नई दिल्ली: ओडिशा के कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों में फैली पहाड़ी पर प्रस्तावित वेदांता लिमिटेड की सिजिमाली बॉक्साइट खनन परियोजना को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति से पर्यावरणीय मंजूरी मिल गई है.
ज्ञात हो कि इस प्रस्तावित खदान के खिलाफ ‘मां माटी माली सुरक्षा मंच’ के तहत संगठित स्थानीय आदिवासी और दलित समुदाय इसका विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि यह परियोजना उनकी आजीविका, जल स्रोतों और सिजीमाली पहाड़ियों की पवित्रता के लिए खतरा है – जो उनके आराध्य देव ‘तिज राजा’ का निवास स्थान है.
पिछले महीने काशीपुर ब्लॉक के कई गांवों में खनन विरोधी आदिवासी आंदोलन पर पुलिसिया कार्रवाई घटनाएं सामने आई थीं.
311 मिलियन टन उच्च-गुणवत्ता वाले बॉक्साइट भंडार के खनन के लिए प्रस्तावित यह परियोजना 1,549 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है और इसके लिए 709.72 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन की जरूरत होगी.
वेदांता ने कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ स्थित अपने एल्युमिना स्मेल्टर संयंत्र के लिए इस खदान ब्लॉक से बॉक्साइट निकालने का प्रस्ताव रखा है. यह खदान परियोजना थुआमुल रामपुर और काशीपुर तहसीलों में प्रस्तावित है, जो दोनों जिलों के 18 गांवों को कवर करती है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की गैर-कोयला खनन मामलों की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने 15 मई की बैठक में इस परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी देने की सिफारिश की.
पर्यावरण मंज़ूरी की यह सिफ़ारिश एक विशेष शर्त पर आधारित है कि ‘709.72 हेक्टेयर क्षेत्र में ‘चरण-II वन मंज़ूरी’ प्राप्त किए बिना कोई भी खनन गतिविधि नहीं की जाएगी.’
समिति ने यह भी शर्त रखी कि कंपनी को परियोजना से जुड़े दो मामलों में सभी न्यायिक आदेशों और फैसलों का पालन करना होगा – इनमें से एक मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और दूसरा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में.
अदालतों में लंबित मामले
अखबार के अनुसार, लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने सिजीमाली बॉक्साइट ब्लॉक आवंटित करने के निर्देश की मांग करते हुए ओडिशा हाईकोर्ट का रुख किया था. हाईकोर्ट ने 2023 में याचिका खारिज करते हुए कहा था कि एलएंडटी ने अपनी अन्वेषण लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन किया है और वह इस ब्लॉक के लिए खनन पट्टे की हकदार नहीं है. इसके बाद एलएंडटी ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जिसमें वेदांता को भी पक्षकार बनाया गया है.
एक अलग मामले में स्थानीय आदिवासी समुदाय के सदस्यों ने खनन परियोजना से जुड़ी पहुंच सड़क (एक्सेस रोड) के लिए दी गई सैद्धांतिक वन मंजूरी को चुनौती दी है.
इस परियोजना के कारण तिजीमाली गांव के 51 परिवारों और मालीपदार गांव के 78 परिवारों सहित कुल 129 परिवार विस्थापित होंगे. आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, पुनर्वास कॉलोनियों के लिए कुरकुटी और चांदगिरी में भूमि चिन्हित की गई है.
पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति कंपनी को दिसंबर 2025 में वन भूमि डायवर्जन के लिए सैद्धांतिक यानी स्टेज-I वन मंजूरी पहले ही दे चुकी है.
सिजीमाली पूर्वी घाट क्षेत्र में स्थित है. ईएसी को दी गई जानकारी के अनुसार, खनन पट्टे के 10 किलोमीटर दायरे में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सर्वोच्च संरक्षण प्राप्त 24 अनुसूची-I प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें हाथी, स्लॉथ भालू (sloth bear), किंग कोबरा और पैंगोलिन शामिल हैं.
पर्यावरणीय मंजूरी की यह सिफारिश ऐसे समय आई है जब यह परियोजना स्थानीय कोंध और परोजा आदिवासी समुदायों तथा वन क्षेत्रों में रहने वाले दलित समुदायों के विरोध में घिरी हुई है. इन समुदायों का आरोप है कि परियोजना के लिए वन अधिकारों के निपटारे से संबंधित ग्रामसभा प्रस्ताव फर्जी हैं.
कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों के निवासियों ने पिछले वर्ष ओडिशा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 8 दिसंबर 2023 के ग्रामसभा प्रस्तावों और उसके बाद कलेक्टर द्वारा जारी प्रमाणपत्रों को रद्द करने की मांग की थी. उनका आरोप था कि ये प्रस्ताव फर्जी हैं और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के खिलाफ हैं. अदालत ने अधिकारियों को वन अधिकारों के निपटारे संबंधी शिकायतों पर ध्यान देने का निर्देश दिया था.
इसके अलावा, आदिवासी समुदायों ने पारंपरिक अधिकारों, वन उपज और उस पहाड़ी पर स्थित पवित्र स्थलों तक पहुंच खत्म होने की आशंका के आधार पर भी परियोजना का विरोध किया है, जहां खनन पट्टा प्रस्तावित है.
अखबार ने प्रख्यात पर्यावरण और अधिकार कार्यकर्ता प्रफुल्ल सामंतारा के हवाले से कहा कि सिजीमाली की पहाड़ियां स्थानीय अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए पूजनीय हैं और उनकी आजीविका इन्हीं पर निर्भर है. खदान विरोधी आंदोलन से जुड़े समंतारा ने कहा कि ये पहाड़ियां पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं और स्थानीय लोगों ने वर्षों की मेहनत से यहां मोटे अनाज की खेती विकसित की है.
