नॉर्थईस्ट डायरीः मणिपुर के दिवंगत ज़ोमी भाजपा विधायक के शव के साथ दिल्ली में प्रदर्शन की योजना

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के प्रमुख समाचार.

भाजपा विधायक वुंगज़ागिन वाल्टे का पार्थिव शरीर 24 फरवरी, 2026 को मणिपुर के चूड़ाचांदपुर में उनके घर लाया गया. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मणिपुर में ज़ोमी समुदाय के सदस्य दिवंगत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायक वुंगज़ागिन वाल्टे का शव राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली लाने की योजना बना रहे हैं, ताकि भाजपा मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया जा सके.

वाल्टे पर 4 मई, 2023 को इंफाल में एक भीड़ ने हमला किया था, जिसके कारण उन्हें लकवा मार गया था. 21 फरवरी, 2026 को हरियाणा के गुड़गांव स्थित एक अस्पताल में उनका निधन हो गया. उनका शव मणिपुर के चूड़ाचांदपुर ज़िला अस्पताल के मुर्दाघर में सुरक्षित रखा गया है.

वाल्टे के मौत के बाद उनका परिवार न्याय की मांग कर रहा है. परिवार के सदस्यों का कहना है कि जब तक उन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा जो इस हमले के लिए जिम्मेदार हैं, तब तक उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, ज़ोमी समन्वय समिति (ज़ेडसीसी) के प्रवक्ता मुआन ज़ोमी ने कहा कि एक सप्ताह के भीतर ज़ोमी नेता पार्थिव शरीर को सड़क मार्ग से आईजोल ले जाने की योजना बना रहे हैं और इसके बाद हवाई मार्ग से दिल्ली ले जाया जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘हम अपने विधायक के लिए न्याय की मांग करते हुए पार्थिव शरीर को दिल्ली में भाजपा मुख्यालय के सामने रखेंगे. न्याय और जवाबदेही की लगातार मांग हो रही है, लेकिन घटना की गंभीरता के बावजूद अब तक कोई ठोस जानकारी या स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है.’

एक प्रमुख मांग यह है कि विधायक के अंतिम संस्कार से पहले उनके कार्यकाल के दौरान किए गए वादों को पूरा किया जाए. उन्होंने कहा, ‘इसमें प्रशासनिक सुविधा के लिए सीमाओं के पुनर्निर्धारण से संबंधित राजपत्र अधिसूचनाओं का क्रियान्वयन और वर्ष 2017 में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन शामिल है, जो अब तक अधूरा है और ज़मीन पर लागू नहीं हुआ है.’

अरुणाचल: परिवार को ठेका दिए जाने संबंधी आरोपों पर सीबीआई जांच के आदेश के बाद सीएम बोले, ‘मैं बेकसूर हूं’

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने मंगलवार (5 मई) को ज़ोर देकर कहा कि उन्होंने ‘कुछ भी गलत नहीं किया है.’ यह बयान तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) को निर्देश दिया कि वह उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े सार्वजनिक कार्यों के कॉन्ट्रैक्ट के आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच करे.

सीबीआई को 1 जनवरी, 2015 से 31 दिसंबर, 2025 के बीच दिए गए ठेकों की जांच करने का निर्देश दिया गया है.

मुख्यमंत्री पेमा खांडू. (फोटो साभार: फेसबुक/PemaKhanduBJP)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए खांडू ने कहा कि उनकी सरकार जांच एजेंसी को पूरा सहयोग देगी. उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘मैं बेकसूर हूं. हमारी सरकार हर संभव तरीके से सहयोग करेगी ताकि सच सामने आ सके.’

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह 1 जनवरी 2015 से 31 दिसंबर 2025 के बीच दिए गए कई सरकारी ठेकों में कथित अनियमितताओं की प्रारंभिक जांच करे. आरोप है कि ये ठेके उन कंपनियों को दिए गए जो खांडू के रिश्तेदारों से जुड़ी हैं. अदालत ने एजेंसी से 16 सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट पेश करने को कहा है.

यह घटनाक्रम अरुणाचल प्रदेश में बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच सामने आया है, जहां नागरिक समाज समूहों ने जांच पूरी होने तक मुख्यमंत्री के इस्तीफ़े की मांग की है. ईटानगर में अरुणाचल सिविल सोसाइटी के अध्यक्ष ब्याबांग जोरम के नेतृत्व में तीन दिन के धरने में इन आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग की गई.

विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए खांडू ने कहा कि लोकतांत्रिक विरोध का स्वागत है, बशर्ते वह शांतिपूर्ण और नैतिक हो. उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र में हर किसी को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार है, लेकिन यह अहिंसक और ज़िम्मेदार तरीके से किया जाना चाहिए.’

मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि उन्होंने इस मामले से जुड़ी कानूनी कार्यवाही को प्रभावित करने की कभी कोशिश नहीं की. सुप्रीम कोर्ट में पहले हुई सुनवाई का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई निजी वकील नहीं रखा है, क्योंकि उन्हें अपनी बेगुनाही पर पूरा भरोसा है.

खांडू ने आगे कहा, ‘पिछले दस सालों से मेरी सरकार राज्य से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए लगातार काम कर रही है. पूरे अरुणाचल प्रदेश में जो सुधार और विकास दिख रहा है, वह स्वच्छ शासन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दिखाता है.’

साथ ही, उन्होंने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया, लेकिन यह भी कहा कि उनका प्रशासन सीबीआई जांच में पूरा सहयोग करेगा. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश ‘सेव मोन रीजन फेडरेशन’ और ‘वॉलंटरी अरुणाचल सेना’ द्वारा दायर एक याचिका के बाद आया है. इस याचिका में सरकारी ठेके देने में कथित तौर पर की गई पक्षपात की जांच सीबीआई या किसी विशेष जांच दल (एसआईटी) से कराने की मांग की गई थी.

याचिका के अनुसार, खांडू के रिश्तेदारों से जुड़ी कंपनियों को – जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की दूसरी पत्नी रिंचिन ड्रेमा और खांडू के भतीजे त्सेरिंग ताशी शामिल हैं – जांच के दायरे में आने के दौरान कई सार्वजनिक निर्माण कार्य के ठेके मिले.

याचिका में विशेष रूप से ‘ब्रांड ईगल्स’ नामक कंपनी का ज़िक्र किया गया है, जिसका कथित तौर पर रिंचिन ड्रेमा से संबंध है. आरोप है कि हितों के स्पष्ट टकराव के बावजूद इस कंपनी को कई सरकारी परियोजनाएं मिलीं.

याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि मुख्यमंत्री के परिवार और उनके करीबी सहयोगियों से जुड़ी कंपनियों को बार-बार बड़े ठेके दिए जाने से इस बात की संभावना बनती है कि सत्ता में बैठे लोगों को इसकी सीधी जानकारी थी, या उनकी इसमें सहमति अथवा समर्थन था.

दोरजी खांडू, जिन्होंने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया था, का 2011 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हो गया था.

असम: तिराप जंगल में लाइका के पुनर्वास के विरोध में जगुन समूह

ऊपरी असम के जगुन में कई नागरिक समूहों और जातीय संगठनों ने तिराप आरक्षित वन क्षेत्र में लाइका निवासियों के प्रस्तावित पुनर्वास का कड़ा विरोध किया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस योजना को लागू किया गया, तो इसके बाद और भी ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन होंगे.

जगुन के फानेंग नंबर 1 में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने तिराप-जगुन क्षेत्र के स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर, जंगल क्षेत्र के भीतर बाढ़ के कारण विस्थापित लाइका निवासियों को बसाने की सरकार की कथित योजना पर चिंता जताई.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

कार्यक्रम में वक्ताओं ने दावा किया कि इस प्रस्तावित कदम के परिणामस्वरूप एक सदी पुराने आरक्षित वन का विनाश हो सकता है. उन्होंने सरकार और अधिकारियों से आग्रह किया कि वे ऐसी किसी भी योजना को रद्द कर दें जिससे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को खतरा हो. उन्होंने चेतावनी दी कि संरक्षित वनों की कीमत पर लोगों का पुनर्वास करने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध किया जाएगा.

साथ ही, संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका विरोध लाइका निवासियों के पुनर्वास को लेकर नहीं है, बल्कि उस प्रस्तावित स्थान को लेकर है जहां उन्हें बसाने की योजना है. उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को इसके बजाय असम के विभिन्न हिस्सों में अतिक्रमणकारियों से वापस ली गई ज़मीन का उपयोग बाढ़ प्रभावित और विस्थापित परिवारों को बसाने के लिए करना चाहिए.

वर्तमान प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए समूहों ने कहा कि राज्य ने हाल ही में अवैध रूप से कब्ज़ाई गई सरकारी ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा वापस हासिल किया है. कई वक्ताओं ने पूछा, ‘जब ऐसी ज़मीन उपलब्ध है, तो पुनर्वास के लिए आरक्षित वनों की बलि क्यों दी जानी चाहिए?’

संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया गया, तो वे सरकार के इस फैसले के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे.

मेघालय: नई पेंशन योजना के विरोध में आए शिक्षक

मेघालय में शिक्षक और कर्मचारी नई अधिसूचित मेघालय गैर-सरकारी स्कूल एवं कॉलेज कर्मचारी केंद्रीकृत कोष योजना, 2026 के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा ने 1 अप्रैल 2026 को घोषणा की कि मंत्रिमंडल ने इस योजना के क्रियान्वयन को मंजूरी दे दी है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, ‘गैर-सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में बड़ी संख्या में कर्मचारी संबंधित अधिनियम के तहत अनिवार्य रूप से योगदान कर रहे हैं. हालांकि, इन योगदानों के प्रभावी प्रबंधन और कार्यान्वयन के लिए कोई सुव्यवस्थित सरकारी योजना मौजूद नहीं थी. मंत्रिमंडल की मंजूरी के साथ अब इस योजना को अंतिम रूप दे दिया गया है.’

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

खबरों के अनुसार, हालांकि इस कदम का शुरू में स्वागत किया गया, लेकिन तनाव तब पैदा हुआ जब हितधारकों ने पाया कि 2026 की योजना 2023 के मसौदा पेंशन योजना से पूरी तरह अलग है. 2023 की योजना पर व्यापक परामर्श हुआ था और इसे सरकार तथा कर्मचारी प्रतिनिधियों दोनों ने आपसी सहमति से स्वीकार किया था, तथा यह अदालत के रिकॉर्ड का भी हिस्सा है.

कर्मचारियों का तर्क है कि नई योजना उनकी दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा को खतरे में डालती है, क्योंकि इसमें 2010 से पहले के सीपीए (भविष्य निधि) कर्मचारियों को 2010 के बाद के एनपीएस (राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली) कर्मचारियों के साथ मिला दिया गया है, जिससे असंगतियां पैदा होती हैं. उन्हें आशंका है कि प्रस्तावित वार्षिकी-आधारित मॉडल, जिसमें आंशिक निकासी की अनुमति है, स्थिर सेवानिवृत्ति लाभ सुनिश्चित नहीं करेगा, और वे अनिवार्य पीआरएएन (स्थायी सेवानिवृत्ति खाता संख्या) खातों का भी विरोध कर रहे हैं.

उनका यह भी कहना है कि यह योजना मौजूदा कानूनी सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करती है, जबकि यह मामला अभी भी अदालत में लंबित है. अपनी बचत और अधिकारों पर खतरे का हवाला देते हुए विभिन्न संगठनों ने सर्वसम्मति से इस योजना को खारिज कर दिया है और सरकार को अपनी आपत्तियां सौंप दी हैं.

विरोध प्रदर्शन के बैनरों में भी यही चिंताएं झलक रही थीं, जिन पर ‘यह दान नहीं, न्याय है’, ‘हमारा भविष्य तय करने के लिए आपसी सहमति जरूरी है’, ‘लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षक अनिश्चितता के बीच छोड़े गए’ और ‘सेवानिवृत्ति शांति लानी चाहिए, उत्पीड़न नहीं’ जैसे नारे लिखे थे.

हालांकि, सरकार का यह कहना है कि 2026 की केंद्रीकृत कोष योजना एक आवश्यक कदम है; इसके समर्थन में सरकार ने इसके कानूनी आधार और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को कोष प्रबंधक के रूप में नियुक्त किए जाने का हवाला दिया है. उठाई गई चिंताओं को स्वीकार करते हुए, इसने कहा है कि यह कार्यान्वयन से जुड़ी वास्तविक समस्याओं की समीक्षा करने और उन्हें हल करने को तैयार है, जबकि एक सुव्यवस्थित और केंद्रीकृत प्रणाली स्थापित करने के अपने रुख पर यह कायम है.

मेघालय: श्री सीमेंट परियोजना की ईआईए रिपोर्ट में कथित अनियमितताओं को लेकर जेएनसी ने आंदोलन की चेतावनी दी

जयंतिया नेशनल काउंसिल (जेएनसी) ने चेतावनी दी है कि यदि मेघालय सरकार 15 मई तक ईस्ट जयंतिया हिल्स में प्रस्तावित श्री सीमेंट परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट पर उठाई गई आपत्तियों का जवाब नहीं देती, तो संगठन मेघालय सचिवालय तक मार्च करेगा.

जेएनसी की केंद्रीय कार्यकारी समिति द्वारा जारी बयान में कहा गया कि संगठन ने 30 अप्रैल को मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमएसपीसीबी), मेघालय राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) और शिलांग स्थित पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय को औपचारिक आपत्तियां सौंपी थीं. इसके बावजूद सरकार की ‘चुप्पी’ पर संगठन ने ‘गंभीर चिंता और गहरी निराशा’ जताई.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/Vmix Film)

मीडिया को संबोधित करते हुए संगठन ने परियोजना प्रस्तावक द्वारा प्रस्तुत ईआईए रिपोर्ट में तीन ‘स्वीकृत विसंगतियों’ का उल्लेख किया.

संगठन का आरोप है कि ईआईए दस्तावेज में गुजरात राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) से संबंधित कार्यवाही का उल्लेख किया गया है, जबकि प्रस्तावित परियोजना ईस्ट जयंतिया हिल्स, मेघालय में स्थित है. परिषद ने सवाल उठाया कि इस दस्तावेज को मेघालय के अधिकारियों ने कैसे स्वीकार कर लिया.

जेएनसी ने रिपोर्ट में भूकंपीय वर्गीकरण मानकों के उल्लेख पर भी आपत्ति जताई. संगठन का दावा है कि भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने इन मानकों को इसी वर्ष की शुरुआत में वापस ले लिया था. संगठन ने कहा कि इन मानकों के वापस लिए जाने के बाद ईआईए रिपोर्ट जमा की गई थी और दस्तावेज में उल्लिखित आपदा प्रबंधन ढांचे की वैधता पर भी सवाल खड़े किए.

इसके अलावा, संगठन ने आरोप लगाया कि छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक भूमिका होने के बावजूद जयंतिया हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (जेएचएडीसी) को परामर्श या सहमति प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया. संगठन ने यह भी कहा कि ईआईए रिपोर्ट के अनुसार परियोजना क्षेत्र के बफर जोन में बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति (एसटी) आबादी निवास करती है.

जेएनसी ने उमियाम झील पर प्रस्तावित ताज रिजॉर्ट परियोजना से सार्वजनिक विरोध के बाद लुमपोंगडेंग द्वीप को बाहर रखने के राज्य सरकार के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया और पूछा कि मौजूदा मामले में अलग रवैया क्यों अपनाया जा रहा है.

संगठन ने आरोप लगाया कि परियोजना से संबंधित पहले की जनसुनवाइयों में स्थानीय निवासियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए गए थे और कंपनी पर स्थानीय संस्थाओं को प्रभावित करने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया.

स्थिति को ‘व्यवस्थित हाशियाकरण’ बताते हुए जेएनसी ने कहा कि वह ‘मूकदर्शक’ बनकर नहीं रहेगा और क्षेत्र की भूमि तथा संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.

जेएनसी अध्यक्ष सांबोर्मी लिंगदोह ने कहा कि संगठन ने साक्ष्य-आधारित आपत्तियां प्रस्तुत की हैं और यदि तय समयसीमा तक कोई जवाब नहीं मिला, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा.

लिंगदोह ने कहा, ‘हम केवल पत्र लिखकर रुक जाने वाला संगठन नहीं हैं. हम उन लोगों की आवाज हैं जिनकी जमीन, पानी, जंगल और संवैधानिक अधिकार दांव पर लगे हुए हैं.’ परिषद ने यह भी चेतावनी दी कि यदि निर्धारित तिथि से पहले उसकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो राज्य सचिवालय की ओर व्यापक लामबंदी की जाएगी.