हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल: ‘मुख्य’ धारा की पतन गाथा!

एक समय कहा जाता था कि मीडिया प्रायः ऊंचा सुनने वाली दिल्ली को जनता की आवाज़ सुनने के लिए मजबूर कर देती है, लेकिन अब इसने इस प्रवाह को पूरी तरह पलट दिया है. अब यह सत्ताओं को आम लोगों की तकलीफ़े बताने के 'जोखिम' तो नहीं ही उठाती, उलटे सरकारों के हुक्म व फरमान उन तक इस रूप में ले आती है कि 'बुलडोजर जस्टिस' जैसा शब्द 'लोकतांत्रिक' हो जाता है.

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(फोटो साभार: पिक्साबे)

हिंदी की वर्तमान पत्रकारिता को उसके दो सौ सालों (जो गत 30 मई को उसके पहले पत्र ‘उदंत मार्तण्ड’ की दो सौवीं वर्षगांठ के साथ पूरे हुए हैं) के आईने में देखा जाए, तो उस पर सिर्फ एक वस्तुनिष्ठ टिप्पणी की जा सकती है. यह कि अपने को ‘मुख्य’ बताती आई उसकी धारा इस बीच अन्यायी सत्ताओं, शोषकों, अत्याचारियों और थैलीशाहों के प्रतिरोध की गौरवशाली परंपरा को दरकिनार कर पतनशील प्रवृत्तियों के शिकंजे में बुरी तरह जकड़ गई है. इतनी बुरी तरह कि अब उसे इन दो सौ सालों की वारिस कहने में गहरा संकोच होता है.

यहां कहने का आशय यह कतई नहीं है कि इससे पहले यह परम पवित्र या कि सर्वथा निष्कलुष थी. इसकी सीमाएं, कमजोरियां, बीमारियां और बेईमानियां (हां, बेईमानियां) तब भी इसके साथ थीं, लेकिन चूंकि तब इसने इतने छद्म नहीं गढ़े थे, इसलिए इन सबकी उनके वास्तविक रूप में शिनाख्त संभव थी.

जो एकाधिकारी पूंजी अब पूरी तरह निर्वसन होकर दबंगई से उसे नाना खेल खिला रही है, वह भी तब इतनी निर्लज्ज नहीं हुई थी. जिन भी मजबूरियों या दबावों के कारण हो, उसकी आंखों का पानी तब पूरी तरह नहीं मरा था और उनमें थोड़ी शर्म बाकी थी. इसलिए अपनी ‘निर्णायक’ भूमिका के बावजूद उसने इन सबको मौसम बन जाने या सदाबहार हो जाने की सहूलियतें नहीं दी थी.

लोकतंत्र से दुश्मनी

यह तो अभी पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध की बात है, जब इस धारा ने बेहद शातिराने के साथ पहले मीडिया संज्ञा धारण की (जिसके बारे में अरसे तक ‘किसका मीडिया और कैसा मीडिया’ टाइप बहसें चलती रहीं और अब शायद ही किसी को संदेह हो कि हाथी और चींटी की लड़ाई में वह किसका साथ देता है), फिर अपना चोला बदल लिया और दमनकारी व वर्चस्व की भूखी राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक सत्ताओं व शक्तियों के प्रति इतनी समर्पित हो गई कि उसे सारे के सारे प्रगतिशील मूल्यों, यहां तक कि देश के लोकतंत्र से भी ढेर सारी शिकायतें रहने लगीं.

फिर तो इसने इन सबसे दुश्मनी में भी देर नहीं की.

आज की तारीख में तो यह धारा यह समझने तक को तैयार नहीं दिखती कि उसकी कोशिशों से हमारा लोकतंत्र, लोकतंत्र नहीं रह गया (जिसकी शुरुआत भी हो गई है) तो उसकी उस स्वतंत्रता का अस्तित्व भी नहीं ही बचेगा, जिसका अभी वह उसके विरुद्ध इस्तेमाल कर रही है.

कौन समझाए उसे कि वह लोकतंत्र में रहते हुए राजतंत्र, धर्मतंत्र या सैन्य तंत्र की हिमायत या वकालत भले कर सकती हो, कर ही रही है, इनमें से किसी भी तंत्र में अपने लिए लोकतंत्र की मांग नहीं कर सकती. इन तंत्रों के शिकार दुनिया के अनेक देशों का इतिहास गवाह है कि एक बार इनकी जकड़ मजबूत हो जाने के बाद लोकतंत्र को वापस पाने के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकानी और कितनी सदियां देनी पड़ती हैं.

विडंबना यह कि अब अपने पाठकों व दर्शकों से नाना प्रकार के छद्म रचते हुए इस धारा को उस सरकार से गलबहियां करने में भी कोई झिझक नहीं रह गई है, जो अपनी सत्ता की उम्र लंबी करने के लिए गिरावटों का नया इतिहास बना रही है. ऐसे में इसे अपने जिन पाठकों व दर्शकों को बेहतर नागरिक बनाने में लगना था, उन्हें यह एक दूजे से नाराज और नफरत से भरी विवेकहीन भीड़ों में बदल देने पर आमादा है. कुछ हद तक बदलने में सफल भी हो गई है.

एक समय कहा जाता था कि यह प्रायः ऊंचा सुनने वाली दिल्ली को जनता की आवाज़ सुनने के लिए मजबूर कर देती है, लेकिन अब इसने इस प्रवाह को पूरी तरह पलट दिया है. अब यह सत्ताओं को आम लोगों की तकलीफें बताने के ‘जोखिम’ तो नहीं ही उठाती, उलटे सरकारों के हुक्म व फरमान उन तक इस रूप में ले आती है, शोषण और दमन को इस तरह अपरिहार्य बनाकर, कि ‘बुलडोजर जस्टिस’ जैसा शब्द ‘लोकतांत्रिक’ हो जाता है.

सरकार की शुभचिंतक

जो भी समुदाय सरकार को असुविधा में डालते या अपने साथ हो रहे अन्याय को लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलित होते हैं, यह धारा सरकार से भी पहले उनके खिलाफ अपना ओर से मोर्चा खोल देती है. भले ही वे देश के अन्नदाता किसान हों, उसकी नई पीढ़ियों के निर्माता शिक्षक, रोजी-रोजगार व नौकरियों के लिए भटक रहे युवा, परीक्षाओं में गड़बड़ियों व बार-बार के पेपर लीक को लेकर अपने भविष्य के लिए चिंतित छात्र, सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिक/पूर्व सैनिक या कोई और.

इन सबके खिलाफ यह सरकार से पहले ही चार्जशीट बनाकर तरह तरह से उन्हें लांछित करना व देश का दुश्मन और कई बार तो आतंकवादी तक बताना शुरू कर देती है. अभी-अभी की बात करें तो जब सरकार को परीक्षाओं में बढ़ती गड़बड़ियों और पेपर लीक को लेकर जवाब देते नहीं बन रहा, एक चैनल की स्वनामधन्य न्यूज एंकर उससे जवाबदेही की मांग करने के बजाय उस ओर से ध्यान हटाने के लिए यूट्यूब के जरिये पढ़ा रहे शिक्षकों पर बरस पड़ी हैं.

भारत द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध चलाए गए चार दिन के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस धारा ने कैसे-कैसे करतब दिखाए और अभी हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा के दौरान उनसे सवाल पूछने वाली नार्वे की महिला पत्रकार के चरित्रहनन की कैसी-कैसी, खुद मियां फजीहत दीगरां नसीहत  जैसी कोशिशें कीं, यह तो लोग अभी भूले भी नहीं हैं.

हिंदी पत्रकारिता की यह धारा अब हर ऐसी संस्था के पीछे पड़ी रहती है जो सरकार की आलोचना करती, किसी समस्या के लिए उसे कठघरे में खड़ी करती या उससे असहमति जताती है. सरकार के प्रति इस धारा की ‘सहृदयता’ को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बालबुद्धि कहकर उनका मजाक उड़ाएं, इससे पहले यह कहकर उन पर तंज कसें कि कुछ लोगों की उम्र बढ़ती जाती है, लेकिन अक्ल नहीं बढ़ती.

प्रधानमंत्री के लोग उनको देशद्रोही, गद्दार व आतंकवादी कहें और उन पर विदेशी आकाओं को खुश करने, देश व सेना का मनोबल गिराने, विदेश में भारत की छवि खराब करने, गलत व भ्रामक बयान देने और मोदी सरकार के खिलाफ ‘अराजकता’ फैलाने के प्रयास करने जैसे आरोप लगाएं तो यह तथाकथित पत्रकारिता उसका मजा ‘लेती’ है, जबकि राहुल के किसी भी पलटवार पर इस तरह आसमान सिर पर उठा लेती है जैसे उन्होंने परमपूज्य प्रधानमंत्री जी की शान में बहुत बड़ी गुस्ताखी कर दी हो.

प्रधानमंत्री अपने अब तक के बारह सालों में एक भी संवाददाता सम्मेलन न करें तो उसमें इसे कुछ भी खराब नहीं लगता, जबकि वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष यह कहें तो वह चिढ़ जाती है कि भारतीय (सिर्फ हिंदी नहीं) मीडिया में थोड़ी भी रीढ़ होती, तो उसको खुद प्रधानमंत्री का बहिष्कार करना चाहिए था.

ऐसे आचरण के रहते भला यह धारा उस विरासत की सच्ची वारिस क्योंकर हो सकती है, जो हिंदी के पहले साप्ताहिक ‘उदंत मार्तण्ड’, उसके 28 साल बाद आए पहले दैनिक ‘समाचार सुधा वर्षण’ और अनेक अन्य पत्र छोड़ गए हैं.

वह विवेक!

यहां पहले दैनिक समाचार सुधा वर्षण की ही बात करें तो 1854 में श्यामसुंदर सेन ने उसको संपादित व प्रकाशित करना शुरू किया तो उदंत मार्तण्ड की ही तरह प्राण-प्रण से अन्यायी ब्रिटिश सत्ता के प्रतिरोध में लगाए रखा. 1857 में पहले स्वतंत्रता संग्राम के वक्त उसने तत्कालीन मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर द्वारा अंग्रेजों को हर हाल में देश से निकालने के लिए जारी फरमान को प्रमुखता से प्रकाशित कर दिया तो चिढ़ी हुई ब्रिटिश सत्ता ने देशद्रोह का आरोप लगाकर उसको अदालत में खींच लिया.

लेकिन इस विकट संकट में भी श्यामसुंदर सेन ने न अपना विवेक खोया, न साहस और न ही डरकर आत्मसमर्पण पर उतरे. उन्होंने अदालत में इतनी मजबूती से अपना पक्ष रखा कि अंग्रेजों द्वारा संचालित होने के बावजूद उसने बहादुरशाह जफर को ही देश का वास्तविक शासक और अंग्रेजों को उस पर अवैध रूप से काबिज करार दे दिया.

साथ ही यह भी कहा कि समाचार सुधा वर्षण ने उनका फरमान छापकर देशद्रोह नहीं किया, वरन अपना कर्तव्य निभाया है.

अफसोस कि हिंदी पत्रकारिता की ‘मुख्य’ धारा अब कर्तव्य पालन में श्याम सुंदर सेन जैसे संपादकों से होड़ करने के बजाय, जब भी उसकी पतनगाथा कही जाने लगती है, 1975 में आपातकाल के वक्त पत्रकारिता द्वारा किए गए ‘आत्मसमर्पण’ का जिक्र करने लग जाती है. जैसे कि एक आत्मसमर्पण दूसरे का औचित्य सिद्ध कर सकता हो या कि दोनों मिलकर गौरव का कारण बन जाते हों.

हम जानते हैं कि तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपते हुए अभिव्यक्ति की आजादी समेत देशवासियों के सारे मौलिक अधिकार छीन लिए थे और प्रेस पर सेंसर लगा दिया था. इस सेंसरशिप के तहत सरकारी अधिकारी अखबारों के प्रकाशन से पहले उनके दफ्तरों में जाते और उनकी जो भी सामग्री उन्हें काबिल-ए-ऐतराज लगती, उसे हटवा देते थे. छोटे मोटे प्रतिवादों के बीच आपातकाल के उन्नीस महीनों तक सारे अखबारों ने इस व्यवस्था को स्वीकार किए रखा था.

1977 में देश के मतदाताओं ने इंदिरा गांधी को सत्ताच्युत करके उनके किए की कड़ी सजा दी और जनता पार्टी सत्ता में आई तो उसकी मोरारजी सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने राजधानी दिल्ली में पत्रकारों की एक सभा को संबोधित करते हुए इसको लेकर तंज किया था कि ‘आप लोगों को केवल झुकने के लिए कहा गया था, किंतु आप लोग तो घुटनों के बल चलने लगे!’

वह तंज केवल हिंदी की पत्रकारिता के लिए नहीं था, लेकिन अपनी रीढ़ गंवा चुकी इसकी ‘मुख्य’ धारा अपनी केंचुआगीरी को सही ठहराने के लिए इसका प्रायः जिक्र किया करती है. इस पर भी नहीं शरमाती कि अब सत्ताधीशों को उसे घुटनों के बल लाने के लिए किसी इमरजेंसी या सेंसरशिप की जरूरत ही नहीं पड़ रही. कुछ प्रत्यक्ष और कुछ परोक्ष दबावों ने ही उसको सरकारी तोता बना दिया है.

इस तरह कि वह लालकृष्ण आडवाणी के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए उस साक्षात्कार के आईने में अपनी शक्ल तक निहार नहीं पाती, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे भविष्य में आपातकाल की आशंका से इनकार नहीं करते.

उन्हीं के शब्दों में कहें तो- ‘1975-77 में आपातकाल के बाद से अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिससे मुझे यह आश्वासन मिले कि नागरिक स्वतंत्रताएं फिर से निलंबित या नष्ट नहीं की जाएंगी. बिलकुल नहीं. बेशक, कोई भी इसे आसानी से नहीं कर सकता. लेकिन यह दोबारा नहीं हो सकता – मैं यह नहीं कहूंगा. ऐसा हो सकता है कि मौलिक स्वतंत्रताएं फिर से सीमित कर दी जाएं.’

वह श्रेय!

हम देख रहे हैं कि अब वे बिना किसी राजाज्ञा के सीमित कर दी गई हैं तो भी इस ‘मुख्य’ धारा को या तो स्थिति की गंभीरता का इलहाम नहीं है या यह इस ओर से जानबूझकर अंजान बनी हुई है.

यह इस मायने में बहुत त्रासद है कि इसने अपनी वह चमक व तमक नए सिरे से खो दी है, आपातकाल के बाद जिसे कमोबेश, जैसे भी संभव हुआ, बहाल कर लिया था. इस हद तक कि सत्ताधीशों को शिकायत हुआ करती थी कि वह हमेशा उनके विपक्ष की ही भूमिका निभाया करती है.

बात को इस तरह समझ सकते हैं कि 1984 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर राम लाल ने स्वतंत्रता दिवस के अगले ही दिन 16 अगस्त को राज्य के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव की सरकार को बेहद विवादास्पद और अलोकतांत्रिक तरीके से तख्तापलट की शैली में बहुमत सिद्ध करने का मौका दिए बगैर अल्पमत में करार देकर बर्खास्त कर दिया, तो इस पत्रकारिता ने लोकतंत्र पर इस हमले को लेकर आसमान सिर पर उठा लिया था.

इसके वाजिब कारण भी थे, क्योंकि उधर एनटीआर अमेरिका में दिल का ऑपरेशन करा रहे थे और इधर राज्यपाल ने उनकी कैबिनेट के बागी वित्त मंत्री नादेंदला भास्कर राव को नया मुख्यमंत्री बना दिया था.

तब तत्कालीन पत्रकारिता, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा हिंदी पत्रकारिता का था, ने बिना समय गंवाए इसके लिए न सिर्फ राज्य के राज्यपाल बल्कि केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार को भी कठघरे में खड़ी कर दिया था, जिससे उनके खिलाफ व्यापक जनमत का निर्माण हुआ था.

फिर एनटीआर भारत लौटकर अपने वफादार 161 विधायकों (जो बहुमत से ज्यादा थे) के साथ दिल्ली आए और व्हीलचेयर पर बैठकर अपने पहचान पत्र हाथ में लिए विधायकों की राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के सामने परेड कराई, तो जनमत को दबाना संभव नहीं रह गया.

राज्यपाल राम लाल को इस्तीफा देना पड़ा और नए राज्यपाल शंकर दयाल शर्मा के निर्देश पर भास्कर राव अपना बहुमत साबित नहीं कर सके तो एनटीआर फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बने. उनकी इस वापसी को उनके संघर्ष के अलावा तत्कालीन प्रेस द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में किए गए जनमत निर्माण की भी जीत बताया गया था.

लेकिन उसके बाद से आज तक पत्रकारिता को वैसा कोई श्रेय मयस्सर नहीं हुआ. हिंदी पत्रकारिता को तो एकदम से नहीं.

मयस्सर भी कैसे हो, अब तो वह विधायकों की खुल्लमखुल्ला खरीद-फरोख्त को ‘ऑपरेशन लोटस’ कहती है और उसके लिए कोई कड़ा शब्द तक इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं करती. इतना ही नहीं, 2018 में ‘कोबरापोस्ट’ द्वारा किए गए एक स्टिंग आपरेशन में उसके ‘जासूस रिपोर्टर’ ने 17 मीडिया घरानों को इसके लिए खुशी-खुशी तैयार पाया था कि वे छह करोड़ से पचास करोड़ रुपये तक लेकर देने वाले की मनचाही राजनीतिक खबरें प्रकाशित व प्रसारित कर देंगे.

सोचिए जरा, दो सौ सालों में ही इस धारा की यह पतनगाथा इतनी लंबी हो गई है तो आगे उसका क्या हाल होगा?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)