जम्मू-कश्मीर: केंद्र ने उपराज्यपाल को दूरसंचार सेवाओं को नियंत्रित करने की आपातकालीन शक्तियां सौंपी

केंद्र सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को दूरसंचार अधिनियम के तहत 'राज्य सरकार की शक्तियों का प्रयोग करने और कार्यों का निर्वहन करने' का निर्देश दिया गया है. जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के 2019 में लागू होने के बाद से यह दूसरी बार है जब केंद्र सरकार ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए निर्वाचित सरकार की शक्तियों को सीमित किया है.

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा. (फोटो साभार: X/@OfficeOfLGJandK)

श्रीनगर: केंद्र सरकार ने दूरसंचार अधिनियम, 2023 के तहत जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय को व्यापक आपातकालीन शक्तियां सौंप दी हैं, जिससे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली निर्वाचित सरकार को दरकिनार कर दिया गया है.

मालूम हो कि जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के 2019 में लागू होने के बाद से यह दूसरी बार है जब केंद्र सरकार ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए निर्वाचित सरकार की शक्तियों को सीमित किया है.

उल्लेखनीय है कि यह घोषणा उसी दिन की गई जब सीएम अब्दुल्ला ने कहा था कि निर्वाचित प्रतिनिधि को ‘सुरक्षा लूप’ से बाहर रखने से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों के बारे में सूचनाओं का प्रवाह बाधित हो सकता है.

गुरुवार (7 मई) को केंद्र सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को दूरसंचार अधिनियम की धारा 20 की उपधारा 2 के तहत ‘राज्य सरकार की शक्तियों का प्रयोग करने और कार्यों का निर्वहन करने’ का निर्देश दिया गया है.

यह अधिनियम केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी भी ‘विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी’ को ‘भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की रक्षा और सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था’ के हित में और संज्ञेय अपराधों को रोकने के लिए दूरसंचार सेवाओं और नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है.

इस संबंध में फ्री स्पीच कलेक्टिव की प्रमुख कार्यकर्ता गीता सेशु ने कहा कि यह अधिसूचना अब्दुल्ला सरकार के प्रति ‘पूर्ण उपेक्षा’ दर्शाती है और इससे जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल को ‘और अधिक शक्तिशाली’ बनने की संभावना है.

उन्होंने कहा, ‘दूरसंचार अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य सरकारों के पास अधिकारियों को दूरसंचार सेवाओं पर नियंत्रण रखने के लिए अधिकृत करने का अधिकार है, लेकिन यह जम्मू-कश्मीर की (चुनी हुई) सरकार को दरकिनार कर सकता है और इसके प्रति पूर्ण उपेक्षा दर्शाता है.’

इस अधिसूचना को कम महत्व देने की कोशिश करते हुए सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा तंत्र उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है. उन्होंने कहा, ‘फोन की निगरानी करना और दूरसंचार नेटवर्क को निष्क्रिय करना सुरक्षा तंत्र के अंतर्गत आता है. इसके अलावा यह आदेश केंद्र शासित प्रदेश होने का स्वाभाविक विस्तार है.’

अधिसूचना में उल्लिखित अधिनियम की उपधारा 20 (2) में दो श्रेणियां दी गई हैं जिनके अंतर्गत केंद्र या राज्य सरकारें दूरसंचार सेवा प्रदाताओं द्वारा संदेशों के प्रसारण को रोकने और दूरसंचार सेवाओं को निलंबित करने की शक्तियों का प्रयोग कर सकती हैं.

अधिनियम के अनुसार, दूरसंचार ऑपरेटरों के लिए किसी भी संदेश की विषयवस्तु को ‘स्पष्ट प्रारूप में’ प्रकट करना अनिवार्य है. अधिनियम के अनुसार इन शक्तियों के प्रयोग के कारणों को ‘लिखित रूप में दर्ज’ किया जाना चाहिए.

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा समेत कानून और व्यवस्था से जुड़े मामले निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. जम्मू-कश्मीर पुलिस सीधे उपराज्यपाल के कार्यालय को रिपोर्ट करती है.

हालांकि, दूरसंचार अधिनियम के तहत आपातकालीन शक्तियां राज्य सरकार के बजाय उपराज्यपाल के कार्यालय को सौंपे जाने से सत्तारूढ़ दल और संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा इसकी आलोचना होने की संभावना है, जिन्होंने तर्क दिया है कि ऐसे निर्णय जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार को कमजोर करते हैं.

यह अधिसूचना उस दिन जारी की गई है जब अब्दुल्ला ने दावा किया था कि केंद्र शासित प्रदेश में चुनी हुई सरकार कानून-व्यवस्था तंत्र से ‘पूरी तरह से कटी हुई’ है, जिससे ‘महत्वपूर्ण सूचनाओं का आदान-प्रदान बाधित हो सकता है.’

उन्होंने लाल किले पर हुए आत्मघाती बम विस्फोट का जिक्र करते हुए कहा, ‘जब आप अलग-थलग होकर काम करते हैं, जब चुनी हुई सरकार और चुने हुए प्रतिनिधि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था तंत्र से पूरी तरह से कटे रहते हैं, तो अंततः ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होती है.’

ज्ञात हो कि साल 2019 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम को मंजूरी देकर जम्मू-कश्मीर के साथ संवैधानिक संबंधों को नया रूप प्रदान किया था. इसके बाद कई संशोधन किए गए, जिससे केंद्र शासित प्रदेश में 106 केंद्रीय कानूनों का विस्तार संभव हो सका.

2024 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव से पहले, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अधिनियम के तहत नियमों में और संशोधन करके पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और अखिल भारतीय सेवाओं पर उपराज्यपाल की शक्तियों का काफी विस्तार किया था.

जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इन कदमों को अब्दुल्ला की चुनी हुई सरकार को कमजोर करने की कोशिश बताया है और केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में किए गए उस वादे की याद दिलाई है जिसमें जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की बात कही गई थी, जो अब तक पूरा नहीं हुआ है.

इस सप्ताह की शुरुआत में सीएम अब्दुल्ला ने आरोप लगाया था कि जम्मू-कश्मीर की जनता को केंद्र सरकार द्वारा भाजपा के मुख्यमंत्री को न चुनने के लिए दंडित किया जा रहा है.

उन्होंने जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए किसी भी योजना के अभाव का जिक्र करते हुए इसे ‘धोखा और वादे का उल्लंघन’ बताया था.

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