नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन को पिता की क़ब्र पर श्रद्धांजलि देने से रोके जाने के बाद कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता मीरवाइज उमर फारूक ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि उन्हें उस समय उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया, जब वे अपने पिता की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने की तैयारी कर रहे थे.
सज्जाद लोन श्रीनगर स्थित शहीद मज़ार जाकर अपने पिता अब्दुल गनी लोन को श्रद्धांजलि देना चाहते थे. इसके अलावा पार्टी की ओर से हंदवाड़ा कार्यालय में एक स्मृति कार्यक्रम भी आयोजित किया जाना था, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया.
सज्जाद लोन ने एक्स पर लिखा, ‘मैं अपने सहयोगियों के साथ आज शहीदों के कब्रिस्तान जाकर अपने पिता अब्दुल गनी लोन के लिए फातेहा पढ़ने वाला था, जिनकी 22 साल पहले 21 मई को आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी. लेकिन सुबह-सुबह पुलिस आई और मुझे बताया कि मुझे घर में नजरबंद कर दिया गया है.’
उधर, कश्मीर के मुख्य धार्मिक नेता मीरवाइज उमर फारूक ने भी अपने पिता मौलवी मोहम्मद फारूक की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी और बताया कि उन्हें बुधवार शाम से ही घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई है. उन्होंने अब्दुल गनी लोन को भी याद किया.
मीरवाइज ने कहा, ’21 मई कश्मीर के इतिहास के सबसे दर्दनाक दिनों में से एक की याद दिलाता है. इसी दिन लोगों ने अपने प्रिय नेता शहीद-ए-मिल्लत मीरवाइज मौलवी फारूक को खोया था. इसके बाद जो हिंसा हुई, उसमें 70 से अधिक लोगों की जान चली गई और सैकड़ों घायल हुए. यह घटना आज भी लोगों की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है. वर्षों बाद इसी दिन एक और विवेकशील आवाज को खामोश कर दिया गया, जब ख्वाजा अब्दुल गनी लोन हमसे छीन लिए गए.’
उन्होंने यह भी कहा कि ‘धमकी, शक्ति प्रदर्शन और मीडिया पर नियंत्रण’ के जरिए लोगों को अपने नेताओं और हवाल के शहीदों को श्रद्धांजलि देने से रोकना दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है.
मीरवाइज ने कहा कि लोगों को ईदगाह स्थित मजार-ए-शुहदा जाकर व्यक्तिगत रूप से फातेहा पढ़ने की भी अनुमति नहीं दी जा रही है. उन्होंने कहा, ‘मैं खुद कल शाम से नजरबंद हूं. दमनकारी तरीके न तो वास्तविकता बदल सकते हैं और न ही इन नेताओं के योगदान और लोगों के दिलों में उनकी जगह को मिटा सकते हैं.’
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी दोनों नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका ‘सर्वोच्च बलिदान’ जम्मू-कश्मीर के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और योगदान की याद दिलाता है.
महबूबा ने कहा, ‘जब हम उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं, तो हम अपने संवैधानिक अधिकारों की बहाली, सम्मानजनक स्थायी शांति और भय तथा दबाव से मुक्त कल्याणकारी व्यवस्था के निर्माण के संकल्प को दोहराते हैं.’
