मध्य प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट का अडानी की कोल ब्लॉक परियोजना को मिली वन मंज़ूरी में दखल से इनकार

अडानी समूह को मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में स्थित धिरौली कोयला ब्लॉक में खनन की अनुमति दी गई है. इस परियोजना के कारण सिंगरौली के लगभग 27 वर्ग किलोमीटर घने सदाबहार जंगल में फैले करीब छह लाख पेड़ों की कटाई होगी. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर करने में देरी का हवाला देते हुए पर्यावरण मंज़ूरी के मामले में दख़ल देने से इनकार कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया. (फोटो: पिनाकपानी/विकिमीडिया कॉमन्स. CC BY-SA 4.0.)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (21 मई) को मध्य प्रदेश के सिंगरौली ज़िले में अडानी ग्रुप के कोयला ब्लॉक प्रोजेक्ट को दी गई पर्यावरण मंज़ूरी में दखल देने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने मंज़ूरी को चुनौती देने में हुई देरी का हवाला दिया.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के 22 अप्रैल के आदेश को चुनौती दी गई थी.

एनजीटी ने मई 2025 में अडानी पावर की सहायक कंपनी महान एनर्जेन लिमिटेड को दी गई पर्यावरण मंज़ूरी के खिलाफ दुबे की याचिका को समयसीमा (limitation) के आधार पर खारिज कर दिया था.

देरी पर सवाल उठाते हुए पीठ ने मौखिक रूप से कहा, ‘आपकी मूल याचिका ही 22 जनवरी को दाखिल की गई थी… इतनी देरी क्यों हुई?’

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट, 2010 की धारा 16 के तहत वैधानिक अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों को आमतौर पर 30 दिनों के भीतर चुनौती दी जानी चाहिए. यदि कोई ठोस कारण बताया जाता है, तो 60 दिनों का अतिरिक्त विस्तार भी दिया जा सकता है.

अजय दुबे की ओर से पेश अधिवक्ता सिद्धार्थ गुप्ता ने तर्क दिया कि यह मामला गंभीर पर्यावरणीय चिंताओं से जुड़ा है और तकनीकी आपत्तियों के कारण संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की असाधारण शक्तियों के प्रयोग में बाधा नहीं आनी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘यह एक गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा है. यह कोई विरोधी मुकदमा नहीं है. अनुच्छेद 142 के तहत इस कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां एनजीटी एक्ट द्वारा किसी भी तरह से कम या प्रभावित नहीं होती हैं. किसी को तो इन मंज़ूरियों की न्यायिक जांच करनी ही होगी.’

गुप्ता ने आगे कहा कि इस परियोजना के कारण सिंगरौली के लगभग 27 वर्ग किलोमीटर घने सदाबहार जंगल में फैले करीब छह लाख पेड़ों की कटाई होगी. यह क्षेत्र 2011 में ‘नो-गो’ क्षेत्र घोषित किया गया था और इसे हाथियों के गलियारे के रूप में भी मान्यता प्राप्त है.

हालांकि, अडानी समूह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एएनएस नाडकर्णी ने अदालत से याचिका खारिज करने का आग्रह किया.

पीठ ने कहा कि एनजीटी ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 2025 के टल्ली ग्राम पंचायत बनाम भारत संघ मामले के फैसले पर भरोसा किया था, जिसमें अदालत ने धारा 16 के तहत समयसीमा के दायरे की समीक्षा की थी.

पीठ ने कहा, ‘उस मामले में विस्तृत सुनवाई हुई थी. उस समय भी हम चिंतित थे क्योंकि मामला पर्यावरणीय मुद्दे से जुड़ा था.’

गुप्ता ने दलील दी कि एनजीटी ने समयसीमा की गणना गलत तरीके से 10 मई, 2025 से की, जिस दिन वन मंजूरी को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया था.

उन्होंने टल्ली ग्राम पंचायत फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पर्यावरणीय स्वीकृति आदेश केवल मंत्रालय की वेबसाइट पर डालना पर्याप्त नहीं है. इन्हें दो स्थानीय समाचारपत्रों में प्रकाशित करना और संबंधित ग्राम पंचायतों तथा नगर निकायों की वेबसाइटों पर भी डालना आवश्यक है, ताकि जनता को उचित जानकारी मिल सके.

इसके बाद पीठ ने सुझाव दिया कि अजय दुबे इस मामले को रिट याचिका के माध्यम से आगे बढ़ा सकते हैं. इस पर गुप्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए उन्हें अन्य कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी.

मालूम हो कि अडानी समूह को सिंगरौली जिले में स्थित धिरौली कोयला ब्लॉक में खनन की अनुमति दी गई है. 2025 सितंबर में समूह ने घोषणा की थी कि उसे केंद्रीय कोयला मंत्रालय से खनन शुरू करने की मंजूरी मिल गई है. यह खदान अडानी पावर की सहायक कंपनी महान एनर्जेन लिमिटेड संचालित कर रही है.

लगभग 27 वर्ग किलोमीटर में फैला यह कोयला ब्लॉक प्रदेश के सबसे बड़े ब्लॉकों में से एक है. इस क्षेत्र में करीब 5.70 लाख पेड़ों की कटाई जारी है.

सरकार के अनुसार, इस परियोजना के लिए कुल 2,672 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, जिसमें आठ गांवों की 554 हेक्टेयर से अधिक निजी भूमि और 1,335 हेक्टेयर संरक्षित वन क्षेत्र शामिल है.