नीदरलैंड में मोदी सरकार से प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर तीखे सवाल, भारतीय राजनयिक से बहस

12 वर्षों से अधिक के अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते रहे हैं. इसमें विदेशी दौरों के दौरान होने वाली खुली और बिना पूर्व-निर्धारित सवालों वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी शामिल हैं. इसके बजाय वे मेजबान देशों के नेताओं के साथ पहले से तैयार संयुक्त बयान देना पसंद करते रहे हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर: 17 मई 2026 को नीदरलैंड दौरे के दौरान प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने डच समकक्ष रॉब येटेन के साथ. (Photo: @MEAIndia/X via PTI Photo)

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान हेग में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया.

हालांकि इस यात्रा का आधिकारिक कूटनीतिक उद्देश्य व्यापार, रक्षा और सेमीकंडक्टर तकनीक पर आधारित द्विपक्षीय संबंधों को ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ के स्तर तक पहुंचाना था, लेकिन डच पत्रकारों और भारतीय राजनयिक के बीच हुई तीखी बातचीत ने पश्चिमी पत्रकारिता मानकों और मोदी सरकार की कड़े नियंत्रण वाली जनसंपर्क प्रक्रिया के बीच गहरे तनाव को उजागर कर दिया.

क्या है पूरा मामला?

जैसा कि द वायर की पत्रकार देवीरूपा मित्रा ने अपनी रिपोर्ट में बताया, नरेंद्र मोदी के सम्मान में हेग के बाहर स्थित डच प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास कैटशुइस में आयोजित रात्रिभोज से पहले प्रधानमंत्री रॉब येटेन ने स्थानीय पत्रकारों से बातचीत की.

इस दौरान येटेन से नीदरलैंड और भारत के संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर सवाल पूछे गए.

मोदी के पहुंचने से ठीक पहले येटेन ने पत्रकारों से कहा कि मोदी की भाजपा सरकार के तहत ‘भारत में हो रहे घटनाक्रमों’ को लेकर नीदरलैंड और यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देशों के बीच चिंताएं मौजूद हैं.

इसके बाद इस मुद्दे को प्रमुख डच अखबार डे फोल्क्सक्रांट के पत्रकार अशवंत नंद्राम ने आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान सीधे रिकॉर्ड पर ला दिया. उन्होंने भारतीय प्रतिनिधिमंडल से यह सवाल पूछा:

‘मैं डच अखबार डे फोल्क्सक्रांट के लिए पत्रकार हूं. मेरे कुछ सवाल हैं. नीदरलैंड में यह परंपरा रही है कि ऐसी यात्रा के बाद दोनों प्रधानमंत्री सवालों के जवाब देने के लिए उपलब्ध होते हैं. मैं जानना चाहता हूं कि आज ऐसा क्यों नहीं हो रहा है.

दूसरी बात यह है कि आज प्रधानमंत्री रॉब येटेन ने अपने बयान में कहा कि नीदरलैंड और यूरोपीय संघ को प्रेस की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर चिंता है, जिनमें मुस्लिम समुदाय और अन्य छोटे समुदाय शामिल हैं. मैं जानना चाहता हूं कि इस पर भारत सरकार की क्या प्रतिक्रिया है.’

अशवंत नंद्राम के सीधे सवालों का सामना करते हुए विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने एक आक्रामक जवाबी तर्क पेश किया, जिसका इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संबंधी आलोचनाओं को खारिज करने के लिए करता रहा है.

राजनयिक ने पत्रकार की चिंताओं को उसकी ‘जानकारी की कमी’ के रूप में पेश करने की कोशिश करते हुए कहा, ‘इस तरह के सवाल मूल रूप से इसलिए उठते हैं क्योंकि सवाल पूछने वाले व्यक्ति में समझ की कमी होती है.’

इसके बाद उन्होंने भारत की 1.4 अरब आबादी, बड़े पैमाने पर मतदान और 90 करोड़ स्मार्टफोन से संचालित ‘बहसों और असहमतियों से भरे लोकतंत्र’ का हवाला देते हुए इसे एक जीवंत नागरिक समाज का प्रमाण बताया. उन्होंने दावा किया कि आजादी के समय भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी 11 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 20 प्रतिशत से अधिक हो गई है. उन्होंने आलोचकों को चुनौती देते हुए कहा कि वे किसी ऐसे दूसरे देश का उदाहरण बताएं, जहां अल्पसंख्यक आबादी में इस तरह की वृद्धि हुई हो.

अपने बचाव में उन्होंने भारत की 5,000 साल पुरानी बहुलतावादी विरासत का भी उल्लेख किया और कहा कि ईसाई धर्म, इस्लाम और यहूदी धर्म जैसे समुदायों को भारत में ऐतिहासिक रूप से शरण मिली और उन्हें किसी संस्थागत उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा.

हालांकि, भारतीय राजनयिक की यह कोशिश कि आलोचना को एक पत्रकार की ‘समझ की कमी’ बताकर खारिज किया जाए, तब पूरी तरह कमजोर पड़ गई जब डच अखबार एनआरसी की पत्रकार मेरेल ने आगे सवाल करते हुए स्पष्ट किया कि ये चिंताएं किसी पत्रकार की व्यक्तिगत पक्षधरता का परिणाम नहीं थीं, बल्कि सीधे डच प्रधानमंत्री के बयानों की प्रतिध्वनि थीं.

इसके बाद हुई तीखी बहस ने उस सटीक क्षण को सामने ला दिया, जब लगातार पूछे जा रहे सवालों के दबाव में कूटनीतिक पटकथा बिखरती हुई दिखाई दी:

मेरेल ने कहा:

‘मेरा नाम मेरेल थी है और मैं डच अखबार एनआरसी से हूं. और जब आप मेरे सहयोगी का जिक्र कर रहे थे, तो वह दरअसल हमारे प्रधानमंत्री के उस बयान का हवाला दे रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें भारत में अल्पसंख्यकों और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता है. तो क्या हमारे प्रधानमंत्री के ऐसा कहने से आपको परेशानी होती है?’

इस पर सिबी जॉर्ज ने जवाब दिया:

‘नहीं, मैं सिर्फ उस विषय पर तथ्यात्मक स्थिति बता रहा था. और वही तथ्यात्मक स्थिति बनी हुई है. भारत को समझने और भारत की सराहना करने के लिए आपको भारत के बारे में अधिक समझ विकसित करनी होगी.’

इसके जवाब में मेरेल थी ने कहा:

‘तो फिर प्रधानमंत्री [येटेन] को भारत को और बेहतर समझने की जरूरत है, क्योंकि यह बात हम नहीं कह रहे हैं.’

इसके बाद जॉर्ज ने कहा:

‘मैंने वह बयान नहीं देखा है. मैं उस सवाल का जिक्र कर रहा हूं, जो उस विषय पर उठाया गया था, यानी स्वतंत्रता के मुद्दे पर. और मुझे लगता है कि मैंने स्पष्ट कर दिया है कि भारत कितना खूबसूरत देश है. धन्यवाद.’

‘मैंने वह बयान नहीं देखा है’ कहकर भारतीय राजनयिक ने एक तरह से सोच-समझकर पीछे हटने की कोशिश की, ताकि मेजबान देश के साथ सीधे कूटनीतिक विवाद की स्थिति पैदा न हो. इससे उन्हें उस वास्तविकता से बच निकलने का मौका मिल गया कि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री — यानी वही नेता जो भारतीय प्रधानमंत्री की मेजबानी कर रहे थे — मोदी सरकार के लोकतांत्रिक और मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर गंभीर चिंताएं रखते हैं.

यह पूरा घटनाक्रम नई दिल्ली की बनाई गई छवि और देश के भीतर की वास्तविकताओं के बीच मौजूद गहरे अंतर को उजागर करता है. साथ ही यह उस व्यवस्था की कमजोरी भी दिखाता है, जो स्वतंत्र जांच-पड़ताल और आलोचनात्मक सवालों के प्रति असहज और विरोधी रवैया रखती है.

जब मोदी सरकार को उसके सावधानीपूर्वक नियंत्रित मीडिया माहौल से बाहर आकर सवालों का सामना करना पड़ा, तो वह ठोस और तथ्यात्मक जवाब देने में असमर्थ दिखाई दी. इससे यह स्पष्ट हुआ कि खुद को ‘लोकतंत्र की जननी’ बताने के दावों के पीछे जवाबदेही के प्रति गहरा प्रतिरोध मौजूद है.

यह घटना क्या दिखाती है

इस पूरे घटनाक्रम ने यह उजागर कर दिया कि जब मोदी सरकार की पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय सफाई और बचाव की रणनीति का सामना स्वतंत्र प्रेस के अस्क्रिप्टेड और सीधे सवालों से होता है, तो उसकी सीमाएं सामने आ जाती हैं.

12 वर्षों से अधिक के अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचते रहे हैं. इसमें विदेशी दौरों के दौरान होने वाली खुली और बिना पूर्व-निर्धारित सवालों वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी शामिल हैं. इसके बजाय वे मेजबान देशों के नेताओं के साथ पहले से तैयार संयुक्त बयान देना पसंद करते रहे हैं.

नीदरलैंड जैसे लोकतांत्रिक देशों में, जहां मीडिया के प्रति जवाबदेही कूटनीतिक परंपरा का सामान्य हिस्सा मानी जाती है, वहां पत्रकार इस तरह की दूरी और नियंत्रण को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने की कोशिश के रूप में देखते हैं.

वर्ष 2023 में जब व्हाइट हाउस ने घोषणा की थी कि मोदी और उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे, तब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा था कि यह ‘एक बड़ी बात’ है, क्योंकि मोदी भारत में मीडिया के सवालों का जवाब देने से बचने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं.

लंदन में नवंबर 2015 के बाद यह पहली बार था जब मोदी ने किसी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब दिए थे.

उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक पत्रकार ने मोदी से पूछा था:

‘भारत लंबे समय से खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताता रहा है, लेकिन कई मानवाधिकार संगठन कहते हैं कि आपकी सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया है और अपने आलोचकों की आवाज दबाने की कोशिश की है. आप और आपकी सरकार मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बेहतर बनाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाने को तैयार हैं?’

इसके जवाब में मोदी ने सीधे उत्तर देने से बचते हुए भारत के संविधान का जिक्र किया. लेकिन इसके बाद सबरीना सिद्दीकी को ऑनलाइन भारी ट्रोलिंग और हमलों का सामना करना पड़ा. हिंदुत्व समर्थक नेताओं और समर्थकों ने उन्हें निशाना बनाया, यहां तक कि बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन को भी इस ऑनलाइन उत्पीड़न की कड़ी निंदा करनी पड़ी.

30 अप्रैल को जारी रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के 2026 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है.