और वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है.

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर गढ़चिरोली की निचली अदालत ने उनके खिलाफ आरोप तय किए हैं.

गाडलिंग पर माओवादियों को सहायता प्रदान करने और मामले में फरार लोगों सहित विभिन्न सह-आरोपियों के साथ कथित रूप से साजिश रचने का आरोप लगाया गया था. उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था और अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि गाडलिंग ने भूमिगत माओवादी विद्रोहियों को सरकारी गतिविधियों और कुछ क्षेत्रों के मानचित्रों के बारे में गुप्त जानकारी प्रदान की थी.

कथित तौर पर उन्होंने माओवादियों से सुरजागढ़ खदानों के संचालन का विरोध करने को कहा और कई स्थानीय लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाया.

गाडलिंग पर एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित मामले में पुलिस ने दावा किया था कि भाषणों ने अगले दिन पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़का दी.

एल्गर परिषद मामले में उच्च न्यायालय में जमानत की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के विशेष लोक अभियोजक चिंतन शाह के सहयोग से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने गडचिरोली मामले में गाडलिंग के ‘पुराने रिकॉर्ड’ का हवाला देते हुए उनकी जमानत याचिका का विरोध किया.

वहीं, गाडलिंग के वकील सुदीप पासबोला ने मुकदमे में अत्यधिक देरी और इस तथ्य पर जोर दिया कि एल्गर परिषद मामले में अधिकांश सह-आरोपियों को पहले ही रिहा कर दिया गया है.

इस मामले में जमानत पर रिहा होने वालों में वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुंबडे, वर्नोन गोंज़ाल्विस, अरुण फरेरा, शोमा सेन, गौतम नवलखा, सुधीर धवले, रोना विल्सन, हैनी बाबू, सागर गोरखे और रमेश गाइचोर शामिल हैं.

एक अन्य आरोपी ज्योति जगताप अंतरिम जमानत पर बाहर हैं, जबकि महेश राउत को सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल आधार पर अंतरिम राहत दी थी.

मालूम हो कि एल्गार परिषद मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित गोष्ठी में कथित भड़काऊ भाषण से जुड़ा है. पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन शहर के बाहरी इलाके में स्थित भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई और इस संगोष्ठी का आयोजन करने वालों का संबंध कथित माओवादियों से था.

एनआईए ने 16 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और शिक्षाविद शामिल हैं. इन सभी पर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन का हिस्सा होने का आरोप है. पुणे पुलिस ने यह भी दावा किया था कि आरोपियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘राजीव गांधी की तरह हत्या’ करने की योजना बनाई थी.