नई दिल्ली: असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने केवल यह तय नहीं किया कि राज्य में अगली सरकार कौन बनाएगा, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि पिछले एक दशक में राज्य की राजनीति किस दिशा में बदल चुकी है. भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर न सिर्फ वापसी की, बल्कि अपने अब तक के सबसे मजबूत राजनीतिक मुकाम पर पहुंच गई.
126 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने अकेले 82 सीटें जीतीं, जबकि सहयोगी दलों असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का आंकड़ा 102 तक पहुंच गया.
यह नतीजा इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि भाजपा ने दस साल की सत्ता विरोधी थकान को अपने खिलाफ नहीं जाने दिया. सामान्यतः लंबे शासन के बाद सरकारों के खिलाफ असंतोष पनपता है, लेकिन असम में भाजपा का जनाधार सिकुड़ने के बजाय और व्यापक हुआ. 2016 और 2021 में भाजपा ने 60-60 सीटें जीती थीं. इस बार उसने पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया. यह सिर्फ सीटों की बढ़त नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की स्थापना है.
भाजपा की जीत, लेकिन चेहरा हिमंता बिस्वा
इस चुनाव का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि असम में भाजपा की जीत अब केवल नरेंद्र मोदी या केंद्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता पर निर्भर नहीं है. राज्य में पार्टी का चेहरा और शक्ति-केंद्र अब स्पष्ट रूप से हिमंता बिस्वा शर्मा हैं. 2021 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला चुनाव था जिसमें वे खुद पुनर्निर्वाचन की मांग लेकर जनता के बीच गए.
उन्होंने आक्रामक चुनाव अभियान चलाया, प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखा और अपने समर्थकों के बीच एक ऐसे नेता की छवि गढ़ी जो फैसले लेता है, उन्हें लागू करता है और राजनीतिक लड़ाई से पीछे नहीं हटता. जालुकबाड़ी सीट से वे लगातार छठी बार जीते और लगभग 89 हजार वोटों से जीत दर्ज की.
शर्मा की राजनीति दो समानांतर धाराओं पर चलती दिखी, एक ओर कठोर राष्ट्रवादी और पहचान आधारित विमर्श, दूसरी ओर योजनाओं, नकद सहायता, महिलाओं के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और विकास परियोजनाओं का आक्रामक प्रचार. इसी संयोजन ने उन्हें भाजपा के भीतर विशिष्ट बनाया है.
कांग्रेस से भाजपा तक: एक नेता का पुनर्जन्म
हिमंता बिस्वा कभी कांग्रेस के भीतर सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे. दो दशकों तक पार्टी संगठन और सरकार दोनों में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने 2015 में भाजपा का दामन थामा. अगले ही वर्ष भाजपा ने पहली बार असम में सत्ता हासिल की.
इसके बाद शर्मा केवल असम तक सीमित नहीं रहे. उन्होंने पूर्वोत्तर में भाजपा के विस्तार के रणनीतिकार की भूमिका निभाई, मणिपुर, अरुणाचल, त्रिपुरा और मेघालय तक गठबंधन राजनीति को आकार दिया. भाजपा के भीतर उन्हें अक्सर ‘काम निकालने वाले नेता’ के रूप में देखा जाता है. यही वजह है कि केंद्रीय नेतृत्व, खासकर अमित शाह, के साथ उनकी निकटता लगातार चर्चा में रही है.
इस चुनावी जीत ने उन्हें एक क्षेत्रीय मुख्यमंत्री से कहीं आगे, राष्ट्रीय महत्व के राजनीतिक संचालक के रूप में स्थापित किया है.
भाजपा की सामाजिक जीत: कौन साथ आया?
चुनावी नक्शा बताता है कि भाजपा और उसके सहयोगियों ने राज्य के उन इलाकों में लगभग पूर्ण वर्चस्व स्थापित किया, जहां असमिया भाषी हिंदू, जनजातीय समुदाय और बंगाली हिंदू मतदाता निर्णायक संख्या में हैं. इन वर्गों में भाजपा का समर्थन मजबूत होकर सामने आया.
राज्य के विभिन्न क्षेत्रों, लोअर असम, सेंट्रल असम, अपर असम, बराक वैली और उत्तर असम, में भाजपा ने अलग-अलग सामाजिक समूहों के साथ अपने गठबंधन को बनाए रखा.
हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, भाजपा और उसके सहयोगियों का संयुक्त वोट शेयर करीब 48 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो 2016 और 2021 की तुलना में अधिक है. इसका अर्थ है कि भाजपा केवल सीटें नहीं जीत रही, बल्कि मत प्रतिशत के स्तर पर भी विस्तार कर रही है.
चुनावी नैरेटिव: घुसपैठ, पहचान और विकास
इस चुनाव में भाजपा ने तीन बड़े मुद्दों को एक साथ साधा. पहला, ‘अवैध घुसपैठ’ का प्रश्न, विशेषकर बांग्लादेश सीमा से जुड़े इलाकों में. दूसरा, सांस्कृतिक और अस्मितावादी राजनीति, जिसमें ‘मिया मुसलमान’ जैसे विवादित शब्दों के जरिए बंगाली मूल के मुसलमानों को राजनीतिक विमर्श में निशाना बनाया गया. तीसरा, विकास- सड़कें, पुल, निवेश, उद्योग और कल्याण योजनाएं.
यह मिश्रण भाजपा के लिए प्रभावी साबित हुआ. पहचान की राजनीति ने कोर वोट को जोड़े रखा, जबकि कल्याणकारी योजनाओं ने नए सामाजिक वर्गों, खासकर महिलाओं तक पहुंच बनाई.
कांग्रेस की सबसे बड़ी हार
इन चुनावों में कांग्रेस केवल हारी नहीं, बल्कि सिकुड़ गई. कभी असम की निर्विवाद शासक रही पार्टी 19 सीटों पर सिमट गई, जो उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन माना जा रहा है.
राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई की हार ने पार्टी की मुश्किल और बढ़ा दी. विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे देबब्रत सैकिया भी हार गए. कांग्रेस का प्रभाव अब मुख्यतः उन इलाकों तक सीमित दिखा, जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं.
ऊपरी और उत्तरी असम की 43 सीटों में कांग्रेस केवल एक सीट जीत सकी. आदिवासी बहुल इलाकों में भी उसे लगभग साफ कर दिया गया. इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने में विफल रही.
एआईयूडीएफ का पतन और मुस्लिम राजनीति का पुनर्संयोजन
बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) इस चुनाव की सबसे बड़ी पराजित शक्तियों में रही. 2021 में 16 सीटें जीतने वाली पार्टी इस बार सिर्फ 2 सीटों तक सिमट गई. हालांकि अजमल स्वयं बिन्नाकांडी से जीत गए, लेकिन पार्टी का राजनीतिक आधार टूटता दिखा.
यह संकेत है कि असम के मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अब कांग्रेस की ओर लौट रहा है. 2024 लोकसभा चुनाव में भी यही रुझान दिखा था, जब अजमल को करारी हार का सामना करना पड़ा था.
लेकिन मुस्लिम वोटों का यह पुनर्संयोजन भी विपक्ष को पर्याप्त लाभ नहीं दे सका, क्योंकि यह वोट सीमित क्षेत्रों में केंद्रित रह गया.
परिसीमन का गहरा असर
2023 के परिसीमन ने इस चुनाव की पृष्ठभूमि बदल दी. विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि नई सीमांकन प्रक्रिया ने अल्पसंख्यक प्रभाव वाली सीटों की संख्या घटा दी. राजनीतिक दलों के बीच आम समझ यह रही कि जहां पहले करीब 35 सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक थे, वे घटकर लगभग 23 रह गईं.
इससे दो असर हुए. पहला, मुस्लिम वोट कम सीटों में ‘पैक’ हो गए. दूसरा, जिन सीटों पर वे पहले निर्णायक थे, वहां उनका प्रभाव बिखर गया.
हैलाकांडी, धुबरी, बारपेटा, गोआलपाड़ा और सीमा से लगे कई इलाकों में भाजपा ने विपक्ष से सीटें छीन लीं. कई पुराने निर्वाचन क्षेत्र समाप्त हुए या नए रूप में बने. कुछ जगह कांग्रेस, एआईयूडीएफ और तृणमूल कांग्रेस के बीच वोट बंटे.
इस तरह परिसीमन ने विपक्षी वोटों को संरचनात्मक नुकसान पहुंचाया, जबकि भाजपा को भौगोलिक लाभ मिला.
क्या असम अब ध्रुवीकृत राजनीति की प्रयोगशाला है?
नतीजों से एक और तथ्य उभरता है- राज्य में मतदान पैटर्न तेजी से ध्रुवीकृत हुआ है. भाजपा और उसके सहयोगियों को मुख्यतः गैर-मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा मिला, जबकि विपक्ष को मुख्यतः अल्पसंख्यक क्षेत्रों तक सीमित सफलता मिली.
यह विभाजन असम की राजनीति में नया नहीं है, लेकिन 2026 में यह और स्पष्ट होकर सामने आया. यही कारण है कि विपक्ष केवल चुनिंदा सीटों पर जीत सका.
राष्ट्रीय राजनीति के लिए संदेश
असम का चुनाव केवल एक राज्य का परिणाम नहीं है. यह भाजपा के लिए कई संदेश लेकर आया है. पहला, पार्टी दस साल की सत्ता विरोधी भावना को भी प्रबंधित कर सकती है. दूसरा, मजबूत क्षेत्रीय नेता भाजपा मॉडल का हिस्सा बन सकते हैं. तीसरा, पहचान की राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं का संयुक्त प्रयोग अब भी कारगर है.
हिमंता की जीत ने भाजपा के भीतर भविष्य की नेतृत्व संरचना पर भी ध्यान खींचा है. यदि पहला कार्यकाल उन्हें क्षेत्रीय मजबूत नेता बनाता था, तो दूसरी प्रचंड जीत उन्हें राष्ट्रीय पंक्ति के नेताओं में खड़ा करती है.
असम की राजनीति का नया अध्याय
असम में 2026 का जनादेश इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने सत्ता परिवर्तन नहीं, सत्ता स्थायित्व को चुना है. और इस स्थायित्व के केंद्र में फिलहाल एक ही नाम है- हिमंता बिस्वा शर्मा.
एक समय कांग्रेस का गढ़ रहा असम अब भाजपा के सबसे स्थिर राज्यों में बदल चुका है. भाजपा की तीसरी लगातार जीत बताती है कि यह केवल चुनावी लहर नहीं, बल्कि सामाजिक गठबंधन, प्रशासनिक नियंत्रण, राजनीतिक पुनर्संरचना और वैचारिक ध्रुवीकरण का संयुक्त परिणाम है.
