यूपी: गंगा में ‘इफ़्तार’ केस में आठ युवकों को ज़मानत, शिकायतकर्ता बोले- मुसलमानों के लिए सबक़

भाजयुमो नेता की शिकायत के आधार पर वाराणसी में गिरफ़्तार 14 मुस्लिम युवकोंं में से आठ को इलाहाबाद हाईकोर्ट से ज़मानत मिल गई है. इन युवकों पर गंगा के बीच नाव पर ‘इफ़्तार’ करने और कथित तौर पर बिरयानी खाकर हड्डियां नदी में फेंकने के आरोप सहित कई अन्य आरोप भी लगाए गए हैं.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार (15 मई) को वाराणसी के आठ मुस्लिम युवकों को ज़मानत दे दी. इन सभी को बीते मार्च में गंगा नदी के बीच नाव पर ‘इफ्तार’ करने और कथित तौर पर मांसाहारी खाना खाकर हड्डियां नदी में फेंकने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

मालूम हो कि इस मामले में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के युवा संगठन भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के महानगर अध्यक्ष (वाराणसी) रजत जायसवाल शिकायतकर्ता हैं, जिन्होंने इन युवकों पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया था.

ज़मानत की ख़बर को सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस द्वारा रिपोर्ट किया गया, जिसमें जानकारी दी गई कि गिरफ्तार 14 में से 8 युवकों की ज़मानत का फैसला दो अलग-अलग पीठ द्वारा किया गया.

इस मामले में जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने पांच लोगों को ज़मानत दी. जबकि, जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की अध्यक्षता वाली एक दूसरी बेंच ने तीन लोगों को ज़मानत दी.

जस्टिस सिन्हा द्वारा जारी ज़मानत के आदेश की एक कॉपी, जिसे द वायर ने देखा है, में कहा गया है, ‘आवेदक 17 मार्च 2026 से जेल में बंद हैं और उन्होंने संबंधित कोर्ट और संबंधित पुलिस थाने में एक हलफ़नामा दायर करने का वचन दिया है कि वे भविष्य में ऐसी ही गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे/उन्हें दोहराएंगे नहीं.’

यहां आवेदकों से तात्पर्य मोहम्मद समीर, मोहम्मद अहमद रज़ा और मोहम्मद फैज़ान से है, जिन्हें ज़मानत प्रक्रिया के तहत 50,000 रुपये का बॉन्ड भरने और साथ ही दो ज़मानतदार (ज़मानतदार वह तीसरा पक्ष या गारंटर होता है, जो अदालत को यह भरोसा दिलाता है कि मुकदमे के दौरान आरोपी नियमित रूप से अदालत में पेश होगा) पेश करने के लिए कहा गया है.

ज़मानत आदेश में आगे कहा गया है, ‘एफआईआर के अनुसार, 14 नामज़द आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने गंगा नदी में नाव पर बैठकर इफ़्तार किया और बचा हुआ अवशेष नदी में फेंक दिया, जिसमें चिकन की हड्डियां भी शामिल थीं. आवेदकों ने यह वचन दिया है कि वे भविष्य में ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेंगे.’

वहीं, आरोपी मुस्लिम युवकों की तरफ से पेश हुए बचाव पक्ष के वकील ने कोर्ट में जो दलील दी थी, उसके संबंध में ज़मानत के आदेश में यह बात मानी गई है कि ‘अगर किसी व्यक्ति या लोगों के समूह की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, तो आवेदक इसके लिए माफ़ी मांगते हैं.’

ज़मानत देते समय हाईकोर्ट ने इस बात का भी ध्यान रखा कि गिरफ़्तार किए गए युवकों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.

ज़मानत के आदेश में जस्टिस सिन्हा के हवाले से कहा गया है, ‘तथ्यों की समग्रता, मामले की प्रकृति और रिकॉर्ड से मिले सबूतों पर विचार करने के बाद और मामले के गुण-दोष पर कोई राय ज़ाहिर किए बिना, मैं इसे ज़मानत के लिए एक उपयुक्त मामला मानता हूं.’

‘बदलाव दिखेगा, वरना हम और सख़्त कार्रवाई करेंगे’

इस संबंध में मामले के शिकायतकर्ता और भाजयुमो के ज़िला अध्यक्ष जायसवाल ने द वायर से कहा, ‘हाईकोर्ट ने बहुत अच्छा आदेश दिया है. उन 14 मुस्लिम युवकों को अब एक सबक मिलेगा, और समाज में भी एक अच्छा संदेश गया है कि इन लोगों ने जो गलतियां कीं और हिंदुओं तथा सनातनके प्रति उनके मन में जिस तरह की भावनाएं हैं, अब उन्हें प्रशासन का डर रहेगा.’

जायसवाल ने आगे कहा कि अगर इनमें बदलाव नहीं दिखेगा तो हम और सख़्त कार्रवाई करेंगे.

इस मामले में 16 मार्च को जायसवाल की शिकायत के आधार पर वाराणसी के कोतवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि इन युवकों द्वारा ‘गंगा नदी के बीच में इफ़्तार पार्टी आयोजित करना, चिकन बिरयानी खाना और फिर उसके बचे हुए टुकड़े मां गंगा में फेंक देना, सचमुच बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है.’

जायसवाल ने उस समय पुलिस को दी अपनी शिकायत में यह दावा किया था कि इस हरकत के ज़रिए’ मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले वे नौजवान जानबूझकर एक जिहादी (इस्लामी कट्टरपंथी) सोच को बढ़ावा’ दे रहे हैं.

इसके बाद ‘अज्ञात लोगों’ के खिलाफ़ यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की धारा 298 (किसी भी पूजा स्थल को जान-बूझकर अपवित्र करना), 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण काम करना), 196(1)(b) (धर्म, जाति वगैरह के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाना), 270 (सार्वजनिक उपद्रव), 279 (किसी भी सार्वजनिक जलाशय के पानी को गंदा करना) और 223(b) (सरकारी कर्मचारियों द्वारा जारी आदेशों की अवहेलना करना) के तहत, साथ ही जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 के तहत दर्ज की गई थी.

द वायर से बात करते हुए जायसवाल, जिन्होंने पहले आरोप लगाया था कि एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्हें एक खास समुदाय से जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं, ने दावा किया, ‘लोकल इंटेलिजेंस यूनिट की रिपोर्ट के मुताबिक अभी भी खतरा बना हुआ है. मुझे एक कॉल भी आया था, जिसकी एटीएस (आतंकवाद विरोधी दस्ता) के एक अधिकारी द्वारा जांच किए जाने पर पता चला कि वह पाकिस्तान से आया था.’

जायसवाल के अनुसार, खतरे की इसी आशंका के आधार पर कथित तौर पर मुस्लिम युवकों द्वारा गंगा नदी के बीच में मांसाहारी खाना खाने के मामले में दर्ज एफआईआर के अलावा, यूपी पुलिस ने वाराणसी के सिगरा और कैंट पुलिस स्टेशनों में दो और एफआईआर दर्ज की हैं.

भले ही जायसवाल की पहली शिकायत में यह आरोप लगाया गया था कि ‘चिकन बिरयानी की हड्डियां गंगा नदी में फेंक दी गई थीं – एक ऐसी जगह जहां लाखों देसी और विदेशी टूरिस्ट आते हैं और जहां के पानी का इस्तेमाल आचमन के लिए किया जाता है – जिससे सनातन धर्म मानने वालों की भावनाएं आहत हुईं’, लेकिन आल्ट न्यूज़ द्वारा वायरल वीडियो की गई पड़ताल में नदी के पानी में हड्डियां फेंके जाने का कोई सबूत नहीं मिला.

जायसवाल से जब कथित तौर पर मांस खाने और उसके बाद उसे नदी में फेंके जाने से जुड़े सबूतों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने द वायर को बताया, ‘पुलिस ने दो सबूतों को आरोपों का आधार माना है. पहला, इन लोगों ने एक स्थानीय नाविक से ज़बरदस्ती नाव पर कब्ज़ा कर लिया था और फिर बिंदु माधव मंदिर, जिसे वे (आरोपी मुस्लिम युवकों का ज़िक्र करते हुए) मस्जिद कहते हैं के सामने फ़िलिस्तीन का झंडा भी लहराया था, जबकि हम उसे भगवान विष्णु का निवास मानते हैं. फिर उन्होंने बिरयानी भी खाई और स्थानीय नाविक के बयान के मुताबिक, बचा हुआ खाना नदी में फेंक दिया गया और वहीं हाथ भी धोए गए.’

आल्ट न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, ये दावे अस्पष्ट थे, क्योंकि बिंदु माधव मंदिर और आलमगीर मस्जिद के बीच की दूरी 500 मीटर थी, और उनके बीच एक दूसरी मस्जिद- यानी धरहरा मस्जिद भी मौजूद थी.

बता दें कि इस रिपोर्ट को लिखे जाने के समय तक, जिन आठ मुस्लिम युवकों को ज़मानत मिली है, उनके परिवारों और उनके वकील से संपर्क नहीं हो पाया है.

इस संबंध में वाराणसी के कोतवाली थाने के प्रभारी दया शंकर सिंह ने बताया कि इस मामले में जांच अभी भी जारी है और पुलिस  लगभग एक महीने में चार्जशीट दाखिल कर देगी.’

जांच के दौरान अब तक जुटाए गए सबूतों की प्रकृति के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने वायरल वीडियो के अलावा कोई और टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और हम और सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं.’

इस मामले की अगली सुनवाई 18 मई को होनी है.

इस बीच भाजपा लीगल सेल के संयोजक ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को पत्र लिखकर मक्का और वेटिकन की तर्ज पर वाराणसी के लिए ‘विशेष दर्जा’ देने की मांग की है.

इस संबंध में काशी क्षेत्र में भाजपा लीगल सेल के संयोजक और भाजयुमो नेता जायसवाल के वकील एडवोकेट शशांक शेखर त्रिपाठी ने कहा, ‘चूंकि आरोपी पहले ही दो महीने जेल में बिता चुके थे, इसलिए ऐसे मामले में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा ज़मानत देने का यही आधार बना.’

पुलिस केस डायरी के संबंध में किसी भी संबंधित सबूत के बारे में पूछे जाने पर एडवोकेट त्रिपाठी ने कहा, ‘जहां तक ​​नाविक के अपहरण का सवाल है, हमारे पास सबूत थे. वायरल वीडियो के अलावा, चश्मदीदों की गवाही इस मामले में सबूत का आधार है.’

एडवोकेट त्रिपाठी ने आगे आरोप लगाया, ‘यह जानबूझकर वाराणसी के पंचगंगा घाट पर किया गया था, जो हम हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है.’

उल्लेखनीय है कि इस घटना के बाद 13 अप्रैल को वकील त्रिपाठी ने वाराणसी के ज़िलाधिकारी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की आधिकारिक आईडी पर एक मेल भेजा था, जिसका विषय: ‘वाराणसी को वेटिकन, मक्का और मदीना की तरह विकसित करने और गंगा संरक्षण के साथ-साथ इसकी धार्मिक पवित्रता को बनाए रखने के संबंध में’ था .

मालूम हो कि वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है.

इस मेल में कहा गया था, ‘मक्का, मदीना और वेटिकन सिटी की तर्ज़ पर वाराणसी में भी इसी तरह के विकास कार्य शुरू करना ज़रूरी है, जहां एक सख़्त धार्मिक आचार संहिता लागू हो और एक विशेष सुरक्षा बल (धार्मिक पुलिस) ड्यूटी पर तैनात हो.’

इस मेल के स्क्रीनशॉट द वायर ने देखे हैं.

हालांकि, एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट सिटी ने मेल मिलने की बात स्वीकार की, लेकिन पीएमओ की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं आया.

जब उनसे पूछा गया कि क्या उनका मतलब वाराणसी में मुसलमानों की आवाजाही पर रोक लगाने से है, तो वकील त्रिपाठी ने कहा, ‘हमारे धार्मिक स्थल टूरिस्ट स्पॉट नहीं हैं. इसलिए, वेटिकन या मक्का और मदीना की तरह- या उदाहरण के लिए, दक्षिण के कुछ मंदिरों में लागू ड्रेस कोड की तरह- यहां भी एक निश्चित आचार संहिता का पालन किया जाना चाहिए, ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों.’

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