दास्तान-ए-गुरुदत्त: किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ

पुस्तक समीक्षा: महमूद फ़ारूक़ी की ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में गुरुदत्त के द्वंद्व को समझने की कोशिश है. दास्तानगो मानो अपने रोल मॉडल के जीवन के कतरनें बटोरकर उससे बनी एक तस्वीर लोगों के सामने पेश करने की कवायद कर रहा है. और इसलिए अगर इस तस्वीर में उज्ज्वल पक्ष निखरकर सामने आया है तो कुछ स्याह पहलू भी. मगर आख़िर में गुरुदत्त को फ़क़ीर के आसन पर बिठा ही दिया गया है.

'यह किताब केवल गुरुदत्त को ही जानने का जरिया नहीं बनता बल्कि उस पूरे दौर को ही जानने का जरिया बन जाता है, जिसमें गुरुदत्त अपने फ़न को गढ़ रहे थे.' (आवरण साभार: राजकमल प्रकाशन/प्यासा फिल्म का स्क्रीनशॉट Imdb से.)

दास्तानगोई की प्रदर्शन परंपरा में वापसी कराने और इसकी मजबूत उपस्थिति कायम करने के बाद से महमूद फ़ारूक़ी की यह कोशिश रही है कि पारंपरिक दास्तानों के अलावा वह नई दास्तानों को इस रवायत में शामिल करते रहे और इन दास्तानों के जरिए दुनिया का ताजा सूरत-ए-हाल भी बयान करते रहें. प्रदर्शन परंपरा में समकालीनता से जुड़ने का एक सूत्र जरूर रहना चाहिए तभी दर्शकों से उसका सजीव जुड़ाव रहता है.

नई दास्तानों के सिलसिले में मशहूर शख्सियतों पर भी उन्होंने दास्तानें पेश की हैं जिनमें मंटो, फ़ैज़, सैयद हैजर रज़ा, नैना देवी, राज कपूर आदि की दास्तानें हैं. इसमें हाल ही में जुड़ा है फिल्मकार गुरुदत्त की दास्तान- ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’, महमूद फ़ारूक़ी ने इस दास्तान को प्रस्तुत तो किया ही है, इसको प्रकाशित भी कराया है.

तर्क यह है कि यह दास्तान इतना तवील है कि इसे पूरा सुनाया नहीं जा सकता लेकिन दास्तान तैयार करने में जो मेहनत है उसको पाठकों के सामने रख देना चाहिए. गुरुदत्त पर पहले से मौजूद किताबों और बहुत से हवालों को इकट्ठा करके एक रोचक दास्तान तैयार किया गया है जिसे एक-दो बैठकों में आराम से पढ़ा जा सकता है. केवल पठनीय होना इसकी खासियत नहीं है बल्कि गुरुदत्त के जीवन को उनके दौर के सिनेमाई और सिनेमाई के साथ-साथ सांस्कृतिक परिदृश्य में रख कर देखा गया है और दीगर फनकारों के साथ उनके जुड़ाव और अंतर की पड़ताल की गई है.

यह किताब केवल गुरुदत्त को ही जानने का जरिया नहीं बनता बल्कि उस पूरे दौर को ही जानने का जरिया बन जाता है, जिसमें गुरुदत्त अपने फ़न को गढ़ रहे थे. पाठकों को गुरुदत्त के जीवन और उस पूरे दौर के साथ हिंदी सिनेमा में उनकी मौजूदगी और उसके असर पर एक नज़रिया बनाने में मदद मिलती है.

गुरुदत्त हिंदी सिनेमा की कालजयी शख्सियत हैं जिनकी फिल्मों का असर उनके बाद की पीढ़ियों पर अधिक रहा है. उनका सिनेमा विश्व सिनेमा में क्लासिक की सूची में दर्ज होने के काबिल है और उनकी ट्रैजिक ज़िंदगी भी किसी सिनेमाई दास्तान से कम नहीं.

महमूद लिखते हैं, उसने कामयाबी, शोहरत और दौलत की जिन बुलन्दियों को देखा वहाँ तक इनमें से कम ही पहुँचे मगर उसके बावजूद गुरु की जिन्दगी जिन अज्जीयतों‘, कशमकशों और जद्दोजहद से गुजरी वो किसी दास्तान से कम नहीं.’

अतिरंजना नहीं

इस दास्तान में उतार-चढ़ाव है, क्लाइमेक्स एंटी क्लाइमेक्स है. राजकमल प्रकाशन से हाल ही में आई इस किताब का गुरुदत्त के जन्मशताब्दी वर्ष में आना सुखद है जो हिंदी में एक कमी की भरपाई भी करता है. इस किताब में गुरुदत्त का जीवन परिवेश और व्यक्तित्व के पूरे कशमकश के साथ समग्रता में आता है, और इसमें अतिरंजना नहीं है. गुरु को नायक की तरह ना देख कर उसके भीतर के साधारण इंसान और जीनियस कलाकार को सामने लाने की कोशिश की गई है, अलग-अलग लोगों से बनते उसके रिश्तों के आईने से भी देखने की कोशिश है.

उन पर लिखी गई किताबों, साक्षात्कारों, और खतों के सहारे गुरु की सफलताओं की चर्चा के साथ साथ उनकी असफलताओं की भी चर्चा है. गुरुदत्त अपने जीवन में सफलता और असफलता के नाव पर एक साथ चल रहे थे और इससे उनके जीवन में अवसाद भी आता जा रहा था जो उनकी फिल्मों में भी झलकता है.

दास्तानगो ने छिपाया नहीं है कि वह गुरुदत्त के असर में है- ‘मैं गुरु को सन 1988 से जानता हूँ. जब दूरदर्शन पे पहली बार उसकी फिल्में दिखाई गई…मैं 16-17 बरस का था. उस जमाने में राज कपूर की भी फिल्में दिखाई गईं, बाद में शान्ताराम और सत्यजीत रे की भी फिल्में दिखाई गईं मगर गुरु कुछ दिल में ऐसा बैठा कि लाख जतन किये वहाँ से निकला ही नहीं… तब से मैं गुरु को गुरु मानता हूँ और तब से मैं गुरु के साथ जिया हूं.”

किताब में मामूली परिवेश में जन्म लेने वाले लेकिन गैर-मामूली सफर तय कर त्रासद अंत झेलने वाले गुरुदत्त के द्वंद्व को समझने की कोशिश है. दास्तानगो मानो अपने रोल मॉडल के जीवन के कतरनों को बटोरकर उससे एक तस्वीर बनाकर लोगों के सामने पेश करने की कवायद कर रहा है. और इसलिए अगर इस तस्वीर में उज्ज्वल पक्ष निखरकर सामने आया है तो कुछ स्याह पहलू भी. लेकिन आखिर में गुरुदत्त को फ़क़ीर के आसन पर बिठा ही दिया गया है.

अपने जीवन को ही सिनेमा की तरह बना लेना, अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा और अपनी आज़ादी तलाशने और हासिल करने के क्रम में दूसरों की आज़ादी में दखल देना, नए-नए प्रोजेक्ट शुरू करना और उसे बीच में छोड़ देना ये सब गुरुदत्त के जीवन में आता रहता है और इससे उनका निजी रिश्ता भी प्रभावित होता है.

गुरुदत्त के कितने रूप

दास्तान इस बात को बहुत शिद्दत से रेखांकित करती है कि गुरुदत्त के परिवेश में मिली बहुसांस्कृतिकता, बहुभाषिकता और बहु कला रूपों के बीच उनकी परवरिश ने उनके जीवन में बहुत से सारे अनुभव अनायास ही दर्ज कर दिए. जिसमें एक तरफ वह उदय शंकर के डांस स्कूल से प्रशिक्षण पाकर डांसर बनने की तमन्ना रखते हैं लेकिन सिनेमा में अपना कदम जमाते हुए निर्देशक, अभिनेता और निर्माता बनते हैं.

कोंकणी पृष्ठभूमि के गुरुदत्त हिंदी भाषा में फिल्म बनाते हैं, उर्दू के शायरों के गीतों का इस्तेमाल करते हैं और बांग्ला भाषा को अपने बेहद करीब पाते हैं. इन सबके असर से बनती उनकी सिनेमाई भाषा मेलोड्रामेटिक है लेकिन उनमें समकालीन यथार्थ और यथार्थ की सतह के नीचे की सरंचना की पहचान उनमें अपने समकालीन फिल्मकारों से अधिक है जिसमें रोमान कम जिंदगी की तल्ख सच्चाइयां अधिक है.

दास्तानगो का विश्लेषण गुरुदत्त को उनके अपने समकालीन फिल्मकारों के बरअक्स भी रख कर देखता है और उनके बारीक अंतरों को स्पष्ट करता है. मसलन राज कपूर की आवारा का राजू और गुरुदत्त की बाज़ी का मदन, एक से हालात में होकर भी एक जैसे नहीं हैं, जीवन को बरतने के उनके अंदाज जुदा हैं जो इन फ़िल्मकारों की जीवन-दृष्टियों का ही अंतर है.

गुरुदत्त की फिल्मों की सत्यजीत रे भी कद्र करते थे. फिरोज रंगूनवाला के हवाले से दास्तानगो बताता है कि रे सिर्फ अच्छी फिल्में बनाना चाहते थे और गुरुदत्त सबको अपील करने वाली फिल्म. रे गुरुदत्त के फिल्मों की ‘रिदम और कैमरे की रवानी’ के कायल थे और उनकी पसंद के भी इसलिए उन्होंने वहीदा रहमान को अपनी फिल्म ‘अभिजन’ में लिया.

सिनेमा की भाषा गढ़ने में गुरुदत्त अपने समय से बहुत आगे थे इसलिए उनकी फिल्मों की सिने भाषा चौंकाती है, मुग्ध करती है. जिसे सिनेमा के अध्येता और सिनेमा बनाने वाले संदर्भ की तरह पढ़ते रहते हैं.

फ़ारूक़ी दर्ज करते हैं, ‘वो लम्बे ट्रैकिंग शॉट या क्रेन शॉट के बाद सीधे क्लोज-अप पे आ जाते थे जिससे एक्सप्रेशन और पुरअसर हो जाते थे और सिनेमाई क्वालिटी बढ़ जाती थी. वो पहले डायरेक्टर थे जिन्होंने 75mm, 100mm लेंस इस्तेमाल किया…75mm में चेहरा गोल-सा हो जाता है, और 50mm में चीजें वैसी ही दिखती हैं जैसी आँखों से. इन लेंसों का इस्तेमाल गुरुदत्त से ऐसा मंसूब हुआ कि लोग इसको गुरुदत्त स्टाइलकहने लगे… मूर्ति जब दूसरे डायरेक्टर्स के साथ काम करने लगे तो लोगों ने कहा, ‘गुरुदत्त स्टाइल में शूट करो.

तकनीक पर गुरुदत्त ने अपनी पकड़ बनाई थी, वे शॉट्स के बारे में सोचते रहते थे. एक-एक दृश्य के कई शॉट्स लेते थे, संतुष्ट न होने पर वह बनी बनाई रील को खारिज भी करते थे. यह किताब दर्ज करती है कि गुरुदत्त सिनेमा बनाने में किस तरह के जुनून अख्तियार करते थे और उसके एक-एक पहलू संवाद, संगीत, प्रकाश, कैमरा, अभिनय पर काम करते थे.

किताब में फिल्मों के मेकिंग का भी ब्यौरा दिया गया है जिसमें ‘प्यासा’ के बनने की दास्तान तफ़सील से बताई गई है एक-एक कलाकारों के जुड़ने से लेकर बनाने की बाधाएं और अंत में बनाने और उसका प्रभाव दर्शकों पड़ कैसा पड़ा है इसका तक. इस सिलसिले में उसकी कहानी को भी विस्तार से कह सकने का मोह दास्तानगो संवरण नही कर पाया है और यह लगता है कि कहानी वाले हिस्से को छोड़ा जा सकता है.

इस विवरण में यह भी दिखता है कि वह अबरार अल्वी और राज खोसला जैसे अपने शागिर्दों और दोस्तों को सिनेमा की दुनिया में आगे बढ़ाते हैं तो देव आनंद के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं. साहिर, नौशाद और कैमरामैन वीके मूर्ति के साथ उनके रिश्तों का भी बयान है.

महमूद बताते हैं कि गुरुदत्त हिंदी में एक भारतीय किस्म के सौंदर्यशास्त्र की तलाश करने की कोशिश कर रहे थे. बीसवीं सदी में पचास के दशक के बाद नव यथार्थवाद ने भारतीय सिनेमा पर गहरा असर डाला था, सत्यजीत रे की फिल्मों की प्रसिद्धि ने सिनेमा का पर्याय ही नव यथार्थवादी शिल्प को बना दिया था.

लेकिन भारतीय दर्शक जो संगीत नाटक की पारंपरिक शैली से सदियों से आनंदित हो रहे थे उनको अपने असर में लेने के लिए यह शैली नाकाफी थी… गुरुदत्त ने इस बात को समझा और भारतीय सौंदर्यशास्त्र में अपनी भाषा तलाशी…और उन्होंने समझा कि दुनियावी यथार्थ की तलाश कर दुनियावी हकीकत की जगह भारतीय मन एक शाश्वत औऱ कायम हकीकत तक पहुंचना चाहता है जिसमें संगीत और नृत्य बहुत जरूरी रास्ता है तो वह फिल्मों में भी आएगा. इसलिए उन्होंने मेलोड्रामा को अपनी भाषा मे बरता और भारतीय मिजाज की पहचान कर सिनेमा में दर्ज करने की कोशिश की.

यह किताब वहां काव्यात्मक हो जाती है जहां दास्तान गो गुरुदत्त की शख्सियत का बयान करने लगता है. कुछ मिसाल देखिए:

गुरु वो है जो दुख उठाता है, तपस्या करता है और अपना लहू जलाकर हासिल किये हुए इल्म, नसीहत और ज्ञान का निचोड़ अपने शिष्यों के सामने पेश करता है…

गुरु ज्ञानी और गुरु होने के साथ-साथ फ़क़ीर भी था… फ़क़ीरों को हमारे मुल्क में एक अलग मुक़ाम है… फ़क़ीर इनसान पैदायशी नहीं बनता… वो कुछ खोकर बनता है… वो हारकर बनता है… वो शिकस्त खाकर और हज़ीमत उठाकर बनता है…फ़क़ीर के आगे सब दौलत हेच है… उसके आगे सब शान-ओ-शौकत हेच है… गुरु फ़क़ीर आदमी था… उसको दुनिया से कुछ नहीं चाहिए था…

कहानी में कहानी 

दास्तान की प्रवृत्ति होती है कि मुख्य कथानक को रोककर दास्तान से जुड़े हुए कथानकों की तरफ दास्तानगो बढ़ जाता है इस किताब में फारूकी कई बार ऐसा करते हैं. वह किसी प्रसंग को पकड़कर आगे बढ़ते हैं जैसे नौशाद का जिक्र आने पर वह मुख्य दास्तान को रोककर नौशाद की कहानी कहते है और फिर उसे पूरा करके वापस गुरुदत्त की कहानी पर आ जाते  है. इसी तरह एक जगह रोने की महिमा का बखान करते है  और अलग अलग साहित्यक संदर्भ भी देते हैं.

गुरुदत्त के निजी जीवन औऱ खासकर गीता दत्त और वहीदा रहमान से उनके रिश्तों की इस किताब में संवेदनशील पड़ताल की गई है. गुरुदत्त का जीवन उनके फिल्मों के ही नायकों की तरह है -हमेशा दो नायिकाओं से घिरा. गुरुदत्त पहले गीता के करीब आते हैं उनसे शादी करते हैं. दोनों की शख्सियत जुदा हैं, गुरु को फिल्मी पार्टियां पसंद नहीं थीं लेकिन गीता दत्त के दोस्तों का एक खास समूह था जिसमें वह उठती-बैठती थीं और इनमें से कुछ लोग गुरु को पसंद नहीं थे और इस बीच में वहीदा रहमान आ गईं…गुरु गीता के करिअर को भी सीमित करना चाहते थे और बहुत से कारणों से वह हो भी रहा था.

गुरु ने उनको सिर्फ अपनी फिल्मों में गाने के लिए कहा और सिर्फ गुरु की फिल्मों के लिए गाने का मतलब था सिर्फ वहीदा के लिए गाना और ये बात गीता को बुरी तरह कचोटती और सालती थी.

दास्तानगो ने जिक्र किया है कि गुरुदत्त के साथ गीता जैसी बेमिसाल गायिका का जीवन और करिअर भी पटरी से उतर जाता है- ‘गुरु और गीता दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते थे मगर हर क्रिएटिव आदमी को थोड़ी आज़ादी चाहिए. गुरु गीता को ये आज़ादी नहीं देना चाहता था और अपनी आज़ादी में कोई खलल नहीं चाहता था. उसको गीता का शक करना और पजेसिव होना बहुत खटकता था. गीता उसका अटेंशन चाहती थी हरदम… कभी-कभी वो झुंझला के कहता, ‘जाओ यार बोर मत करो.’ ज़िन्दगी जीने के दोनों के तौर-तरीक़े बहुत अलग-अलग थे.’

आगे चलकर जब वहीदा रहमान ने भी उनसे किनारा कर लिया तो वह टूट गए और गीता दत्त से उन्होंने अपना रिश्ता कायम करना चाहा नए सिरे से लेकिन नाकामयाबी और शराब ने उन्हें गर्क कर लिया.

दास्तान का एक तत्व होता है कौतुहल, यानी कहानी में आगे क्या होगा यह जानने की जिज्ञासा. एक अच्छा दास्तानगो दास्तान में पाठकों की जिज्ञासा को बढ़ाए रहता है और उसे तमाम उतार-चढ़ावों से गुजारकर उस जगह पर लाकर दास्तान को समाप्त करता है जहां पाठकों की सभी जिज्ञासाओं का हल मिल जाए, सारे तिलिस्म टूट जाएं और जीवन के बारे में कुछ फलसफाई नजरिया भी हासिल हो जाए. गुरुदत्त की इस दास्तान में इसका कामयाबी से निर्वाह हुआ है.

आखिर तक आते-आते किताब एक ऊंचाई तक पहुंचती है. पाठकों पर यह जाहिर हो जाता है कि किसी कलाकार को अपने भीतरी द्वंद्व के अलावा अपने समय के समाज के पाखंडों और व्यवहार से जूझना पढ़ता है, वह जिस आजादी की तलाश में रहता है वह मुश्किल से मिलती है. गुरुदत्त जैसी शख्सियत जो कला को गहरे तौर पर आत्मसात कर लेते हैं इस सामाजिक रवैये की गुत्थी को सुलझा नहीं पाते, नाकद्री उन्हें और तोड़ देती है.

इस दास्तान की भाषा की विशेषता है रवानी. दास्तानगो की अपनी बहुभाषिक पृष्ठभूमि और हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू में उनकी आवाजाही ने बयान को रोचक और जीवंत बनाया है. दास्तान के बीच बहुत से अशआर आते हैं जिसके इस्तेमाल को महमूद ने अपनी शैली के रूप में भी गढ़ा है. दास्तान सुनते हुए वह कई बार जरूरी लगती हैं लेकिन पढ़ते हुए कुछ दफे खटकता भी है.

अपनी बात को कहने के लिए उन्होंने रिसर्चर की तरह तथ्य जुटाए हैं और कामयाबी से किस्से में बदला है. इस किस्से में समय-समय पर अज्ञेय, मुक्तिबोध, ग़ालिब, वेदव्यास, मीर, होमर, भवभूति इस तरह से आते हैं जैसे उनके संदर्भ के बिना यह किस्सा बयान ही ना किया जा सकता हो. इसी तरह फिल्मों की सैद्धांतिकी भी इस तरह आती है कि पाठकों को लगे हाथों समझा भी दिया जाए कि किसी खास चीज़ के बारे में फिल्म सिद्धांत क्या कहता है.

हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों के बारे में कहा गया है कि उनकी भाषा में उनका पांडित्य बोझ बनकर नहीं लालित्य बन कर आता है उसी तर्ज पर फ़ारूक़ी की भाषा के बारे में भी कहा जा सकता है कि उनका पांडित्य भाषा की रवानी के साथ साथ गहराई और रोचकता लेकर आता है. वो सुना रहे हैं किस्सा लेकिन इसमें शख्सियत और वक्त को समझने की गहन अंतर्दृष्टि भी है. अंतत: यह कहना चाहिए कि यह दास्तान एक जरूरी किताब है जो गुरुदत्त जैसी शख्सियत की परतों को हमारे सामने खोलती है, जिसा पढ़ते हुए सुनने और देखने का आनंद मिलता है.

(लेखक रंग समीक्षक हैं. उन्होंने हबीब तनवीर के रंगकर्म पर ‘वैकल्पिक विन्यास’ पुस्तक लिखी है. )