महबूब का घर हो कि बुजुर्गों की ज़मीनें,
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़कर नहीं देखा.
ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं,
पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है.
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरह नहीं खाते बस्तियां जलाने में!
उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के आलापुर विधानसभा क्षेत्र में ऐतिहासिक बसखारी बाजार से आठ किलोमीटर दूर स्थित उर्दू के बेहद मकबूल शायर स्मृतिशेष बशीर बद्र के पैतृक गांव बुकिया में उनके पुरखों की जमीन पर बने आधे-अधूरे घरों के सामने खड़े होते ही उनके ये शे’र बेसाख्ता याद आने लगते हैं.
इस कारण और कि इन घरों में रह रहे उनके परिजन आज भी ‘पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है’ वाले हालात झेलते हुए अपनी-अपनी तरह से कठिन जीवन संघर्ष में मुब्तिला हैं. पीढ़ियां भले बदल गई हैं, लेकिन उनकी ‘दीवार में सर लगता है’ की स्थिति नहीं बदली है. वे टूट गए हैं, लेकिन अपने घर को मुकम्मल घर नहीं बना पाए हैं. याद कीजिए: लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में!
चौंकिए नहीं. मीडिया की जल्दबाजी ने गत बृहस्पतिवार को उनके दुनिया को अलविदा कहते ही उन्हें अयोध्या या कि कानपुर में जन्मा बताकर उनके जन्मस्थान को लेकर ‘कन्फ्यूजन’ न पैदा कर दिया होता तो इसमें चौंकने वाली कोई बात होती ही नहीं.
तब बुकिया गांव के लोगों के यह बताने की नौबत भी नहीं आती कि उनका जन्म अयोध्या, कानपुर या इस पैतृक गांव में नहीं, बल्कि उस शहर में हुआ था, जहां उनके पिता सैयद मोहम्मद नज़ीर नौकरी करते और सपत्नीक रहते थे. इस सिलसिले में गांव के कुछ लोग गोरखपुर का नाम भी लेते हैं, हालांकि इसकी दस्तावेजी पुष्टि नहीं हो पाती.
वे बताते हैं कि संभवत: उनके स्थायी पते के रूप में बुकिया गांव की शोहरत के कारण बाद में उसे उनकी जन्मभूमि समझा जाने लगा.
विडंबना यह कि यह समझा जाना ही उसके हिस्से आया क्योंकि उनकी जन्मभूमि वह था नहीं और कर्मभूमि बनना उसे मयस्सर नहीं हुआ.
बहरहाल, बशीर बद्र के दो छोटे भाई भी थे, जिनमें मंझले भाई का नाम सैयद मोहम्मद ज़मीर था और छोटे का सैयद मोहम्मद सगीर. ज़मीर उत्तर प्रदेश पुलिस में दारोगा थे और उनके रहते ही बुकिया गांव से उनका रिश्ता प्रगाढ़ नहीं रह गया था. रह भी कैसे जाता, गांव में कोई लंबी-चौड़ी खेती-बाड़ी भी तो नहीं थी कि उसी को संभालने या गल्ला वगैरह लेने आते रहते.
ग्रामीण बताते हैं कि वे संभवत: आगरा से सेवानिवृत्त हुए, वहीं अंतिम सांस ली और अब उनका बेटा वहीं कोई नौकरी करता है. सबसे छोटे भाई सगीर रामपुर में स्टेशन मास्टर हुआ करते थे और अब वे भी इस संसार में नहीं हैं. साफ है कि अब बुकिया गांव में बशीर बद्र और उनके दोनों भाइयों में से किसी के भी घर का चूल्हा नहीं जलता.
बहरहाल, जैसे बशीर बद्र के वैसे ही उनके पिता सैयद मोहम्मद नज़ीर के भी दो भाई थे- सैयद मोहम्मद जलील और सैयद मोहम्मद खलील. इनमें खलील का तो कुछ मालूम नहीं, लेकिन जलील के दो बेटे हुए सैयद नसीब अली और सैयद जियारत अली उर्फ झुन्नन. इनमें झुन्नन का जीवन संघर्ष एक समय इतना कठिन हो गया था कि वे हाट बाजारों में जोर-जोर से गाकर खटमलमार व चूहेमार दवाएं बेचते और उसी की आमदनी से गुजर-बशर करते थे. अब वे भी इस दुनिया में नहीं हैं और गांव के पुश्तैनी घर में उनकी पत्नी व बेटा रहते और बशीर बद्र के वंशज के रूप में पहचाने जाते हैं.

गांव के ही निवासी एक इंटर कालेज के सेवानिवृत्त अध्यापक और बुजुर्ग पत्रकार बचुली मिश्र बताते हैं कि जहां तक बशीर बद्र की बात है, देश-दुनिया में उनकी और उनकी शायरी की कितनी भी शोहरत क्यों न हो, अपने गांव के लिए वे कई मायनों में जीवन भर अजनबी से ही बने रहे. कारण यह कि पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में उन्होंने एक बार गांव छोड़ा तो उनको फिर वहां वापस गांव लौटना मयस्सर नहीं हुआ.
मिश्र कहते हैं, ‘पता नहीं, उनको कभी इसकी कसक सताती थी या नहीं. सताती होती तो अपने एक शे’र में उन्होंने इस बात को कुछ इस तरह, इतने दर्प से याद न किया होता- ‘महबूब का घर हो कि बुजुर्गों की ज़मीनें, जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़कर नहीं देखा.’
उनका यह ‘मुड़कर न देखना’ इस हद तक बेहद था कि जब उनके जीवन के प्रायः सारे संघर्ष खत्म हो गए, उसकी जगह इत्मीनान ने ले ली, समय के साथ वे बड़े शायर बन गए और बड़े ओहदों पर गए तब भी उनको अपने गांव की याद नहीं आई. उसकी यादों ने उनको कचोटा नहीं. क्या पता ‘ये नये मिजाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो’ वाली अपनी कसौटी अपने गांव पर भी लागू करते रहे हों!
दूसरी ओर उनके स्वाभिमानी परिजन भी कोई लाभ लेने या या सहायता मांगने उनकी ओर नहीं लपके और अपनी तरह से अपने जीवन संघर्ष में ही मगन रहे. अब भी हैं. कहते हैं कि सबको अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है.
बहरहाल, फैजाबाद में अशफाकउल्लाह खां मेमोरियल शहीद शोध संस्थान के प्रबंध निदेशक सूर्यकांत पांडेय याद करते हैं कि 2008 में बशीर बद्र उनके बुलावे पर 19 दिसंबर को अशफाकउल्लाह खां के शहादत दिवस पर आयोजित कवि सम्मेलन व मुशायरे में शिरकत करने आये थे और सुना गए थे- दुश्मनी का सफ़र एक क़दम दो क़दम, तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएंगे…
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)
