इतिहास की थाली और भूख का स्वाद

पुस्तक अंश: 'दुनिया में जितना अनाज सड़ता है या जितना भोजन रोज़ फेंक दिया जाता है, उसको सही से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो समस्या काफ़ी हद तक हल हो जाएगी, मगर ऐसा होता नहीं है. सत्ता ख़ुद को पक्ष विपक्ष में बांट लेती है और सत्ता की भूख पेट भरने से नहीं सामने वाले पक्ष को भूखा रखने से मिटती है.' पढ़िए अनिमेष मुखर्जी की 'इतिहास की थाली' का यह हिस्सा.

(फोटो साभार: पेंगुइन स्वदेश/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

एक बेहद चर्चित घटना है, सन् 1972 की बात हैं, जब एंडीज़ की पहाड़ियों में उरुग्वे का एक हवाई जहाज़ क्रैश हो गया था. पायलट की गलती से 45 लोग ऐसी जगह पर क्रैश हुए, जहाँ सिवाय बर्फ़ के कुछ नहीं था. न पत्ते, न जानवर, न कुछ और. जो लोग ज़िंदा बचे थे, वे समुद्र किनारे के लोग थे और पहली बार बर्फ़ देख रहे थे. एक हफ़्ते में खाद्य सामग्री ख़त्म हो गई. इसके बाद जीवित रहने का एक ही तरीका था, आस-पास मौजूद एकमात्र भोजन को खाना. लोगों ने ज़िंदा रहने के लिए, अपने दोस्तों और परिवार की लाशों से पेट भरा. एक दूसरे को ‘अनुमति’ दी कि जो मर जाएगा, उसकी लाश को दूसरा ज़िंदा रहने के लिए इस्तेमाल कर सकता है. जब 72 दिन बाद ये लोग रेस्क्यू किए गए, तो वे मानवीय आंतरिक अंगों और दिमाग़ तक खा चुके थे.

ये घटना इंसान की सोच को समझने का एक अच्छा मौका देती है. ये सभी लोग धार्मिक थे, इनमें से कुछ ने ईश्वर से प्रार्थना करके, ये काम शुरू किया. कुछ ने माफ़ी भी माँगी, कुछ ने इसके समर्थन में तर्क भी खोज लिए. कुछ ने इसमें हिस्सा नहीं लिया और मर गए, तो कुछ ने अपने परिवार के सदस्यों को हाथ नहीं लगाने दिया. कहने का मतलब है कि इंसान अक्सर फ़ैसला पहले लेता है, उसके समर्थन या विरोध में तर्क बाद में तय करता है और अभावों में तय किए गए निष्कर्ष अक्सर स्थाई होते हैं.

आप कहेंगे कि ये तो कहानियां हैं या एक दुर्लभ घटना है. रोज़-रोज़ ऐसा नहीं होता है, तो चलिए आपकोपैग-पैगके बारे में बताते हैं. फ़िलीपींस में गरीबों का आहार अक्सरपैग-पैगसे पूरा होता है. बड़े-बड़े फास्टफ़ूड रेस्त्रां रोज़ ढेर सारा भोजन फेंकते हैं. इसमें दोनों तरह का भोजन होता है, वह भी जो खराब हो रहा था और वह भी जो ग्राहक ने प्लेट या कार्डबोर्ड बॉक्स में जूठन के तौर पर छोड़ दिया था. इस भोजन को काली पन्नियों में बंद करके कूड़े के पहाड़ों पर फेंक दिया जाता है. पैग-पैग बनाने वाले लोग उस कूड़े में से ये पन्नियां तलाशते हैं और उस जूठन को जमा करते हैं.

बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक इस जूठन के एक पैकेट की कीमत क़रीब 40-50 भारतीय रुपए के बराबर होती है. इससे हड्डियां वगैरह निकालकर उसे साफ़ किया जाता है और लहुसन, प्याज़ के साथ नई ग्रेवी बनाई जाती है. तैयार होने के बाद यह पैग-पैग 15-20 रुपए में प्लेट भरकर बेचा जाता है. फ़िलीपींस की राजधानी मनीला के गरीब इलाकों में पैग-पैग परोसने वाले कई लोग हैं और गरीब तबके के तमाम लोगों के लिए यह रोज़मर्रा का आहार है. हो सकता है कि हम इसे पचा भी न पाएं, लेकिन कहते हैं न कि मजबूरी हर चीज़ सिखा देती है, तो लोग इस पैग-पैग को आसानी से पचा लेते हैं.

फ़िलीपींस ही क्यों भारत की बात करें, यहां संभ्रांत घरों में लोग चूहे को देखकर डर से उछलते हैं, वहीं मुसहर जनजाति के लोग खुशी से उछलते हैं, जाति प्रथा के सबसे निचले पायदान पर मौजूद इस जाति का भोजन चूहा है. वह जीव जिसे कोई अपने घर में नहीं देखना चाहता, एक समुदाय उस पर ज़िंदा रहता है. लोग कहेंगे कि ये सब संसाधनों की कमी की वजह से है. जवाब है नहीं, ये संसाधनों की भूख की वजह से है.

दुनिया में जितना अनाज सड़ता है या जितना भोजन रोज़ फेंक दिया जाता है, उसको सही से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो समस्या काफ़ी हद तक हल हो जाएगी, मगर ऐसा होता नहीं है. सत्ता ख़ुद को पक्ष विपक्ष में बांट लेती है और सत्ता की भूख पेट भरने से नहीं सामने वाले पक्ष को भूखा रखने से मिटती है.

उदाहरण के लिए विश्व युद्ध को ही लीजिए.  मैंने अपने रूसी सहकर्मी से जब एक दिन दफ़्तर में खाना परोसते समय पूछा कि क्या उसे भी नूडल्स का सूप चाहिए. उसने मना कर दिया और कहा कि दोबारा कभी इस सूप के लिए न पूछें. इसका कारण था सीज़ ऑफ़ लेनिनग्राद नाम की घटना, जिससे उसकी सांस्कृतिक यादें जुड़ी थीं. द्वितीय विश्व युद्ध के समय रूस के लेनिनग्राद शहर पर पर जर्मन सेना ने घेरा बंदी की थी. ये घेराबंदी 872 दिन यानि दो साल से ज़्यादा समय तक चली थी.

जर्मन हुक्मरानों का मानना था कि लेनिनग्राद के लोग एक दूसरे को मारकर खाने लगेंगे. ऐसा बड़े पैमाने पर तो नहीं हुआ, लेकिन राशन कार्ड के लिए हत्याएं ज़रूर हुईं. माँ-बाप डरते थे कि अंधेरे में उनके छोटे बच्चों को लोग मारकर खा जाएंगे. लेनिनग्राद और अन्य तमाम जगहों पर फँसे लोगों ने जब तक संभव रहा, उबले पानी में नूडल डालकर सूप बनाकर अपने बच्चों को खिलाया, क्योंकि एक दिन में एक साबुन की टिक्की के बराबर मिलने वाले ब्रेड के राशन से किसी का भी पेट नहीं भरता था.

एक बात सोचिए, जब जर्मन इस तरह का खाना खा रहे थे, तो हिटलर के कैंप में बंद यहूदियों को क्या खाना मिल रहा होगा?

पोलैंड वगैरह में इन कैंप से बच निकले लोगों के अनुभव रिकॉर्ड किए गए. कैंप से निकले लोगों के इन अनुभवों का अध्ययन करने पर एक बात समझ आती है कि इंसान जब जानवर बनता है, तो जानवर भी उससे ख़ौफ़ खाते हैं. मगर यहां समझने वाली बात ये है कि जानवर दो तरह से बना जा सकता है. एक शोषक बनकर और दूसरा असीमित पीड़ा झेलकर. एक और बात इन अनुभवों को पढ़कर समझ आती हैं कि इंसान के अंदर कुछ ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जो कभी नहीं छूटतीं.

अलग-अलग कंसनट्रेशन कैंप में अलग अलग चीज़ें मिलती थीं, मगर कुछ चीज़ें कॉमन थीं. इन कैंप में सूप सबसे आम चीज़ थी. ये सूप आलू से बनता था और ये आलू न धोए जाते थे, न छीले जाते थे. बस आधे-आधे काट दिए जाते थे. शुरूआत में कुछ लोगों ने अपने साथियों को सलाह दी कि इस सूप में पड़े छिलकों को थूक दें, क्योंकि इन्हें साफ़ नहीं किया गया है.

उन लोगों ने इनकी बात तो सुनी ही नहीं, बल्कि भूख लगने पर बाक़ी लोगों के थूके हुए छिलकों को भी खा गए. इस सूप को निगलने के बाद तेज़ प्यास लगती थी, मगर पानी नहीं मिलता था. जो पानी उपलब्ध था, वो पीने लायक़ नहीं था, जिन लोगों ने वो पानी पिया वो कुछ ही दिनों में बीमारी से मर गए.

एक अन्य कैंप में खाने के लिए सफ़ेद चुकंदर का गूदा दिया जाता था, यह गूदा चुकंदर से चीनी निकाल लेने के बाद बचता था और मवेशियों के चरने लायक़ था. इस कैंप में कैदियों को पालक भी दी गई. जिसमें पालक के नाम पर घास से लेकर ओक की सूखी पत्तियां तक मिली होती थीं. भोजन बदलता रहता था बस एक बात स्थायी थी कि ज़्यादातर मौक़ों पर इनमें से किसी भी चीज़ में नमक और चीनी नहीं होते थे.

एक कैदी का संस्मरण है कि उसने एक रात ऐसा सूप पिया जिसमें नमक काफ़ी ज़्यादा था. इसके बाद उसे असहनीय प्यास लगी. पानी सिर्फ़ पोंछे की बाल्टी में उपलब्ध था. उस पानी में फ़िनायल मिला हुआ था. उस आदमी ने वो फ़िनायल वाला पानी पी लिया. वो शख्स मरते-मरते बचा. हां, उसे तब भी सुकून था कि प्यास बुझ गई.

समय बीतता गया और लोगों की भूख बढ़ती गई. कुछ लोगों ने ज़िंदा चूहे खाए. कई लोगों ने मेढकों का काम तमाम किया. इन कैदियों में रसोइयों से लेकर कसाई तक थे. रात के अंधेरे में जर्मन लोगों के कुत्तों को पकड़कर काटा गया और रात में ही उनका सूप बनाकर सारे सबूत मिटा दिए गए. इस तरह की भूख से जूझ रहे लोग अपने आपको बचाए रखने के लिए भविष्य की बातें करते थे, धर्म की बातें करते थे, रेसिपी शेयर करते थे कि आज़ाद होने पर क्या खाएंगे. किस जगह कमाल के सैंडविच मिलते हैं, कहां का मिल्क-शेक ज़रूर पीना चाहिए.

इन तमाम लोगों में बहुत से यहूदी ऐसे थे, जिनकी मानसिक हालत सुधार के परे चली जाती थी. जो नालियों से से पत्ता गोभी के टुकड़े निकालकर खा लेते. किसी की उल्टी में से भोजन के निवालों को चुनकर खा जाते. जर्मन घोड़ों के टापों के निशान में भरा पानी पी लेते. इनके लिए बाकी यहूदी भी मान लेते थे कि ये अब ठीक नहीं हो सकते. अब है कहानी का सबसे दिलचस्प, सबसे दर्दनाक, और सबसे अजीब पहलू.

कंसन्ट्रेशन कैंप में बंद यहूदी नस्लभेद का शिकार थे. ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ आर्य नस्ल का मानने वाला हिटलर इन्हें नस्लभेद के कारणसाफ़कर रहा था. मगर इन यहूदियों ने जीवन में निकृष्टता के स्तर पर पहुंच चुके सजातीय लोगों के लिए जो शब्द गढ़ा वो भी नस्ल-भेदी था. यहूदी ऐसे साथियों कोमुसलमान’ (Muselmann) कहते थे और ये एक स्थापित शब्द था.

मसलन, 1967 में प्रकाशित हुआ पेपर कहता है, ऑश्वित्ज़ में किसी कैदी को मुसलमान वाली स्थिति में पहुंचने में 15 महीने लगते थे. मुसलमान कंडीशन में पहुंच चुके लोग कुछ भी चबाते थे. धूप में काम करने वाले लोग, जल्दी मुसलमान कंडीशन में पहुंचते थे. मतलब, ऐसे लोग जिनके बचने की कोई उम्मीद नहीं होती.

अब सवाल है कि ये मुसलमान शब्द आया कहां से. इसके बारे में कुछ लोग कहते हैं कि इसकी शुरुआत जर्मन सैनिकों ने की. ऐसा हो सकता है, मगर शब्द यहूदी क़ैदियों ने काफ़ी इस्तेमाल किया. कुछ लोग इस मुसलमान शब्द की एक व्याख्या ये भी देते हैं कि खड़े रहने में असमर्थ क़ैदी इस तरह से गिर पड़ते थे, जैसे इस्लाम को मानने वाले सजदे के दौरान होते थे. वहीं, कुछ का कहना है कि उस समय तक इस्लाम को मानने वालों के लिए ये शब्द उतना लोकप्रिय नहीं था.

हालांकि, एक बात तय है कि ये शब्द इस्लाम को मानने वाले मुसलमानों से ही आया है और यहूदी क़ैदियों के वाक्यों में एक ख़ास तरह से ही मिलता है.मैं हर चीज़ में दिलचस्पी खोने लगी थी. मैं कुछ भी खाकर अपना पेट भरना चाहती थी. शायद मैं मुसलमान बनने वाली थी या मैं मुसलमान बन चुकी थी.

अगर कोई SS वाला किसी मुसलमान को चूहा खाते पकड़ लेता, तो बुरी तरह पीटता.

(साभार: पेंगुइन स्वदेश)